Delhi दिल्ली: गुरुवार को अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में हलचल मच गई। कांग्रेस ने इस समझौते की निंदा करते हुए इसे 'इस्लामाबाद MoU' कहा और केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन अब आधिकारिक रूप से जारी कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता पाकिस्तान की नई क्षेत्रीय स्थिति और वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है और भारत के रणनीतिक हितों के लिए बड़ा झटका हो सकता है।

जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि उसने इस मामले में अपनी कूटनीतिक और वैश्विक रणनीति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि 'इस्लामाबाद MoU' से न केवल क्षेत्रीय राजनीतिक संतुलन प्रभावित होगा, बल्कि इसका असर आर्थिक और सुरक्षा हितों पर भी पड़ सकता है।

उन्होंने चेतावनी दी कि भारत को अब अधिक सतर्कता और कूटनीतिक सक्रियता दिखानी होगी ताकि देश की सुरक्षा और रणनीतिक हितों को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे। कांग्रेस ने केंद्र से यह भी मांग की कि वह इस समझौते के प्रभाव का विस्तृत मूल्यांकन करे और इसे लेकर संसद में जानकारी साझा करे।

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच यह समझौता मध्यपूर्वी राजनीति में नई दिशा को जन्म दे सकता है। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने आपसी तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ाने के लिए कई क्षेत्रों में सहयोग करने पर सहमति जताई है। हालांकि, इसका सीधा असर दक्षिण एशिया और भारत-पाकिस्तान समीकरण पर भी पड़ेगा।

कांग्रेस के इस रुख के बाद राजनीतिक गलियारे में बहस तेज हो गई है। विपक्षी दल केंद्र सरकार से स्पष्ट बयान और रणनीतिक कदमों की मांग कर रहे हैं ताकि क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

इस समझौते को लेकर भविष्य में भारत की विदेश नीति और रणनीतिक कूटनीति पर भी व्यापक चर्चा होने की संभावना है। केंद्र सरकार इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुकी है, लेकिन विपक्ष की आलोचना और चिंता जारी है।

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