नई दिल्ली : संसद के मॉनसून सत्र में जारी राजनीतिक गतिरोध और विपक्ष की आपत्तियों के बीच केंद्र सरकार ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट यानी FCRA संशोधन विधेयक 2026 को विस्तृत समीक्षा के लिए संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने का फैसला किया है। इसके लिए 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। आधिकारिक प्रस्ताव के मुताबिक समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सांसद शामिल होंगे। समिति को विधेयक के प्रावधानों की गहन समीक्षा के बाद अपनी रिपोर्ट संसद में पेश करनी होगी।
प्रस्ताव के अनुसार 21 लोकसभा सदस्यों का चयन लोकसभा अध्यक्ष करेंगे, जबकि राज्यसभा के 10 सदस्यों का चयन राज्यसभा के सभापति द्वारा किया जाएगा। समिति की बैठक के लिए कुल सदस्यों के करीब एक-तिहाई यानी एक तिहाई सदस्यों की मौजूदगी को कोरम माना जाएगा। लोकसभा की ओर से राज्यसभा से भी इस संयुक्त समिति में अपने 10 सदस्यों को नामित करने और उनके नामों की औपचारिक जानकारी देने का आग्रह किया गया है।
FCRA संशोधन विधेयक 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। यह विधेयक विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों यानी NGOs, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं और ट्रस्टों के नियमन से जुड़ा हुआ है। विदेशी योगदान हासिल करने वाले संगठनों के कामकाज और उनके वित्तीय लेनदेन को नियंत्रित करने के लिए FCRA के तहत पहले से कई प्रावधान लागू हैं। प्रस्तावित संशोधन के जरिए इन नियमों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए जाने हैं।
विधेयक के जिन प्रावधानों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हुई है, उनमें FCRA पंजीकरण से जुड़ी संपत्तियों का प्रावधान प्रमुख है। प्रस्ताव के अनुसार यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, उसकी वैधता समाप्त हो जाती है या संस्था स्वयं अपना पंजीकरण सरेंडर करती है, तो विदेशी योगदान से तैयार की गई उसकी संपत्तियों को एक प्राधिकरण के अधीन लाने का प्रावधान किया गया है। सरकार का उद्देश्य ऐसी संपत्तियों के इस्तेमाल और नियंत्रण को लेकर स्पष्ट व्यवस्था तैयार करना बताया जा रहा है।
विधेयक में नियमों के उल्लंघन पर प्रस्तावित सजा को लेकर भी बदलाव किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अधिकतम सजा की अवधि को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव है। सरकार की ओर से विधेयक के जरिए FCRA व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने की कोशिश बताई गई है, लेकिन विपक्ष और कुछ धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं ने इसके कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं।
विरोध करने वाले पक्षों का तर्क है कि प्रस्तावित बदलावों से कार्यपालिका को संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए व्यापक अधिकार मिल सकते हैं। कुछ संगठनों ने संपत्तियों को प्राधिकरण के अधीन करने के प्रावधान को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि ऐसे प्रावधानों का इस्तेमाल यदि उचित सुरक्षा उपायों के बिना किया गया तो संस्थाओं के कामकाज और उनकी संपत्तियों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
विपक्षी दलों और विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों की ओर से उठाई गई चिंताओं के बीच सरकार ने विधेयक को सीधे आगे बढ़ाने के बजाय इसे विस्तृत जांच के लिए JPC को भेजने का रास्ता चुना है। संयुक्त संसदीय समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसद शामिल होंगे। समिति विभिन्न पक्षों की राय सुन सकती है और विधेयक के प्रावधानों पर विस्तार से विचार कर सकती है। इसके बाद समिति अपनी सिफारिशों के साथ रिपोर्ट संसद के सामने रखेगी।
समिति को अपनी रिपोर्ट संसद के आगामी शीतकालीन सत्र 2026 के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक लोकसभा में पेश करनी होगी। इसका मतलब है कि समिति को निर्धारित समय सीमा के भीतर विधेयक के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं की समीक्षा पूरी करनी होगी। संसदीय समिति के कामकाज पर लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन से संबंधित नियम लागू होंगे। जरूरत पड़ने पर समिति के अध्यक्ष इन नियमों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवश्यक बदलाव कर सकते हैं।
FCRA से जुड़े कानूनों का असर उन संस्थाओं पर पड़ता है जो विदेशों से मिलने वाले योगदान के जरिए सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक या अन्य गतिविधियां संचालित करती हैं। ऐसे में प्रस्तावित संशोधन को लेकर सरकार और संबंधित संस्थाओं के बीच संतुलन का मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है। एक तरफ सरकार विदेशी फंड के इस्तेमाल में पारदर्शिता और नियमों के पालन पर जोर देती है, वहीं दूसरी तरफ संस्थाएं यह सुनिश्चित करने की मांग करती हैं कि नियमों के नाम पर उनके वैध कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप न हो।
अब JPC में विधेयक के प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा के बाद आगे की तस्वीर साफ होगी। समिति की सिफारिशों के आधार पर विधेयक में बदलाव किए जा सकते हैं। इसके बाद सरकार इसे संसद में आगे बढ़ाने की प्रक्रिया अपनाएगी। फिलहाल FCRA संशोधन विधेयक को JPC के पास भेजे जाने के फैसले से सरकार ने इस मुद्दे पर व्यापक संसदीय समीक्षा का रास्ता खोल दिया है। आने वाले महीनों में समिति की बैठकें और विभिन्न पक्षों की राय इस विधेयक के अंतिम स्वरूप को प्रभावित कर सकती हैं।