शिवसेना के नाम और निशान पर घमासान, सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के फैसले पर तीखी बहस
नई दिल्ली : शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहे बहुचर्चित विवाद पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग (ईसीआई) के फैसले पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। उन्होंने दलील दी कि आयोग के पास किसी राजनीतिक दल के संविधान की वैधता तय करने का अधिकार नहीं है, जबकि उसने इसी आधार पर शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न का फैसला सुनाया।
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने अदालत को वर्ष 2022 में हुई शिवसेना की कार्यकारिणी समिति की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि उस समय एकनाथ शिंदे को नेता चुना गया था, लेकिन बाद में उसी समूह ने अपने फैसले से पलटी मार ली। उन्होंने आरोप लगाया कि शिंदे गुट ने पार्टी संविधान में मनमाने ढंग से बदलाव किए और संगठन के स्थापित नियमों की अनदेखी की। सिब्बल ने कहा कि दोनों गुट 2018 के मूल पार्टी संविधान के आधार पर अपने-अपने दावे कर रहे थे, लेकिन चुनाव आयोग ने संगठनात्मक दस्तावेजों की अनदेखी करते हुए केवल विधायकों की संख्या को आधार बना लिया।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग के समक्ष लाखों शपथपत्र (एफिडेविट) जमा किए गए थे, जिनमें बड़ी संख्या में पार्टी पदाधिकारियों, संगठन के सदस्यों और कार्यकर्ताओं ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व का समर्थन किया था। इसके बावजूद आयोग ने पार्टी संगठन की राय को महत्व नहीं दिया और केवल विधानसभा में विधायकों के बहुमत के आधार पर शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित कर दिया। उनके अनुसार यह निर्णय न केवल गलत था बल्कि चुनाव आयोग की संवैधानिक सीमाओं से भी बाहर था।
कपिल सिब्बल ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि किसी राजनीतिक दल का कौन-सा संविधान वैध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आयोग के अधिकार केवल किसी दल की मान्यता से जुड़े मामलों तक सीमित हैं, न कि उसके आंतरिक संविधान की वैधता निर्धारित करने तक। उन्होंने अदालत में कहा कि जब संवैधानिक संस्थाएं अपने अधिकारों की सीमा से आगे बढ़ती हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे विवाद पैदा होते हैं। उन्होंने कांग्रेस के विभाजन का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न दिए गए थे, जबकि शिवसेना मामले में आयोग ने पूरी पार्टी का नाम और प्रतीक एक गुट को सौंप दिया।
सिब्बल ने यह भी दलील दी कि चुनाव आयोग को नाम और चुनाव चिह्न पर फैसला देने से पहले विधायकों की अयोग्यता से संबंधित मामलों का निपटारा होने का इंतजार करना चाहिए था। उनका कहना था कि यदि पहले यह तय हो जाता कि कौन-से विधायक दल बदल कानून के तहत अयोग्य हैं, तभी वास्तविक राजनीतिक स्थिति स्पष्ट होती। लेकिन आयोग ने जल्दबाजी में फैसला सुनाते हुए शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न दे दिया, जिसके आधार पर उन्होंने चुनाव लड़ा और जीत भी दर्ज की।
उन्होंने अदालत को याद दिलाया कि यही तर्क पहले पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष भी रखा गया था। सिब्बल ने कहा कि 21 जून 2022 को केवल कुछ विधायक अलग हुए थे, पूरी शिवसेना पार्टी का विभाजन नहीं हुआ था। ऐसे में चुनाव आयोग को पहले यह निर्धारित करना चाहिए था कि क्या वास्तव में राजनीतिक दल दो हिस्सों में बंट गया था या केवल विधायक दल में टूट हुई थी।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय कुमार बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि विधायक दल से जुड़े विवाद और राजनीतिक दल की पहचान से जुड़े विवाद कानूनी रूप से अलग-अलग प्रश्न हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष का दायित्व यह तय करना होता है कि किसी विधायक ने स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ी है या नहीं, जबकि चुनाव आयोग का दायित्व यह निर्धारित करना है कि वास्तविक राजनीतिक दल कौन-सा है और चुनाव चिह्न किसे मिलना चाहिए।
न्यायमूर्ति बागची ने सुभाष देसाई मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल विधायक दल छोड़ देने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि संबंधित विधायक ने राजनीतिक दल भी छोड़ दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि स्पीकर किन आधारों पर यह तय करेंगे कि किसी विधायक ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है। क्या केवल पार्टी प्रमुख की बैठक में शामिल न होना, गुवाहाटी जाना या किसी अन्य राजनीतिक समूह के साथ बैठना ही पर्याप्त आधार माना जा सकता है?
इस पर कपिल सिब्बल ने जवाब दिया कि शिंदे गुट ने अपना अलग प्रस्ताव पारित किया, उद्धव ठाकरे द्वारा नियुक्त व्हिप को हटाकर नया व्हिप नियुक्त किया और समानांतर संगठनात्मक गतिविधियां शुरू कीं, जो स्पष्ट रूप से मूल पार्टी से अलग होने का संकेत हैं। हालांकि न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि ये सभी घटनाएं अयोग्यता याचिका दाखिल होने के बाद की हैं और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुसार अयोग्यता का फैसला मुख्य रूप से याचिका दाखिल होने के समय उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाता है।
शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहा यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक विवादों में से एक बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई और अंतिम फैसला न केवल इस राजनीतिक संघर्ष की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में राजनीतिक दलों के विभाजन, चुनाव आयोग की शक्तियों और दल-बदल कानून की व्याख्या पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।