नई दिल्ली: ऋषिकेश-कर्णप्रयाग नई ब्रॉड गेज रेल लाइन परियोजना ने शुक्रवार, 11 सितंबर को सुरंग निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। परियोजना की एस्केप टनल-1 के आखिरी हिस्से का ब्रेकथ्रू पूरा होने के साथ पूरी सुरंग एक सिरे से दूसरे सिरे तक जुड़ गई है। इस सुरंग की लंबाई 10.847 किलोमीटर है और यह परियोजना की दूसरी सबसे लंबी सुरंग है। इस कामयाबी के बाद ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में सुरंगों के ब्रेकथ्रू की कुल संख्या 41 पहुंच गई है।
हिमालय के चुनौतीपूर्ण भूगर्भीय क्षेत्र में इतनी लंबी सुरंग की खुदाई और उसके अंतिम हिस्से को जोड़ना निर्माण प्रक्रिया का अहम पड़ाव है। ब्रेकथ्रू उस स्थिति को कहा जाता है, जब खुदाई के अलग-अलग हिस्सों के बीच बचा अंतिम अवरोध हट जाता है और रास्ता लगातार जुड़ जाता है। एस्केप टनल-1 में अब यह चरण पूरा हो चुका है। इससे संबंधित सुरंग के भीतर आगे के निर्माण कार्यों के लिए लगातार पहुंच उपलब्ध हो सकेगी और परियोजना का एक महत्वपूर्ण काम आगे बढ़ेगा।
इस उपलब्धि का विशेष महत्व सुरंग के रास्ते में मौजूद कठिन चट्टानी परिस्थितियों के कारण है। रेलवे मंत्रालय के हवाले से प्रकाशित जानकारी के अनुसार, यहां चट्टानों में कई स्तरों पर मोड़, दरारें और भूगर्भीय हलचल के प्रभाव मौजूद हैं। कुछ हिस्सों में चट्टानें अत्यधिक टूटी और दबाव से प्रभावित हैं। मेन बाउंड्री थ्रस्ट के करीब होने के कारण परिस्थितियां और जटिल बनीं। ऐसे भूगर्भीय क्षेत्र से होकर खुदाई पूरी करने को संबंधित टीमों की तकनीकी क्षमता और समन्वय की उपलब्धि बताया गया है।
पहाड़ों में सुरंग बनाते समय केवल लंबाई ही चुनौती नहीं होती। रास्ते के साथ बदलती चट्टानों की प्रकृति, जमीन का दबाव और भूगर्भीय परिस्थितियां निर्माण की गति तथा तरीके को प्रभावित करती हैं। इसलिए इंजीनियरिंग टीमों को खुदाई के दौरान सामने आ रही स्थितियों के अनुसार काम करना पड़ता है। परियोजना से संबंधित इंजीनियरिंग संस्था एफएस इंजीनियरिंग भी इस रेल मार्ग के भूगर्भीय और भौगोलिक क्षेत्र को अत्यधिक जटिल बताती है। रेल लाइन का अधिकांश हिस्सा जमीन के भीतर से होकर गुजरना इसकी निर्माण चुनौती को बढ़ाता है।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना की लंबाई करीब 125 किलोमीटर है। इसे रेल विकास निगम लिमिटेड के माध्यम से विकसित किया जा रहा है। परियोजना में 12 स्टेशन प्रस्तावित हैं और करीब 104 किलोमीटर मार्ग सुरंगों के भीतर से होकर गुजरेगा। ईटी इंफ्रा की रिपोर्ट के अनुसार, इसमें मुख्य सुरंगों के साथ एस्केप टनल और कई पुलों का निर्माण शामिल है। इससे स्पष्ट होता है कि पूरी रेल लाइन तैयार करने में भूमिगत निर्माण तथा सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं की बड़ी भूमिका है।
एस्केप टनल का उद्देश्य आपात स्थिति में सुरक्षित निकासी के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराना होता है। लंबी रेलवे सुरंगों में ऐसी व्यवस्था यात्रियों और कर्मचारियों की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मुख्य रेल सुरंग और निकासी सुरंग की भूमिका अलग होती है। इसलिए एस्केप टनल का ब्रेकथ्रू सुरक्षा ढांचे की दिशा में प्रगति दर्शाता है। इसके बाद संबंधित सुरंग को निर्धारित उपयोग के लिए तैयार करने के अन्य निर्माण और तकनीकी चरण पूरे किए जाते हैं।
परियोजना के पूरा होने की समयसीमा को लेकर अगस्त में आरवीएनएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक सलीम अहमद ने दिसंबर 2029 का लक्ष्य बताया था। उस समय प्रकाशित जानकारी में परियोजना की कुल प्रगति लगभग 78 प्रतिशत और सुरंगों की खुदाई करीब 97 प्रतिशत पूरी होने का उल्लेख था। इन दोनों आंकड़ों का अलग होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि खुदाई पूरी होने के बाद भी रेल लाइन के अन्य हिस्सों और प्रणालियों पर काम रहता है।
रेल परियोजना का उद्देश्य ऋषिकेश और कर्णप्रयाग के बीच संपर्क बेहतर करना तथा पर्वतीय क्षेत्र तक पहुंच आसान बनाना है। आरवीएनएल ने इसे क्षेत्रीय विकास, पर्यटन, व्यापार और आपदा संबंधी तैयारियों के लिए उपयोगी बताया है। रेलवे संपर्क विकसित होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को अवसर मिलने की उम्मीद है। हालांकि, वास्तविक लाभ रेल सेवा शुरू होने और उसके संचालन के स्वरूप से तय होंगे।
एस्केप टनल-1 का अंतिम हिस्सा जुड़ना इस दिशा में ठोस प्रगति है। फिर भी ब्रेकथ्रू को पूरी रेल परियोजना तैयार होने या ट्रेन संचालन शुरू होने के बराबर नहीं माना जा सकता। सुरंगों को तैयार करने के साथ पटरी, विद्युत व्यवस्था, सिग्नलिंग, स्टेशन और आवश्यक परीक्षण जैसे चरण भी पूरे करने होते हैं। फिलहाल 10.847 किलोमीटर लंबी सुरंग का लगातार जुड़ जाना हिमालयी रेल निर्माण की महत्वपूर्ण सफलता है। अब आगे के कार्यों के पूरा होने से ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल संपर्क का लक्ष्य और निकट आएगा।