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धर्म-अध्यात्म
Religion: जानिए मंदिर दर्शन के बाद सीढ़ियों पर क्यों बैठते हैं भक्त
Sarita
29 Dec 2025 6:33 AM IST

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Religion: सनातन धर्म में मंदिर दर्शन को केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और मानसिक शांति का साधन माना गया है। अक्सर देखा जाता है कि मंदिर में देवदर्शन के पश्चात श्रद्धालु तुरंत घर लौटने के बजाय कुछ समय मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर विश्राम करते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। इसके पीछे केवल शारीरिक थकान नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक, पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यताएं निहित हैं।
1. दिव्य ऊर्जा को आत्मसात करने की परंपरा:
धार्मिक मान्यता के अनुसार मंदिर में ईश्वर का वास होता है, जहां सकारात्मक और सात्विक ऊर्जा का प्रवाह अत्यंत प्रबल रहता है। गर्भगृह में दर्शन करते समय भक्त का मन सांसारिक विचारों से मुक्त होकर ईश्वर में एकाग्र हो जाता है। ऐसे में सीढ़ियों पर कुछ देर शांत भाव से बैठना उस दिव्य ऊर्जा को आत्मसात करने का माध्यम माना जाता है। इससे मन में उत्पन्न शांति स्थायी होती है और भक्त को आध्यात्मिक संतोष की अनुभूति होती है।
2. पौराणिक कथाओं में विश्राम का उल्लेख:
पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि ऋषि-मुनि एवं साधक देवदर्शन के बाद तुरंत सांसारिक जीवन में नहीं लौटते थे। वे मंदिर प्रांगण या सीढ़ियों पर बैठकर ध्यान, जप या मौन साधना करते थे। मान्यता है कि ऐसा करने से ईश्वर की कृपा हृदय में स्थिर होती है। यदि दर्शन के तुरंत बाद व्यक्ति बाहरी दुनिया की हलचल में लौट जाए, तो दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
3. आध्यात्मिक और भौतिक जगत के बीच संतुलन:
मंदिर की सीढ़ियों को धार्मिक दृष्टि से एक संक्रमण स्थल माना गया है। यह स्थान आध्यात्मिक लोक और सांसारिक जीवन के बीच सेतु का कार्य करता है। यहां बैठने से मन धीरे-धीरे भक्तिभाव से सामान्य अवस्था में आता है। यह संतुलन मानसिक अशांति से बचाता है और व्यक्ति को सहजता से अपने दैनिक जीवन में लौटने में सहायता करता है।
4. योग और आयुर्वेद की दृष्टि से महत्व:
योग एवं आयुर्वेद के अनुसार दर्शन के समय शरीर की इंद्रियां और मन अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं। इससे ऊर्जा का प्रवाह तेज हो जाता है। ऐसे में कुछ समय शांत बैठना शरीर और मन को संतुलन प्रदान करता है। सीढ़ियों पर बैठकर विश्राम करने से रक्तचाप सामान्य रहता है, मन स्थिर होता है और एकाग्रता बढ़ती है। यही कारण है कि साधक और वृद्धजन इस परंपरा का विशेष पालन करते हैं।
5. विनम्रता और अहंकार त्याग का प्रतीक:
भूमि या सीढ़ियों पर बैठना धार्मिक रूप से विनम्रता और समर्पण का प्रतीक माना गया है। इससे भक्त के भीतर यह भाव जागृत होता है कि ईश्वर के सामने सभी समान हैं। यह परंपरा व्यक्ति के अहंकार को शांत करती है और जीवन में सरलता व संतुलन लाने में सहायक बनती है। यही संस्कार धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देता है।
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