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धर्म-अध्यात्म
Dharm : इस कहानी से जानें, राजसी वैभव के बीच भी कैसे जलाई जाती है भक्ति की अखंड ज्योत
Sarita
4 Feb 2026 11:28 AM IST

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Dharm : एक राजा का ज्ञान जितना गहरा था, उतने ही वह सरल और अहंकार से रहित थे। उनके जीवन का लक्ष्य ही प्रजा की सेवा करना था। एक बार एक अहंकारी भिक्षुक उनके पास आया और बोला, “राजन! मैं वर्षों से अखंड जप-तप करता आ रहा हूं, कठोर साधना करता रहा हूं, लेकिन आज तक मुझे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई. जबकि आप राजवैभव में लिप्त होने के बावजूद परमात्मा के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ चुके हैं। मैंने सुना है आपको ज्ञानयोग की प्राप्ति हुई है। क्या वजह है?'
राजा बोले, ‘‘भिक्षुक, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं उचित समय पर दूंगा। अभी तो तुम यह दीपक लेकर मेरे महल में निस्संकोच प्रवेश करो। मनचाही चीज ले सकते हो, महल के सारे सुख भोग सकते हो। तुम्हारे लिए कोई रोक-टोक नहीं है। पर यह ध्यान रहे कि दीपक हरगिज न बुझे। अगर दीपक बुझ गया तो तुम्हें मृत्यु दंड दिया जाएगा।"
भिक्षुक पूरे महल में दीपक लेकर घूमा, राजवैभव देखा, सब कुछ देख-घूमकर वापस आया। राजा ने उससे पूछा, ‘‘कहो बंधु, तुम्हें मेरे महल में क्या चीज पसंद आई?’’
राजन, मेरा अहोभाग्य जो आपने मेरे लिए राजवैभव के सारे द्वार खुले रख छोड़े। पर छप्पन भोग, नृत्य-संगीत इन सारी चीजों को देखने के बावजूद मेरे मन को कुछ भी अच्छा नहीं लगा। चाहकर भी सारे सुखों का आनंद नहीं ले पाया क्योंकि मेरा सारा ध्यान आपके दिए हुए इस दीपक की ओर था।"भिक्षुक की बात सुनकर राजा ने कहा कि बस यही वजह है कि मैं राजा होकर भी राजवैभव, ऐशोआराम से अलग हूं। मेरा ध्यान या तो प्रजा पर रहता है या फिर परमात्मा में।
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