नई दिल्ली: आम लोगों की रसोई पर महंगाई का दबाव बना हुआ है। रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल चीनी की कीमतें कई जगह 60 रुपये प्रति किलो के पार बनी हुई हैं। सरकार की ओर से कीमतों को नियंत्रित करने और बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन खुदरा स्तर पर उपभोक्ताओं को अभी अपेक्षित राहत नहीं मिल रही है। चीनी के ऊंचे भाव का सीधा असर घरेलू बजट के साथ मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की लागत पर भी पड़ रहा है।
बाजार में चीनी की कीमत अलग-अलग शहरों और राज्यों में अलग है। परिवहन लागत, स्थानीय मांग, थोक बाजार में उपलब्धता और खुदरा व्यापारियों के मार्जिन के कारण कीमतों में अंतर देखने को मिलता है। कई बाजारों में सामान्य गुणवत्ता वाली चीनी भी 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर बिक रही है। बेहतर गुणवत्ता और पैकेज्ड चीनी के लिए उपभोक्ताओं को इससे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। चीनी के दामों में तेजी को देखते हुए सरकार लगातार बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए है। केंद्र की कोशिश है कि घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और किसी तरह की कृत्रिम कमी पैदा न हो। इसके लिए स्टॉक, उत्पादन और बाजार में आपूर्ति की स्थिति की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके बावजूद खुदरा बाजार में दाम तेजी से नीचे नहीं आने से उपभोक्ताओं की परेशानी बरकरार है।
चीनी की कीमत तय होने में गन्ने की लागत और चीनी मिलों की स्थिति की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गन्ना खरीदने से लेकर उसकी पेराई, चीनी उत्पादन, भंडारण और परिवहन तक कई स्तरों पर लागत जुड़ती जाती है। इसके बाद थोक और खुदरा बाजार के मार्जिन को जोड़ने पर उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते चीनी की कीमत और बढ़ जाती है। देश में चीनी उत्पादन को लेकर मौसम भी एक महत्वपूर्ण कारक है। प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में बारिश की स्थिति, फसल की उत्पादकता और गन्ने में चीनी की रिकवरी दर उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। अगर किसी सीजन में उत्पादन अनुमान से कम रहता है या भविष्य में आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनती है तो उसका असर पहले ही बाजार भाव पर दिखाई देने लगता है। वहीं त्योहारों का सीजन भी चीनी की मांग बढ़ाने वाला प्रमुख कारण है। मिठाई, बेकरी उत्पाद, पेय पदार्थ और अन्य खाद्य वस्तुओं के उत्पादन में बड़ी मात्रा में चीनी का इस्तेमाल किया जाता है। त्योहारी मांग बढ़ने के साथ थोक बाजार में चीनी की खरीद भी बढ़ जाती है। ऐसे समय में यदि आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं बढ़ती है तो खुदरा कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू बाजार में उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर चीनी उपलब्ध कराने के साथ किसानों और चीनी मिलों के हितों के बीच संतुलन बनाने की है। गन्ना किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलना जरूरी है, वहीं मिलों को भी उत्पादन लागत निकालनी होती है। दूसरी तरफ लगातार महंगी चीनी आम उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालती है। चीनी उद्योग का संबंध केवल घरेलू खपत से नहीं बल्कि एथेनॉल उत्पादन और निर्यात नीति से भी जुड़ा है। गन्ने और उसके उत्पादों का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में किया जाता है। सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो जाता है कि एथेनॉल उत्पादन और अन्य उपयोगों के बावजूद घरेलू उपभोग के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे।
खुदरा और थोक कीमतों के बीच अंतर भी उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई बार थोक बाजार में कीमतों में कमी आने के बावजूद उसका फायदा तुरंत खुदरा ग्राहकों तक नहीं पहुंचता। पुराने स्टॉक, परिवहन खर्च और व्यापारिक मार्जिन जैसे कारणों से खुदरा कीमतें कुछ समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। इसलिए केवल थोक भाव में गिरावट से आम आदमी को तत्काल राहत मिलना जरूरी नहीं है।
बढ़ती कीमतों का सबसे ज्यादा असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। घरों में चाय, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थों में रोजाना चीनी का इस्तेमाल होता है। एक किलो चीनी की कीमत में कुछ रुपये की बढ़ोतरी भले ही छोटी लगे, लेकिन अन्य खाद्य वस्तुओं की महंगाई के साथ मिलकर यह मासिक बजट पर अतिरिक्त दबाव डालती है। इसके अलावा मिठाई की दुकानों, छोटे होटल-रेस्तरां, चाय की दुकानों और बेकरी कारोबारियों के लिए भी चीनी की कीमत अहम है। कच्चे माल की लागत बढ़ने पर कारोबारियों के सामने या तो अपना मुनाफा कम करने या तैयार उत्पादों के दाम बढ़ाने की स्थिति बन सकती है। इसका अंतिम असर फिर उपभोक्ता पर ही पड़ता है। बाजार विशेषज्ञों की नजर अब आने वाले चीनी सीजन, गन्ने की उपलब्धता और उत्पादन अनुमानों पर रहेगी। यदि उत्पादन बेहतर रहता है और बाजार में आपूर्ति पर्याप्त बनी रहती है तो कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना बन सकती है। इसके विपरीत उत्पादन में कमी या मांग में तेज बढ़ोतरी होने पर दाम ऊंचे बने रह सकते हैं।
सरकार के लिए जमाखोरी और कृत्रिम कमी पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है। बाजार में पर्याप्त स्टॉक मौजूद होने के बावजूद यदि आपूर्ति श्रृंखला में किसी स्तर पर माल रोका जाता है तो खुदरा कीमतों पर इसका असर पड़ सकता है। इसलिए स्टॉक और बाजार आपूर्ति की नियमित निगरानी से कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। फिलहाल आम उपभोक्ताओं की नजर इस बात पर है कि चीनी की कीमत कब नीचे आएगी। 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर के भाव ने घरेलू बजट की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले दिनों में उत्पादन, उपलब्धता और सरकार की बाजार प्रबंधन नीति तय करेगी कि उपभोक्ताओं को चीनी की महंगाई से राहत मिलती है या ऊंचे दामों का सिलसिला आगे भी जारी रहता है।