Crude Oil में उछाल की आशंका, एक्सपर्ट ने चेताया

Update: 2026-07-09 10:11 GMT

BUSINESS: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर वैश्विक तेल बाजार में हलचल पैदा कर दी है। दोनों देशों के बीच जारी सैन्य गतिविधियों और बढ़ती तनातनी के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो आने वाले समय में Brent Crude की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। इसका सीधा असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर पड़ सकता है, जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतों से लेकर महंगाई तक कई क्षेत्रों में असर देखने को मिल सकता है। तेल बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बजाय लगातार बढ़ रहा है। सिंगापुर स्थित Sparta Commodities की सीनियर ऑयल मार्केट एनालिस्ट जून गोह ने कहा कि हाल की घटनाओं ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। ईरान की ओर से अमेरिकी जहाजों पर हमले, इसके जवाब में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और ईरानी तेल निर्यात पर सख्ती के संकेतों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में किसी भी बड़े भू-राजनीतिक संकट का सीधा असर कीमतों पर पड़ता है। मौजूदा हालात में यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है या कोई नया समझौता नहीं होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रह सकती है। संकट की शुरुआत में Brent Crude करीब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका था और अब एक बार फिर उसी स्तर पर पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार रास्तों में से एक है। खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचता है। अगर इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है तो तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इससे वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई कम हो सकती है और कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

हालांकि, तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ ने उत्पादन बढ़ाने के संकेत दिए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। अगर तेल की सप्लाई पहुंचाने वाले प्रमुख समुद्री मार्गों पर खतरा बना रहता है तो अतिरिक्त उत्पादन भी बाजार की मांग को पूरा नहीं कर पाएगा। भारत पर भी इस संकट का असर पड़ने की संभावना है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से घरेलू स्तर पर ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर परिवहन लागत पर पड़ेगा, जिससे आम लोगों के खर्च बढ़ सकते हैं।

इसके अलावा एलपीजी, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में भी वृद्धि की संभावना बनी रहेगी। परिवहन महंगा होने से खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। इससे महंगाई को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। फिलहाल वैश्विक बाजार की नजर अमेरिका और ईरान के बीच आगे की स्थिति पर टिकी हुई है। अगर दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू होती है और तनाव कम होता है तो तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है। वहीं, यदि सैन्य तनाव बढ़ता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में गतिविधियां प्रभावित होती हैं तो कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले दिनों में तेल बाजार की दिशा अमेरिका-ईरान संबंध, OPEC+ के फैसलों और वैश्विक सप्लाई व्यवस्था पर निर्भर करेगी। फिलहाल बढ़ते तनाव ने दुनिया भर के देशों को सतर्क कर दिया है।

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