जाति जनगणना और आरक्षण पर आमने-सामने आए भागवत और चंद्रशेखर, सियासत गरमाई
नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण को लेकर दिए गए बयान के बाद देश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। भागवत ने कहा कि जब तक समाज में भेदभाव और असमानता बनी रहेगी, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों को आरक्षण का पर्याप्त लाभ मिल चुका है, उन्हें उदारता दिखाते हुए स्वेच्छा से इसे छोड़ने पर विचार करना चाहिए। उनके इस बयान पर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इसी क्रम में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए जाति आधारित जनगणना कराने और मंडल आयोग की लंबित सिफारिशों को लागू करने की मांग उठाई है।
चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि देश में सामाजिक न्याय की वास्तविक स्थिति तभी स्पष्ट हो सकती है, जब जाति आधारित जनगणना कराई जाए और उसके साथ आर्थिक आंकड़े भी सार्वजनिक किए जाएं। उनके अनुसार, बिना वास्तविक आंकड़ों के यह तय करना संभव नहीं है कि किन वर्गों को आरक्षण का कितना लाभ मिला है, कौन-से समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़े हैं तथा कौन-से वर्ग आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को पारदर्शिता के साथ यह जानकारी देश के सामने रखनी चाहिए, ताकि आरक्षण और सामाजिक न्याय पर होने वाली बहस तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ सके।
नगीना सांसद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें यह याद है कि आज राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस है, लेकिन यह याद नहीं कि आज मंडल दिवस भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सामाजिक न्याय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा रही है। चंद्रशेखर ने मांग की कि मंडल आयोग की शेष 38 सिफारिशों को भी जल्द लागू किया जाए, ताकि पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों को संविधान की भावना के अनुरूप समान अवसर मिल सकें। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार संघर्ष करती रहेगी।
मंडल दिवस के अवसर पर आजाद समाज पार्टी ने "मंडल जन चेतना आंदोलन" की भी शुरुआत की। पार्टी के अनुसार, इस अभियान के माध्यम से प्रदेशभर में सामाजिक न्याय, शिक्षा और रोजगार में समान अवसर तथा संवैधानिक अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक किया जाएगा। पार्टी का कहना है कि यह आंदोलन केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी और प्रतिनिधित्व की दिशा में एक व्यापक जनअभियान होगा।
उधर, मोहन भागवत ने आरक्षण पर अपनी बात रखते हुए कहा था कि इस विषय को संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की भावना के अनुरूप समझा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरक्षण किसी विशेष वर्ग को स्थायी लाभ देने की व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने का एक संवैधानिक माध्यम है। उनका कहना था कि जब तक समाज में जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता मौजूद रहेगी, तब तक आरक्षण की आवश्यकता भी बनी रहेगी।
भागवत ने साथ ही यह सुझाव भी दिया कि जिन लोगों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है और जो सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सक्षम हो चुके हैं, वे स्वेच्छा से आरक्षण छोड़ने पर विचार कर सकते हैं, ताकि इसका लाभ उन लोगों तक पहुंच सके जिन्हें इसकी अधिक आवश्यकता है। हालांकि उन्होंने इसे किसी सरकारी नीति या अनिवार्यता के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत उदारता और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत किया।
भागवत के इस बयान के बाद आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। विपक्षी दल इसे जाति जनगणना, सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर से जोड़कर सरकार पर दबाव बना रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष और संघ परिवार के भीतर भी इस विषय पर अलग-अलग स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी समय में जाति जनगणना, आरक्षण की समीक्षा, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के प्रमुख विषय बने रह सकते हैं।
फिलहाल, मोहन भागवत के बयान और उस पर चंद्रशेखर आजाद की प्रतिक्रिया ने आरक्षण, सामाजिक समानता और संविधान की मूल भावना को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर राजनीतिक मंचों और सामाजिक संगठनों के बीच भी प्रमुख चर्चा का विषय बना रह सकता है।