मुश्किल हालात में शुरू किया टिफिन बिजनेस मेहनत से बना करोड़ों का साम्राज्य
पटना। हौसला हो तो उम्र, हालात और लोगों की बातें रास्ता नहीं रोक सकतीं। बिहार की 65 वर्षीय देवनी देवी की कहानी इसी बात की मिसाल है। कभी घर के बड़े संयुक्त परिवार के लिए खाना बनाने वाली देवनी देवी ने महज 20 रुपये की थाली से अपने सफर की शुरुआत की थी। आज उनका ‘अम्मा किचन’ पटना में जाना-पहचाना फूड बिजनेस बन चुका है और इसका सालाना कारोबार करीब 2.5 करोड़ रुपये बताया जाता है। उनके दो डाइन-इन आउटलेट हैं और कारोबार के जरिए 30 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिला है।
देवनी देवी की शादी महज 16 साल की उम्र में हो गई थी। शादी के बाद वह करीब 25 सदस्यों वाले संयुक्त परिवार का हिस्सा बनीं। इतने बड़े परिवार के लिए रोज खाना बनाना, सामग्री का हिसाब रखना और समय पर सभी के लिए भोजन तैयार करना उनकी दिनचर्या बन गई। उस समय शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि सालों तक रसोई में सीखा यही हुनर आगे चलकर उनकी पहचान और कारोबार की नींव बनेगा।
उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव साल 2002 में आया, जब वह बच्चों की पढ़ाई के लिए पटना पहुंचीं। यहां एक दिन उन्होंने एक मेडिकल छात्र का खाना देखा। बाहर रहने वाले विद्यार्थियों को मिलने वाला खाना उन्हें संतोषजनक नहीं लगा। यहीं से उनके मन में छात्रों को घर जैसा ताजा और साधारण भोजन उपलब्ध कराने का विचार आया। उन्होंने छोटे स्तर पर खाना बनाना शुरू किया और महज 20 रुपये में भोजन की थाली देने लगीं।
उनके शुरुआती ग्राहकों में मेडिकल छात्र सौरभ शामिल थे। उन्होंने देवनी देवी को यह समझने में भी मदद की कि टिफिन और मेस सेवा किस तरह काम करती है। शुरुआत में देवनी देवी अकेले ही खाना पकाने से लेकर पैकिंग और ग्राहकों तक पहुंचाने तक का काम संभालती थीं। कई बार उन्हें काफी दूर तक भोजन लेकर जाना पड़ता था।
धीरे-धीरे उनके खाने की चर्चा छात्रों के बीच होने लगी। बिना किसी बड़े प्रचार के लोग एक-दूसरे को उनके भोजन के बारे में बताते गए। ग्राहक बढ़ने लगे और छात्र उन्हें प्यार से ‘अम्मा’ बुलाने लगे। यही नाम आगे चलकर उनके फूड बिजनेस की पहचान बन गया।
लेकिन घर से बाहर निकलकर कारोबार करना उनके लिए आसान नहीं था। उस समय आसपास के कई लोगों ने उनके फैसले पर सवाल उठाए। परिवार के भीतर भी शुरुआत में समर्थन नहीं मिला। हालात यहां तक पहुंचे कि उनके पति ने करीब छह महीने तक उनसे बात नहीं की। इसके बावजूद देवनी देवी ने काम नहीं छोड़ा। वह लगातार खाना बनाती रहीं और ग्राहकों तक पहुंचाती रहीं।
उनके लिए यह काम केवल पैसे कमाने का जरिया नहीं था। इससे उन्हें अपनी पहचान और आर्थिक आत्मनिर्भरता भी मिली। कमाई बढ़ी तो उन्होंने पैसे को संभालकर इस्तेमाल करना शुरू किया। बताया जाता है कि उन्होंने 80 हजार रुपये की बचत की और उससे आठ रिक्शा खरीद लिए। इससे उनकी आय का एक और साधन तैयार हो गया।
इसके बाद साल 2009 में उन्होंने अपनी पोती के नाम पर ‘समृद्धि गर्ल्स हॉस्टल’ शुरू किया। दिलचस्प बात यह रही कि उनके टिफिन का खाना खाने वाली कुछ छात्राएं बाद में इसी हॉस्टल में रहने भी लगीं। इस तरह उनका छोटा टिफिन कारोबार धीरे-धीरे दूसरे व्यवसायों की ओर बढ़ने लगा।
कोरोना महामारी का दौर देवनी देवी के कारोबार के लिए बड़ी चुनौती लेकर आया। लॉकडाउन और शिक्षण संस्थानों के बंद होने के कारण छात्र अपने घर लौट गए और टिफिन कारोबार प्रभावित हुआ। इसके बावजूद उन्होंने खाना बनाना पूरी तरह बंद नहीं किया। वह डॉक्टरों के हॉस्टल और जरूरतमंद लोगों तक भोजन पहुंचाती रहीं। इसी दौरान वह खुद भी कोविड संक्रमित हो गईं। इलाज के समय वर्षों से उनसे जुड़े कुछ छात्रों ने उनकी मदद की।
उनके कारोबार की तस्वीर साल 2022 के बाद तेजी से बदली। परिवार की नई पीढ़ी ने ‘अम्मा किचन’ को ऑनलाइन ले जाने का सुझाव दिया। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने के बाद ग्राहकों का दायरा छात्रों से आगे बढ़कर परिवारों और दूसरे लोगों तक पहुंच गया। ऑनलाइन ऑर्डर बढ़ने के साथ कारोबार का विस्तार हुआ और बाद में डाइन-इन आउटलेट भी शुरू किए गए।
आज ‘अम्मा किचन’ के पटना में दो आउटलेट बताए जाते हैं। यहां भोजन की कीमत करीब 100 से 300 रुपये के बीच है और प्रतिदिन लगभग 350 ऑनलाइन ऑर्डर मिलने की बात कही गई है। कारोबार में 30 से ज्यादा कर्मचारी जुड़े हैं और सालाना आय करीब 2.5 करोड़ रुपये तक पहुंचने की रिपोर्ट है।
देवनी देवी की कहानी की खास बात यह है कि उन्होंने किसी बिजनेस स्कूल से पढ़ाई नहीं की थी और न ही शुरुआत में उनके पास कोई बड़ी मार्केटिंग योजना थी। उन्होंने वही काम चुना, जिसे वह वर्षों से करती आ रही थीं—घर जैसा खाना बनाना। फर्क सिर्फ इतना था कि उन्होंने आसपास की जरूरत को पहचाना और अपने हुनर को रोजगार में बदल दिया।
जो सफर 20 रुपये की एक साधारण थाली से शुरू हुआ था, वह आज करोड़ों के कारोबार तक पहुंच चुका है। कभी उनके काम को छोटा समझा गया, लेकिन वही काम आज कई परिवारों के रोजगार का जरिया है। पति की नाराजगी, सामाजिक सवाल, आर्थिक मुश्किलें और महामारी जैसी चुनौतियां भी उन्हें रोक नहीं सकीं।
65 साल की उम्र में भी देवनी देवी का सफर यह बताता है कि कारोबार शुरू करने के लिए हमेशा बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती। सही जरूरत को पहचानना, अपने हुनर पर भरोसा रखना और लगातार काम करते रहना भी सफलता की मजबूत नींव बन सकता है। ‘अम्मा’ की कहानी आज उन लोगों के लिए प्रेरणा बन रही है, जो छोटी शुरुआत को कम आंकते हैं।