UPI MDR पर सीतारमण की सफाई, ग्राहकों पर नहीं लगेगा शुल्क

Update: 2026-08-08 06:06 GMT

नई दिल्ली। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और RuPay डेबिट कार्ड जैसे डिजिटल भुगतान माध्यमों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि MDR को लेकर अंतिम फैसला अभी लिया जाना बाकी है और इस संबंध में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की अध्यक्षता वाली स्टीयरिंग कमेटी विचार कर रही है।

वित्त मंत्री ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए स्पष्ट किया कि MDR का संबंध व्यापारियों से है, न कि सीधे तौर पर डिजिटल भुगतान करने वाले ग्राहकों से। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में MDR व्यवस्था लागू होती है तो इसका शुल्क मर्चेंट यानी भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारी पर लागू होगा। आम ग्राहक से UPI के इस्तेमाल के लिए सीधे MDR वसूलने की बात नहीं है।

सीतारमण ने यह स्पष्टीकरण कांग्रेस नेता जयराम रमेश की उस टिप्पणी के जवाब में दिया, जिसमें उन्होंने आशंका जताई थी कि UPI का इस्तेमाल करने के लिए आम लोगों को भविष्य में अधिक पैसे चुकाने पड़ सकते हैं।

NPCI की स्टीयरिंग कमेटी करेगी फैसला

वित्त मंत्री ने बताया कि UPI और RuPay डेबिट कार्ड लेनदेन पर MDR को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। NPCI की अध्यक्षता वाली स्टीयरिंग कमेटी इस मुद्दे पर विचार कर रही है।

MDR डिजिटल भुगतान व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शुल्क है। जब कोई ग्राहक कार्ड, UPI या अन्य डिजिटल माध्यम से किसी व्यापारी को भुगतान करता है तो लेनदेन को पूरा कराने वाली भुगतान व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पक्षों की लागत होती है। इसी लागत की भरपाई के लिए MDR जैसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है।

हालांकि UPI के विस्तार के बाद इस शुल्क को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए UPI और RuPay को कम लागत वाली भुगतान व्यवस्था के रूप में विकसित किया है। ऐसे में MDR को लेकर कोई भी बदलाव डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के अलग-अलग हिस्सों को प्रभावित कर सकता है।

वित्त मंत्री ने ग्राहकों पर शुल्क की आशंका को किया खारिज

सीतारमण ने अपने बयान में खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि MDR व्यापारियों पर लागू होता है, ग्राहकों पर नहीं। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे, तकनीकी विकास, इनोवेशन और सुरक्षा में निवेश को मजबूत करना है।

वित्त मंत्री के मुताबिक, भुगतान प्रणाली को लगातार सुरक्षित और सक्षम बनाए रखने के लिए बैंकों तथा फिनटेक कंपनियों को निवेश करना पड़ता है। UPI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ लेनदेन की संख्या और भुगतान व्यवस्था पर तकनीकी दबाव भी बढ़ा है। ऐसे में सिस्टम की क्षमता बढ़ाने, साइबर सुरक्षा मजबूत करने और नई तकनीक विकसित करने के लिए पर्याप्त संसाधनों की जरूरत होती है।

उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में होने वाले निवेश का फायदा अंततः UPI इस्तेमाल करने वाले सभी लोगों को मिलेगा।

जयराम रमेश के बयान पर आया जवाब

MDR को लेकर वित्त मंत्री का यह बयान कांग्रेस नेता जयराम रमेश की टिप्पणी के बाद आया। रमेश ने आशंका जताई थी कि यदि UPI लेनदेन पर शुल्क व्यवस्था में बदलाव किया जाता है तो इसका बोझ आम लोगों पर पड़ सकता है।

इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए सीतारमण ने कहा कि MDR सीधे एंड यूजर्स या ग्राहकों पर लागू होने वाली फीस नहीं है। उन्होंने इस मुद्दे को डिजिटल भुगतान व्यवस्था के वित्तीय ढांचे से जोड़ते हुए कहा कि बैंकों और फिनटेक कंपनियों को सिस्टम के बुनियादी ढांचे और सुरक्षा में निवेश जारी रखने के लिए सक्षम बनाना जरूरी है।

इस बयान के बाद MDR को लेकर राजनीतिक और आर्थिक बहस फिर तेज हो गई है। एक ओर सरकार डिजिटल भुगतान व्यवस्था की स्थिरता और सुरक्षा के लिए पर्याप्त निवेश को जरूरी मान रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इस बात को लेकर सवाल उठा रहा है कि किसी भी नई शुल्क व्यवस्था का अप्रत्यक्ष असर आखिरकार आम उपभोक्ताओं पर न पड़े।

क्या है MDR?

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी से भुगतान प्रणाली से जुड़े पक्षों को मिल सकता है। इसमें बैंक, कार्ड नेटवर्क, भुगतान सेवा प्रदाता और अन्य तकनीकी भागीदार शामिल हो सकते हैं।

किसी डिजिटल भुगतान के पीछे केवल ग्राहक और दुकानदार ही नहीं होते, बल्कि भुगतान को सुरक्षित और तुरंत पूरा कराने के लिए कई तकनीकी प्रणालियां काम करती हैं। इन प्रणालियों के संचालन, रखरखाव और सुरक्षा पर लागत आती है।

MDR को इसी लागत की भरपाई के एक माध्यम के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, UPI को देश में बड़े पैमाने पर अपनाने के पीछे सरकार की नीति कम लागत और आसान डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना रही है।

UPI के विस्तार के साथ बढ़ी बहस

भारत में UPI ने डिजिटल भुगतान की तस्वीर बदल दी है। छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े कारोबारियों तक QR कोड के जरिए भुगतान स्वीकार करना सामान्य हो गया है। ग्राहक भी बैंक खाते से सीधे भुगतान करने के लिए UPI का व्यापक इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस तेजी से बढ़ते डिजिटल भुगतान बाजार के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि UPI के संचालन और विस्तार की लागत कौन वहन करेगा। बैंकों और फिनटेक कंपनियों की ओर से लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि बड़ी संख्या में छोटे मूल्य के लेनदेन को संचालित करने के लिए मजबूत तकनीकी ढांचे और पर्याप्त निवेश की जरूरत है।

दूसरी ओर, उपभोक्ताओं के लिए UPI की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसकी सरलता और कम लागत रही है। इसलिए किसी भी संभावित शुल्क व्यवस्था को लेकर ग्राहकों और व्यापारियों के बीच चिंता स्वाभाविक है।

सरकार के सामने संतुलन की चुनौती

MDR पर अंतिम फैसला लेते समय सरकार और संबंधित संस्थाओं के सामने दो प्रमुख चुनौतियां होंगी। पहली चुनौती UPI को आम लोगों के लिए सुलभ और कम लागत वाला बनाए रखना है। दूसरी ओर बैंकों, फिनटेक कंपनियों और भुगतान प्रणाली से जुड़े अन्य संस्थानों के लिए ऐसा आर्थिक मॉडल तैयार करना भी जरूरी है, जिससे वे तकनीकी बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा और इनोवेशन में पर्याप्त निवेश कर सकें।

NPCI की अध्यक्षता वाली स्टीयरिंग कमेटी की चर्चा इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। समिति की सिफारिशों के आधार पर आगे की नीति तय हो सकती है।

अंतिम फैसले का इंतजार

फिलहाल UPI और RuPay डेबिट कार्ड पर MDR को लेकर अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि इस विषय पर विचार चल रहा है और MDR व्यापारियों से संबंधित शुल्क है, न कि सीधे ग्राहकों पर लगाया जाने वाला शुल्क।

ऐसे में आने वाले दिनों में स्टीयरिंग कमेटी की सिफारिश और सरकार के अंतिम फैसले पर नजर रहेगी। फैसला यह तय करेगा कि भारत के तेजी से बढ़ते डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम की लागत और निवेश को किस तरह संतुलित किया जाए, जबकि UPI की आसान और व्यापक पहुंच भी बनी रहे।

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