नई दिल्ली। मुस्लिम विवाह और तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाई कोर्ट ने ‘तलाक-ए-हसन’ की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ में मान्यता प्राप्त तलाक के तरीकों में से एक माना। इस फैसले के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर तलाक-ए-हसन क्या है और यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2017 में अमान्य घोषित किए गए ‘तलाक-ए-बिद्दत’ यानी एक साथ तीन तलाक से कैसे अलग है।
मामला एक मुस्लिम महिला की याचिका से जुड़ा है, जिसने अपने पति की ओर से शुरू की गई तलाक-ए-हसन प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी। महिला ने प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की थी। अदालत ने अंतरिम स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि तलाक-ए-हसन और एक साथ तीन तलाक को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
हालांकि अदालत का मौजूदा रुख अंतरिम राहत के संदर्भ में है। इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े सभी संवैधानिक सवालों पर अंतिम और सार्वभौमिक फैसला समझना उचित नहीं होगा।
आखिर क्या है तलाक-ए-हसन?
तलाक-ए-हसन मुस्लिम पर्सनल लॉ में वर्णित तलाक की एक प्रक्रिया है। इसमें पति एक ही समय पर तीन बार तलाक नहीं बोलता। इसके बजाय तलाक की घोषणा अलग-अलग समय पर की जाती है।
सामान्य रूप से तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया में पति पत्नी को पहली बार तलाक की घोषणा करता है। इसके बाद निर्धारित अवधि का इंतजार किया जाता है। फिर दूसरी घोषणा और उसके बाद तीसरी घोषणा की जाती है।
इन घोषणाओं के बीच समय दिया जाता है ताकि पति-पत्नी को अपने फैसले पर दोबारा विचार करने और सुलह करने का अवसर मिल सके।
यही अंतर तलाक-ए-हसन को एक साथ तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत से अलग बनाता है।
तीन घोषणाओं के बीच होता है अंतराल
तलाक-ए-हसन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि तीनों घोषणाएं एक साथ नहीं की जातीं। इनके बीच अंतराल होता है। परंपरागत विवरण के अनुसार घोषणाएं अलग-अलग ‘तुहर’ यानी मासिक धर्म के बीच की शुद्ध अवधि में की जाती हैं और इस दौरान वैवाहिक संबंध न बनाने जैसी शर्तों का भी उल्लेख मिलता है।
इस अंतराल का उद्देश्य तलाक को तत्काल और आवेग में लिया गया फैसला बनने से रोकना माना जाता है।
पहली या दूसरी घोषणा के बाद पति-पत्नी में सुलह हो जाती है तो तलाक की प्रक्रिया आगे बढ़ने से रोकी जा सकती है। लेकिन तीसरी घोषणा पूरी होने के बाद तलाक अंतिम रूप ले सकता है।
इसी वजह से तलाक-ए-हसन में पुनर्विचार और सुलह की गुंजाइश को महत्वपूर्ण माना जाता है।
एक साथ तीन तलाक क्या था?
तलाक-ए-बिद्दत को आम बोलचाल में ‘तीन तलाक’ कहा जाता है। इसमें पति एक ही बैठक या एक ही समय पर तीन बार ‘तलाक’ कहकर विवाह समाप्त करने का दावा करता था।
इसके लिए तीन अलग-अलग अवधियों का इंतजार नहीं किया जाता था। यही इसकी सबसे विवादास्पद विशेषता थी।
2017 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने **Shayara Bano बनाम Union of India** मामले में 3:2 के बहुमत से तत्काल तीन तलाक की प्रथा को अमान्य कर दिया था।
इसके बाद संसद ने 2019 में **Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act** बनाया। कानून ने तलाक-ए-बिद्दत या इसी प्रकार तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक की घोषणा को शून्य और अवैध घोषित किया।
इसलिए भारत में पति केवल एक साथ तीन बार तलाक कहकर कानूनी रूप से विवाह समाप्त नहीं कर सकता।
तलाक-ए-हसन और तीन तलाक में सबसे बड़ा फर्क
दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर **समय और प्रक्रिया** का है।
तलाक-ए-बिद्दत में तीन तलाक एक साथ कहे जाते थे और इसे तत्काल प्रभावी मानने का दावा किया जाता था। दूसरी ओर तलाक-ए-हसन में तलाक की घोषणाएं अलग-अलग अवधि में की जाती हैं।
तलाक-ए-हसन में पहली और दूसरी घोषणा के बीच विवाह को बचाने तथा सुलह करने की संभावना रहती है। तत्काल तीन तलाक में ऐसी व्यावहारिक गुंजाइश नहीं थी।
इसी अंतर को अदालतों में दोनों प्रक्रियाओं को अलग-अलग देखने का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।
हाई कोर्ट ने रोक लगाने से क्यों किया इनकार?
याचिकाकर्ता महिला ने तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए अदालत से अंतरिम रोक की मांग की थी। लेकिन हाई कोर्ट ने इस स्तर पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया।
अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि तलाक-ए-हसन मुस्लिम पर्सनल लॉ में मान्यता प्राप्त तलाक की प्रक्रिया है और यह तत्काल तीन तलाक से अलग है।
अदालत के सामने यह सवाल भी था कि क्या अंतरिम आदेश के जरिए ऐसी प्रक्रिया को रोकना उचित होगा, जबकि इससे जुड़े कानूनी और व्यक्तिगत तथ्य विस्तृत सुनवाई की मांग करते हैं।
रोक से इनकार का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने हर परिस्थिति में तलाक-ए-हसन की प्रत्येक घोषणा को स्वतः वैध मान लिया है। किसी विशेष मामले में प्रक्रिया और कानूनी आवश्यकताओं का पालन हुआ या नहीं, इसकी अलग जांच हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच चुका है मामला
तलाक-ए-हसन को लेकर पहले भी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे महिलाओं के समानता और गरिमा के अधिकार से जोड़ा है।
दूसरी तरफ मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े पक्षों का तर्क रहा है कि तलाक-ए-हसन धार्मिक व्यक्तिगत कानून में मान्यता प्राप्त प्रक्रिया है और इसे तत्काल तीन तलाक के समान नहीं माना जाना चाहिए।
यही कारण है कि यह मामला केवल वैवाहिक विवाद नहीं बल्कि व्यक्तिगत कानून, धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और मौलिक अधिकारों से जुड़ी व्यापक कानूनी बहस का हिस्सा है।
क्या पत्नी के पास भी विवाह खत्म करने का अधिकार है?
मुस्लिम कानून में विवाह समाप्त करने के लिए केवल पति की ओर से तलाक ही एकमात्र रास्ता नहीं है। महिला के लिए भी विभिन्न कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं।
‘खुला’ एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पत्नी विवाह से अलग होने की मांग कर सकती है। इसके अलावा विवाह अनुबंध की शर्तों के आधार पर ‘तलाक-ए-तफवीज’ जैसे प्रावधान का संदर्भ भी मिलता है।
भारत में मुस्लिम महिला **Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939** के तहत भी निर्धारित आधारों पर अदालत से विवाह विच्छेद की डिक्री मांग सकती है।
घरेलू हिंसा, भरण-पोषण, बच्चों की अभिरक्षा और अन्य अधिकारों के लिए भी अलग-अलग भारतीय कानूनों के तहत कानूनी उपाय उपलब्ध हो सकते हैं।
2019 के कानून से कैसे अलग है मामला?
यह समझना जरूरी है कि 2019 में बनाया गया कानून मुख्य रूप से तलाक-ए-बिद्दत यानी तत्काल और अपरिवर्तनीय तीन तलाक से संबंधित है।
इस कानून के तहत तत्काल तीन तलाक की घोषणा कानूनी रूप से शून्य और अवैध है। कानून में ऐसी घोषणा करने वाले पति के लिए दंडात्मक प्रावधान भी रखे गए हैं।
लेकिन तलाक-ए-हसन में तीन घोषणाएं एक साथ नहीं होतीं। इसलिए इसे स्वतः 2019 के कानून के तहत प्रतिबंधित तत्काल तीन तलाक मान लेना सही नहीं है।
यही कानूनी अंतर मौजूदा विवाद को महत्वपूर्ण बनाता है।
महिलाओं के अधिकारों को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?
तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वालों का प्रमुख तर्क लैंगिक समानता से जुड़ा है। उनका सवाल है कि यदि विवाह में दोनों पक्ष बराबर हैं तो विवाह समाप्त करने की एकतरफा शक्ति केवल पति के पास क्यों होनी चाहिए।
इसे संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार और अनुच्छेद 21 में निहित गरिमा के अधिकार से जोड़कर भी चुनौती दी जाती रही है।
दूसरी तरफ पर्सनल लॉ के समर्थक धार्मिक परंपराओं और संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों का हवाला देते हैं।
इसलिए अदालतों के सामने चुनौती केवल तलाक की एक प्रक्रिया तय करने की नहीं बल्कि व्यक्तिगत कानून और मौलिक अधिकारों के बीच संवैधानिक संतुलन की भी है।
हर मामले में प्रक्रिया की जांच जरूरी
तलाक-ए-हसन का नाम इस्तेमाल कर देने भर से कोई भी तलाक स्वतः कानूनी नहीं हो जाता। यदि किसी विवाद में मामला अदालत तक पहुंचता है तो यह देखा जा सकता है कि संबंधित व्यक्तिगत कानून के अनुसार आवश्यक प्रक्रिया वास्तव में पूरी की गई या नहीं।
घोषणा की तारीख, दोनों पक्षों को जानकारी, सुलह की गुंजाइश और अन्य परिस्थितियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं। इसके अलावा भरण-पोषण, मेहर, बच्चों की कस्टडी और घरेलू हिंसा जैसे सवाल तलाक से अलग कानूनी अधिकार पैदा कर सकते हैं।
इसलिए वास्तविक विवाद में किसी व्यक्ति को केवल सामान्य जानकारी के आधार पर फैसला लेने के बजाय योग्य पारिवारिक कानून विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।
अभी खत्म नहीं हुई कानूनी बहस
कुल मिलाकर हाई कोर्ट द्वारा तलाक-ए-हसन पर तत्काल रोक लगाने से इनकार के बाद यह विषय फिर चर्चा में है। तलाक-ए-हसन और तत्काल तीन तलाक के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर यही है कि हसन प्रक्रिया में तलाक की घोषणाएं अंतराल के साथ होती हैं और शुरुआती चरणों में सुलह की गुंजाइश रहती है। इसके विपरीत तलाक-ए-बिद्दत में एक ही समय पर तीन तलाक देकर विवाह तत्काल समाप्त करने का दावा किया जाता था, जिसे सुप्रीम कोर्ट अमान्य कर चुका है।
लेकिन तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता और लैंगिक समानता से जुड़े व्यापक सवालों पर न्यायिक बहस जारी रही है। इसलिए हाई कोर्ट के अंतरिम स्तर पर रोक से इनकार को इन सभी मुद्दों पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं माना जाना चाहिए।
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