धर्म-अध्यात्म

दुर्गा पूजा में चक्षु दान का क्या है महत्व जानें लाल-सफेद साड़ी का रहस्य

Rajeshwari Nishad
8 Oct 2026 1:23 PM IST
दुर्गा पूजा में चक्षु दान का क्या है महत्व  जानें लाल-सफेद साड़ी का रहस्य
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Durga Puja 2026: शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का पर्व पश्चिम बंगाल में विशेष उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। यहां दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बंगाली संस्कृति और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन बंगाल में महालया मनाने की परंपरा है, जिसे पितृपक्ष की समाप्ति और देवीपक्ष के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देवी दुर्गा की प्रतिमा से जुड़ी एक खास रस्म निभाई जाती है, जिसे 'चक्षुदान' कहा जाता है। इस परंपरा में मूर्तिकार देवी दुर्गा की प्रतिमा की आंखें बनाते हैं। मान्यता है कि यह देवी के दिव्य स्वरूप के जागरण का प्रतीक है। इसके अलावा दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली महिलाओं की लाल-सफेद साड़ी भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। इसके पीछे धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। वर्ष 2026 में महालया और सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी।
सर्वपितृ अमावस्या और महालया का क्या है संबंध?
हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवधि में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। पितृपक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाती है।
पश्चिम बंगाल में इसी अवसर को महालया के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि महालया के साथ देवी दुर्गा के आगमन की तैयारी शुरू हो जाती है। बंगाली परंपरा में इसे देवीपक्ष के आरंभ का संकेत माना जाता है।
इस दिन सुबह नदी घाटों पर लोग अपने पूर्वजों को जल अर्पित करते हैं। वहीं घरों में देवी दुर्गा की आराधना का माहौल बनने लगता है। इस तरह महालया पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और देवी की उपासना, दोनों का विशेष अवसर बन जाता है।
क्या है देवी दुर्गा का चक्षुदान?
बंगाल की दुर्गा पूजा में चक्षुदान एक महत्वपूर्ण परंपरा है। बंगाली भाषा में 'चक्षु' का अर्थ आंख और 'दान' का अर्थ प्रदान करना होता है। इस रस्म में मूर्तिकार देवी दुर्गा की प्रतिमा की आंखों को अंतिम रूप देते हैं।
मिट्टी से बनी प्रतिमा का चेहरा तैयार होने के बाद कलाकार विशेष सावधानी से देवी की आंखें बनाते हैं। इस प्रक्रिया को केवल मूर्तिकला का हिस्सा नहीं, बल्कि धार्मिक भावना से जुड़ी परंपरा भी माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी की आंखें बनाए जाने के साथ प्रतिमा में दिव्य चेतना के आगमन का प्रतीकात्मक भाव जुड़ा होता है। हालांकि, चक्षुदान और पूजा के दौरान होने वाली विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा अलग अनुष्ठान हैं।परंपरागत रूप से महालया के आसपास चक्षुदान किया जाता है। अलग-अलग मूर्तिकार परिवारों और पूजा समितियों में इसकी विधि तथा समय में अंतर हो सकता है।
देवी की आंखें बनाने का धार्मिक महत्व
दुर्गा पूजा में देवी की आंखों को विशेष महत्व दिया जाता है। भक्तों की मान्यता है कि मां दुर्गा की दृष्टि करुणा, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक है।प्रतिमा में आंखें बनाने के दौरान कलाकार चेहरे के भावों पर खास ध्यान देते हैं। देवी की आंखों में शक्ति और ममता का भाव प्रदर्शित करने की कोशिश की जाती है।बंगाल के प्रसिद्ध मूर्तिकारों के लिए यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है। प्रतिमा के निर्माण में कई दिन लगते हैं, लेकिन आंखों को अंतिम रूप देना सबसे संवेदनशील कार्यों में गिना जाता है।कोलकाता के कुम्हारटोली जैसे पारंपरिक मूर्तिकला केंद्रों में दुर्गा पूजा के लिए बड़ी संख्या में प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। यहां पीढ़ियों से कलाकार इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
महालया की सुबह क्यों सुनते हैं महिषासुरमर्दिनी?
पश्चिम बंगाल में महालया की सुबह एक और विशेष परंपरा निभाई जाती है। इस दिन कई परिवार सुबह जल्दी उठकर रेडियो पर 'महिषासुरमर्दिनी' कार्यक्रम सुनते हैं।इस प्रसिद्ध कार्यक्रम में देवी दुर्गा की महिमा, चंडीपाठ और भक्ति संगीत प्रस्तुत किया जाता है। बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम बंगाली समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
दशकों से चली आ रही इस परंपरा के कारण महालया की सुबह बंगाल में विशेष धार्मिक वातावरण दिखाई देता है। घरों में पूजा की तैयारियां तेज होने लगती हैं और श्रद्धालु देवी के स्वागत की भावना से जुड़ जाते हैं।
दुर्गा पूजा में लाल-सफेद साड़ी पहनने की परंपरा
पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा की बात हो और लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी का जिक्र न हो, ऐसा मुश्किल है। बंगाली महिलाओं की इस पारंपरिक पोशाक को 'लाल पाड़ सादा साड़ी' कहा जाता है।
इस साड़ी का सफेद रंग शांति, पवित्रता और सादगी का प्रतीक माना जाता है, जबकि लाल रंग शक्ति, शुभता, ऊर्जा और समृद्धि से जुड़ा है।इन दोनों रंगों का मेल बंगाली धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। दुर्गा पूजा के दौरान महिलाएं इस साड़ी को पहनकर देवी की आराधना और पारंपरिक आयोजनों में हिस्सा लेती हैं।
आमतौर पर लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी सूती या रेशमी कपड़े में तैयार की जाती है। यह बंगाली संस्कृति की सबसे पहचानी जाने वाली पारंपरिक पोशाकों में शामिल है। हालांकि, पूजा में यही साड़ी पहनना अनिवार्य नहीं है।
सिंदूर खेला से भी जुड़ी है लाल-सफेद साड़ी
दुर्गा पूजा के अंतिम दिन विजयादशमी पर बंगाल में 'सिंदूर खेला' की परंपरा निभाई जाती है। इस अवसर पर पारंपरिक रूप से विवाहित महिलाएं देवी दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाती हैं।
इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनती हैं। कई महिलाएं शंख की सफेद चूड़ियां और लाल चूड़ियां भी धारण करती हैं, जिन्हें बंगाली वैवाहिक परंपरा से जोड़ा जाता है।
यह रस्म देवी दुर्गा की विदाई और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी है। समय के साथ विभिन्न पूजा आयोजनों में सिंदूर खेला में भागीदारी की परंपराएं भी अलग-अलग रूप में दिखाई देने लगी हैं।
बंगाल में दुर्गा पूजा का सांस्कृतिक महत्व
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान भव्य पंडाल बनाए जाते हैं। देवी दुर्गा की प्रतिमाओं को आकर्षक रूप से सजाया जाता है और पारंपरिक संगीत, ढाक की थाप, धुनुची नृत्य तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।
महालया से शुरू होने वाला उत्सव का माहौल विजयादशमी तक बना रहता है। इस दौरान लोग परिवार और मित्रों के साथ पूजा पंडालों में दर्शन करने पहुंचते हैं।
साल 2026 में पश्चिम बंगाल सरकार के आधिकारिक पूजा कैलेंडर के अनुसार महालया 10 अक्टूबर को है, जबकि दुर्गा पूजा के प्रमुख आयोजन 17 से 21 अक्टूबर तक होंगे।
बंगाल की दुर्गा पूजा में चक्षुदान की परंपरा देवी के आध्यात्मिक स्वरूप के प्रति आस्था को दर्शाती है। वहीं लाल-सफेद साड़ी बंगाली संस्कृति, धार्मिक श्रद्धा और पारंपरिक पहचान का प्रतीक मानी जाती है। इन दोनों परंपराओं के कारण दुर्गा पूजा का पर्व अपनी विशेष सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए है।
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