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धर्म-अध्यात्म
जन्माष्टमी पर खीरा रखने की क्यों है परंपरा जानें श्रीकृष्ण जन्म से इसका संबंध
Ratna Netam
2 Sept 2026 2:21 PM IST

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धर्म : भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली जन्माष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धालु भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं। इस दिन मंदिरों और घरों में लड्डू गोपाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है, भक्त उपवास रखते हैं और रात में भगवान कृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। साल 2026 में जन्माष्टमी का मुख्य पर्व शुक्रवार 4 सितंबर को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि 4 सितंबर को तड़के 2:25 बजे शुरू होकर 5 सितंबर को रात 12:13 बजे समाप्त होगी।
जन्माष्टमी की पूजा में माखन-मिश्री, पंचामृत, तुलसी, फल और मिठाइयों का विशेष महत्व माना जाता है। इसके अलावा कई परिवारों में पूजा के दौरान खीरा रखने की भी परंपरा है। भगवान कृष्ण के जन्म के समय खीरे को काटने की एक खास रस्म निभाई जाती है। इसे भगवान कृष्ण के जन्म और गर्भनाल काटे जाने के प्रतीकात्मक रूप से जोड़कर देखा जाता है। आइए जानते हैं जन्माष्टमी पर खीरा रखने की मान्यता और इस बार पूजा का शुभ समय।
जन्माष्टमी पूजा में क्यों रखा जाता है खीरा?
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक और लोक परंपराओं में आधी रात को कान्हा के जन्म का उत्सव ठीक उसी तरह मनाया जाता है जैसे घर में किसी नवजात शिशु के आगमन पर खुशियां मनाई जाती हैं।
इसी से खीरे की परंपरा को भी जोड़ा जाता है। कई स्थानों पर ऐसा खीरा पूजा में रखा जाता है जो अपनी बेल या डंठल से जुड़ा हो। मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म के समय खीरे को डंठल से अलग किया जाता है। लोकमान्यता में इस क्रिया को नवजात शिशु की गर्भनाल काटने का प्रतीक माना जाता है।
हालांकि यह सभी क्षेत्रों या संप्रदायों में अनिवार्य पूजा-विधि नहीं है। जन्माष्टमी मनाने के तरीकों में क्षेत्रीय अंतर देखने को मिलता है। कहीं खीरे से यह प्रतीकात्मक रस्म निभाई जाती है तो कहीं सीधे लड्डू गोपाल का अभिषेक और जन्मोत्सव मनाया जाता है।
खीरे से कैसे कराई जाती है कान्हा की प्रतीकात्मक नाल छेदन की रस्म?
जिन परिवारों में यह परंपरा निभाई जाती है वहां पूजा स्थल पर पहले से खीरा रखा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का समय आने पर खीरे को डंठल से अलग किया जाता है। इसके बाद भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप का अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है।
इस रस्म के पीछे भाव यह है कि जैसे नवजात बच्चे के जन्म के बाद उसकी नाल काटकर उसे मां से अलग किया जाता है, वैसे ही भगवान कृष्ण के प्राकट्य को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया जाए। इसके बाद शंख और घंटियां बजाकर कृष्ण जन्म की खुशी मनाई जाती है।
2026 में कब है जन्माष्टमी?
पंचांग संबंधी उपलब्ध विवरणों के मुताबिक साल 2026 में जन्माष्टमी शुक्रवार 4 सितंबर को मनाई जाएगी। अष्टमी तिथि 4 सितंबर को सुबह 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होकर 5 सितंबर को रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। इसी कारण मुख्य जन्माष्टमी व्रत और उत्सव 4 सितंबर को रखा जा रहा है।
इस बार रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी जन्माष्टमी को खास बना रहा है। उपलब्ध पंचांग विवरण के अनुसार रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को रात 12:29 बजे से शुरू होकर उसी दिन रात 11:04 बजे तक रहेगा।
जन्माष्टमी 2026 का निशीथ पूजा मुहूर्त
जन्माष्टमी पर सबसे महत्वपूर्ण पूजा निशीथ काल में होती है क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। नई दिल्ली के लिए 2026 में निशीथ पूजा का समय 4 सितंबर रात करीब 11:57 बजे से 5 सितंबर रात 12:43 बजे तक बताया गया है। अलग-अलग शहरों में स्थानीय सूर्योदय और पंचांग गणना के कारण कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।
इसलिए श्रद्धालुओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का सटीक समय देखना चाहिए।
जन्माष्टमी के दिन कैसे करें पूजा?
जन्माष्टमी के दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल की सफाई कर भगवान कृष्ण या लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें। मंदिर को फूल, मोरपंख और अन्य सजावटी सामग्री से सजाया जा सकता है।
दिनभर भगवान कृष्ण के नाम का जाप, भजन और कीर्तन किया जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार निर्जला या फलाहार व्रत करते हैं। सामान्य तौर पर व्रत में अनाज से परहेज किया जाता है और फल, दूध आदि का सेवन किया जाता है।
रात में शुभ मुहूर्त आने पर लड्डू गोपाल को दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से स्नान कराया जाता है। इसके बाद साफ वस्त्र पहनाकर उनका श्रृंगार करें।
माखन-मिश्री, फल और अन्य सात्विक प्रसाद का भोग लगाया जा सकता है। तुलसी दल को कृष्ण पूजा में विशेष माना जाता है। इसके बाद धूप-दीप जलाकर आरती करें और भगवान से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
रात 12 बजे क्यों मनाया जाता है कृष्ण जन्मोत्सव?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में राजा कंस के कारागार में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी की पूजा में मध्यरात्रि का विशेष महत्व है।
रात में कृष्ण जन्म का समय आते ही मंदिरों में शंख और घंटियां बजाई जाती हैं। श्रद्धालु 'नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की' जैसे जयकारों के साथ भगवान के जन्म की खुशी मनाते हैं। इसके बाद लड्डू गोपाल को पालने या झूले में बैठाकर झुलाने की परंपरा भी है।
माखन-मिश्री का क्यों लगता है भोग?
भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं में माखन का विशेष उल्लेख मिलता है। लोकप्रिय धार्मिक कथाओं में बाल कृष्ण को माखन अत्यंत प्रिय बताया गया है और इसी कारण उन्हें प्रेम से 'माखन चोर' भी कहा जाता है।
जन्माष्टमी पर भक्त भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं। इसके अलावा धनिया पंजीरी, पंचामृत, फल और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां भी प्रसाद के रूप में अर्पित की जाती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में भोग और प्रसाद की परंपराएं अलग हो सकती हैं।
कब करें जन्माष्टमी व्रत का पारण?
जन्माष्टमी के व्रत के पारण को लेकर अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। कई श्रद्धालु मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म और निशीथ पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोलते हैं, जबकि धर्मशास्त्रीय परंपरा में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र समाप्त होने के बाद पारण किया जाता है।
2026 के लिए नई दिल्ली में धर्मशास्त्रीय पारण 5 सितंबर को सुबह करीब 6 बजे के बाद बताया गया है। वहीं कई स्थानों पर निशीथ पूजा समाप्त होने के बाद ही पारण करने की सामाजिक परंपरा है।
कुल मिलाकर जन्माष्टमी में खीरा रखने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म को नवजात शिशु के आगमन की तरह मनाने से जुड़ी एक लोकमान्यता है। खीरे को डंठल से अलग करने की क्रिया को प्रतीकात्मक नाल छेदन माना जाता है। इसके साथ व्रत, मध्यरात्रि पूजा, लड्डू गोपाल का अभिषेक, माखन-मिश्री का भोग और झूला झुलाने जैसी परंपराएं जन्माष्टमी के उत्सव को विशेष बनाती हैं।
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