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अनैतिक मार्केटिंग पर सुप्रीम कोर्ट का रुख: केंद्र बनाए विशेष समिति
Tara Tandi
8 Oct 2026 12:51 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रैक्टिस (जैसे डॉक्टरों को अपने प्रोडक्ट को बढ़ावा देने के लिए तोहफ़े, मेहमाननवाज़ी और अन्य फ़ायदे देना) के लिए कानूनी नियम बनाने की ज़रूरत की जांच करने के लिए एक कमेटी बनाए।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह निर्देश तब दिया जब वे दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रैक्टिस के लिए कानूनी नियम बनाने और दवा कंपनियों व डॉक्टरों के बीच अनैतिक लेन-देन को रोकने के उपायों की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।
सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच को बताया कि केंद्र सरकार तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाएगी। यह कमेटी जांच करेगी कि क्या दवा कंपनियों को रेगुलेट करने के लिए किसी कानूनी ढांचे की ज़रूरत है या नहीं, और अगर है, तो ऐसे नियम किस तरह के होने चाहिए, इसकी सिफारिश करेगी।
केंद्र ने कहा कि मौजूदा रेगुलेटरी ढांचे में उन डॉक्टरों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है जो दवा कंपनियों से ऐसे फ़ायदे लेते हैं। हालाँकि, खुद दवा कंपनियों के लिए कानूनी नियम बनाने के मुद्दे की जांच प्रस्तावित कमेटी करेगी।
कमेटी स्टेकहोल्डर्स से मिले सुझावों और आपत्तियों पर विचार करेगी और दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रैक्टिस के लिए कानूनी नियम बनाने की ज़रूरत पर केंद्र को सिफारिशें देगी।
यह मामला दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को अपने प्रोडक्ट लिखने के लिए प्रोत्साहन के तौर पर मुफ़्त चीज़ें, तोहफ़े, मेहमाननवाज़ी, यात्रा की सुविधा या अन्य फ़ायदे देने की प्रैक्टिस से जुड़ी चिंताओं के कारण उठा है।
याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि मौजूदा ढांचा एक असंतुलन पैदा करता है; इसमें ऐसे डॉक्टरों के लिए तो सज़ा का प्रावधान है जो ऐसे प्रलोभन स्वीकार करते हैं, लेकिन ऐसी पेशकश करने वाली दवा कंपनियों को रेगुलेट करने या उन पर जुर्माना लगाने के लिए कोई संबंधित कानूनी तंत्र नहीं है।
केंद्र से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन के बारे में हलफ़नामा दाखिल करने को कहा गया है, और मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी।
दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रैक्टिस का मुद्दा ऐसे समय में उठा है जब सुप्रीम कोर्ट दवाओं की कीमतों और उनकी वहनीयता से जुड़ी व्यापक चिंताओं की भी जांच कर रहा है।
दवाओं की कीमतों, जेनेरिक दवाओं, मेडिकल डिवाइस और प्रिस्क्रिप्शन प्रैक्टिस के रेगुलेशन से जुड़ी अलग-अलग PILs में, इसी बेंच ने उस बड़े अंतर पर सवाल उठाया था जिस कीमत पर दवाएं रिटेलर्स को सप्लाई की जाती हैं और उनकी MRP के बीच होता है। पिछली सुनवाई में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कैंसर की एक ऐसी दवा के बारे में सवाल किया था जिसकी MRP ₹27,000 थी, जबकि वह रिटेलर्स को लगभग ₹2,700 से ₹3,000 में सप्लाई की जा रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कीमत में इस दस गुना अंतर को "दिन-दहाड़े डकैती" बताया था और सवाल किया था कि मैन्युफैक्चरर्स को रिटेलर्स को सप्लाई की जाने वाली कीमत से बहुत ज़्यादा MRP तय करने की इजाज़त क्यों दी जानी चाहिए।
जस्टिस नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह भी सवाल किया था कि क्या 'ज़रूरी चीज़ों के कानून' (Essential Commodities Act) के तहत आने वाले फार्मास्युटिकल प्रोडक्ट्स के लिए एक समान मार्जिन तय किया जा सकता है, चाहे दवाएं 'ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' के तहत ज़रूरी या गैर-ज़रूरी कैटेगरी में आती हों।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि MRP और रिटेलर्स को सप्लाई की जाने वाली कीमत के बीच बहुत ज़्यादा अंतर से ग्राहकों का भरोसा कम हो सकता है; कोर्ट ने कहा कि अगर ₹27,000 की MRP वाली दवा लगभग ₹3,000 में बेची जाए, तो मरीज़ को दवा के नकली होने का शक भी हो सकता है।
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