नई दिल्ली : पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने भारत जैसी तेल आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के दाम करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 97 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर मौजूदा हालात बने रहे तो कच्चा तेल फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकता है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करके पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इससे आयात बिल बढ़ता है, रुपये पर दबाव आता है और महंगाई बढ़ने की संभावना पैदा होती है। इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है, क्योंकि पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर इसका प्रभाव पड़ता है।
100 डॉलर के करीब पहुंचा क्रूड ऑयल
गुरुवार दोपहर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 95.91 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत करीब 88.06 डॉलर प्रति बैरल रही। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक तनाव और आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं बनी रहती हैं तो वर्ष 2026 में कच्चे तेल की कीमत 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताएं हैं। खासतौर पर समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की बाधा आने से तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
GDP ग्रोथ पर पड़ सकता है असर
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो भारत की आर्थिक विकास दर प्रभावित हो सकती है। तेल महंगा होने से देश का आयात खर्च बढ़ेगा और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कच्चे तेल का औसत मूल्य लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है तो भारत की GDP ग्रोथ में गिरावट आ सकती है। अनुमान है कि विकास दर करीब 6.6 प्रतिशत तक सीमित हो सकती है, जबकि महंगाई दर बढ़कर 4.1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
इसके अलावा तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत के चालू खाता घाटे में करीब 20 अरब डॉलर तक का इजाफा कर सकती है। यह राशि भारत की GDP का लगभग 0.5 प्रतिशत के बराबर है। इससे आर्थिक दबाव बढ़ सकता है और विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है।
आम आदमी पर भी पड़ेगा असर
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थ, दवाइयां, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य जरूरी सामान भी महंगे हो सकते हैं।
डीजल की कीमत बढ़ने पर माल ढुलाई महंगी होती है, जिसका असर बाजार में मिलने वाले सामान की कीमतों पर दिखाई देता है। इसके अलावा उद्योगों की उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है।
सरकार और रिजर्व बैंक के लिए चुनौती
तेल की बढ़ती कीमतें सरकार और रिजर्व बैंक दोनों के लिए चुनौती बन सकती हैं। सरकार को महंगाई नियंत्रित रखने के लिए कई कदम उठाने पड़ सकते हैं, जबकि रिजर्व बैंक को ब्याज दरों और मौद्रिक नीति को लेकर सतर्क रहना होगा।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर पूरी दुनिया की नजर है। अगर कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाती हैं तो भारत समेत कई तेल आयात करने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। आने वाले दिनों में तेल बाजार की दिशा वैश्विक घटनाक्रम और आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करेगी।