नई दिल्ली। भारत के ऑफिस रियल एस्टेट बाजार में अब केवल किसी इमारत के पास ग्रीन या सस्टेनेबिलिटी सर्टिफिकेट होना ही किरायेदारों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं रह गया है। ग्रांट थॉर्नटन भारत की एक रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियां कार्यालय के लिए जगह चुनते समय अब इमारत के वास्तविक प्रदर्शन, ऊर्जा दक्षता, परिचालन खर्च, उपलब्ध डेटा और भविष्य में नवीनीकरण की तैयारी जैसे पहलुओं पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय कमर्शियल रियल एस्टेट में हरित इमारतों को मिलने वाले प्रीमियम का अगला चरण केवल प्रमाणन लेबल पर आधारित नहीं होगा। किरायेदारों, निवेशकों और ऋणदाताओं की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि कोई इमारत वास्तव में कितनी ऊर्जा बचाती है, उसका कार्बन उत्सर्जन कितना है और पर्यावरण से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संपत्ति मालिक के पास क्या योजना है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हरित रियल एस्टेट का अगला दौर प्रमाणन से आगे बढ़कर इमारतों के वास्तविक और मापने योग्य प्रदर्शन पर केंद्रित होगा। इसके लिए संपत्ति मालिकों को मजबूत डेटा सिस्टम तैयार करने, बेहतर परिचालन मानक अपनाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए स्पष्ट डीकार्बोनाइजेशन रोडमैप बनाने की जरूरत होगी।रिपोर्ट में कहा गया है कि किरायेदार, ऋणदाता और निवेशक अब ऐसे आंकड़ों की मांग कर रहे हैं, जिनके जरिए किसी इमारत के पर्यावरणीय प्रदर्शन को वास्तविक रूप से मापा जा सके। ऐसे में केवल यह बताना कि किसी ऑफिस बिल्डिंग को ग्रीन सर्टिफिकेट मिला हुआ है, भविष्य में पर्याप्त नहीं होगा। इमारत की ऊर्जा खपत, पानी का उपयोग, कचरा प्रबंधन और परिचालन दक्षता से जुड़े आंकड़े भी महत्वपूर्ण होते जाएंगे।
यह बदलाव भारत के ग्रेड-A ऑफिस मार्केट में अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है। खासकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स यानी GCC की ओर से लिए जाने वाले बड़े ऑफिस स्पेस में सस्टेनेबिलिटी से जुड़े आंकड़ों को पहले के मुकाबले ज्यादा महत्व मिल रहा है।भारत में GCC ऑफिस स्पेस की मांग का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन चुके हैं। Colliers के मुताबिक 2021 से भारत के शीर्ष सात शहरों में GCC ने लगभग 118 मिलियन वर्ग फुट ग्रेड-A ऑफिस स्पेस लीज पर लिया है। 2026 की पहली छमाही में भी GCC की ग्रेड-A ऑफिस स्पेस की मांग में बड़ी हिस्सेदारी रही। इससे ऐसी इमारतों पर जोर बढ़ रहा है जो बेहतर गुणवत्ता, तकनीक और सस्टेनेबिलिटी मानकों को पूरा कर सकें।
ग्रांट थॉर्नटन की रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी कंपनियां किसी साइट को चुनने के शुरुआती चरण से ही सस्टेनेबिलिटी से जुड़े डेटा की जांच कर रही हैं। इसका मतलब यह है कि कार्यालय के निर्माण और डिजाइन के समय ही ऊर्जा दक्षता, पर्यावरणीय प्रदर्शन और भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने की क्षमता को ध्यान में रखना होगा।पहले ग्रीन बिल्डिंग सर्टिफिकेशन को ऑफिस स्पेस की गुणवत्ता का एक मजबूत संकेत माना जाता था। प्रमाणन यह बताने में मदद करता था कि किसी इमारत को निर्माण, ऊर्जा, पानी या अन्य पर्यावरणीय मानकों के आधार पर निर्धारित रेटिंग मिली है। अब बाजार में ऐसी प्रमाणित इमारतों की संख्या बढ़ने के साथ किरायेदारों की अपेक्षाएं भी आगे बढ़ रही हैं।
Colliers के 2026 इंडिया ऑफिस आउटलुक के अनुसार 2024 और 2025 में लगभग तीन-चौथाई ऑफिस लीजिंग ग्रीन-सर्टिफाइड इमारतों में हुई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऐसे भवनों में किराए का प्रीमियम कई बाजारों में 15 से 20 प्रतिशत तक रहा। इससे पता चलता है कि सस्टेनेबिलिटी ऑफिस बाजार के मूल्य निर्धारण और किरायेदारों के फैसलों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।हालांकि अब सवाल यह है कि क्या सर्टिफिकेट मिलने के बाद इमारत लंबे समय तक उसी स्तर का प्रदर्शन भी बनाए रख रही है। ऊर्जा और पानी की वास्तविक खपत कितनी है, एयर कंडीशनिंग और अन्य सिस्टम कितनी कुशलता से काम कर रहे हैं और इमारत अपने कार्बन फुटप्रिंट को किस गति से कम कर रही है, इन बातों का महत्व बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में संपत्ति मालिकों और डेवलपर्स के लिए डेटा एक महत्वपूर्ण साधन बन सकता है। बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम, स्मार्ट मीटर और अन्य डिजिटल तकनीकों की मदद से बिजली, पानी और दूसरी सुविधाओं की वास्तविक खपत को ट्रैक किया जा सकता है। इससे किरायेदारों को यह समझने में मदद मिलेगी कि उनके कार्यालय का पर्यावरणीय और परिचालन प्रदर्शन कैसा है।ऑफिस बिल्डिंग के पुराने होने के साथ नवीनीकरण की तैयारी भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। पुराने भवनों को आधुनिक ऊर्जा दक्षता मानकों के अनुरूप लाने के लिए एयर कंडीशनिंग, लाइटिंग, बिजली, पानी और बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम में बदलाव करने पड़ सकते हैं। ऐसे में डेवलपर्स के लिए शुरुआत से ही भविष्य के अपग्रेड की योजना बनाना जरूरी हो सकता है।
भारत में ऑफिस बाजार में मजबूत मांग के बीच गुणवत्ता वाले स्पेस को लेकर कंपनियों की अपेक्षाएं भी बढ़ रही हैं। Cushman & Wakefield के अनुसार 2026 की दूसरी तिमाही में शीर्ष आठ शहरों में करीब 21.4 मिलियन वर्ग फुट की ग्रॉस ऑफिस लीजिंग दर्ज की गई और GCC, IT-BPM कंपनियां तथा फ्लेक्स वर्कस्पेस ऑपरेटर प्रमुख मांग स्रोत रहे।ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में कमर्शियल प्रॉपर्टी बाजार में केवल ग्रीन सर्टिफिकेशन हासिल करना प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इमारतों को अपने पर्यावरणीय दावों के साथ वास्तविक प्रदर्शन के आंकड़े भी दिखाने होंगे।ऐसे में भारत के ऑफिस बाजार में “ग्रीन बिल्डिंग” की परिभाषा भी बदल सकती है। भविष्य में ऐसी संपत्तियों को ज्यादा प्राथमिकता मिलने की संभावना है जो प्रमाणन के साथ ऊर्जा दक्षता, कम परिचालन लागत, बेहतर डेटा मॉनिटरिंग और कार्बन उत्सर्जन कम करने की स्पष्ट योजना भी पेश कर सकें।