क्या है आयकर अधिनियम की धारा 13A?
आयकर अधिनियम की धारा 13A राजनीतिक दलों की आय से संबंधित विशेष प्रावधान है। इसके तहत कुछ शर्तों को पूरा करने पर राजनीतिक दलों की विभिन्न प्रकार की आय और स्वैच्छिक योगदान को कुल आय में शामिल नहीं किया जाता। आधिकारिक आयकर विभाग के विवरण के अनुसार धारा 13A(d) में व्यवस्था है कि 2,000 रुपये से अधिक का दान राजनीतिक दल को अकाउंट पेयी चेक बैंक ड्राफ्ट बैंकिंग इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सिस्टम या निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जैसे तरीकों से प्राप्त होना चाहिए। इसी
व्यवस्था को लेकर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जब देश में UPI और दूसरे डिजिटल भुगतान माध्यमों का बड़े पैमाने पर विस्तार हो चुका है तब राजनीतिक दलों को 2,000 रुपये से कम नकद योगदान स्वीकार करने की गुंजाइश जारी रखने का पर्याप्त औचित्य नहीं है। याचिका के मुताबिक इस व्यवस्था के जरिए दानदाता की पहचान सामने आए बिना बड़ी संख्या में छोटे-छोटे नकद योगदान दिखाए जा सकते हैं।
मतदाताओं के सूचना के अधिकार का मुद्दा याचिका में राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता को मतदाताओं के सूचना के अधिकार से भी जोड़ा गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार किसी राजनीतिक दल को पैसा कहां से मिल रहा है और उसके वित्तीय समर्थक कौन हैं इसकी जानकारी मतदाता के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। याचिका में दावा किया गया है कि राजनीतिक चंदे के स्रोत की जानकारी नहीं मिलने से मतदाता पूरी जानकारी के आधार पर अपना चुनावी फैसला नहीं कर पाता। इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाले सूचना के अधिकार से जोड़ते हुए धारा 13A(d) को चुनौती दी गई है।
चुनाव आयोग के लिए भी मांगे गए निर्देश
याचिका केवल
धारा 13A(d) को चुनौती देने तक सीमित नहीं है। इसमें चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के वित्तीय लेन-देन की निगरानी के संबंध में कई निर्देश देने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता चाहता है कि राजनीतिक दलों के पंजीकरण और चुनाव चिह्न आवंटन की शर्तों में यह व्यवस्था जोड़ी जाए कि कोई भी राजनीतिक दल नकद में चंदा स्वीकार न करे। साथ ही सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों की Form 24A contribution reports की जांच करने की मांग की गई है। जिन योगदानों के संबंध में दानदाता का पता या PAN उपलब्ध नहीं कराया गया हो उनके संबंध में भी कार्रवाई की मांग की गई है। याचिका में चुनाव आयोग से उन राजनीतिक दलों के खिलाफ Election Symbols Order 1968 के तहत कदम उठाने की मांग भी की गई है जो निर्धारित समय में पूरे विवरण के साथ योगदान रिपोर्ट दाखिल नहीं करते।
CBDT से पांच साल के रिकॉर्ड की जांच की मांग
याचिकाकर्ता ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी CBDT को भी राजनीतिक दलों के आयकर रिटर्न और ऑडिट रिपोर्ट की जांच करने का निर्देश देने की मांग की है। इसमें पिछले पांच वर्षों के रिकॉर्ड की जांच की बात कही गई है। याचिका के अनुसार यदि किसी राजनीतिक दल ने आयकर अधिनियम की धारा 13A और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29C के तहत आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया है तो उसके खिलाफ टैक्स पेनल्टी और अन्य वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए। धारा 29C राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त कुछ योगदानों की घोषणा से संबंधित है।
चुनावी बॉन्ड के फैसले का भी जिक्र
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2024 के चुनावी बॉन्ड फैसले का भी उल्लेख किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक ठहराया था। मौजूदा याचिका में उसी व्यापक मुद्दे यानी राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता और मतदाताओं को जानकारी उपलब्ध होने के अधिकार का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनावी बॉन्ड व्यवस्था समाप्त होने के बाद राजनीतिक चंदे के दूसरे माध्यमों में भी पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
नकद चंदा देने वाले को टैक्स कटौती भी नहीं
राजनीतिक चंदे से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण आयकर प्रावधान धारा 80GGC है। इसके तहत पात्र व्यक्ति द्वारा किसी राजनीतिक दल या इलेक्टोरल ट्रस्ट को दिए गए योगदान पर आयकर में कटौती मिल सकती है लेकिन नकद में दिए गए योगदान पर यह कटौती उपलब्ध नहीं है। इस कारण मौजूदा विवाद में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जब टैक्स व्यवस्था खुद डिजिटल या बैंकिंग माध्यमों से राजनीतिक योगदान को प्रोत्साहित करती है तो राजनीतिक दलों के लिए छोटे नकद चंदों की मौजूदा व्यवस्था कितनी उचित है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर नजर
सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई राजनीतिक फंडिंग की व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि अदालत याचिका में उठाए गए मुद्दों पर व्यापक निर्देश देती है या धारा 13A(d) की मौजूदा व्यवस्था में हस्तक्षेप करती है तो भविष्य में राजनीतिक दलों के नकद चंदे स्वीकार करने के तरीके पर असर पड़ सकता है। फिलहाल यह मामला विचाराधीन है और धारा 13A(d) को असंवैधानिक घोषित नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने इसकी वैधता को चुनौती दी है। इसलिए सुनवाई के बाद अदालत का रुख और आगे दिए जाने वाले आदेश राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण होंगे।