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धर्म-अध्यात्म
Narasimha Dwadashi Vrat Katha: नरसिंह द्वादशी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, नष्ट होंगे सभी दुख
Sarita
10 March 2025 8:45 AM IST

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Narasimha Dwadashi Vrat Katha: नरसिंह द्वादशी का हर साल फाल्गुन माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है. मान्यता है कि नरसिंह द्वादशी के दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने वाले के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है. इसके अलावा व्रत का पालन करने वाले को जीवन के समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. साथ ही नरसिंह द्वादशी के दिन पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ करना भी बहुत आवश्यक माना जाता है|
नरसिंह द्वादशी की व्रत कथा Narasimha Dwadashi Vrat Katha In Hindi
कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कश्यप नाम के ऋषि रहा करते थे. जिनकी पत्नी का नाम दिति था और उनके दो पुत्र थे पहला हिरण्याक्ष और दूसरा हिरण्यकश्यप. बताया जाता है कि, यह दोनों ऋषि के पुत्र थे इसके बाद भी इनकी प्रवृत्ति असुर वाली हो गई थी. दोनों भाइयों ने चारों और हाहाकार मचा दिया था. ऐसे में भगवान विष्णु ने वराह रूप में पृथ्वी की रक्षा करने के लिए हिरण्याक्ष का वध कर दिया था. अपने भाई की मृत्यु से हिरण्यकश्यप को बेहद दुख हुआ और उसी दिन से वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानने लगा. इसके बाद हिरण्यकश्यप अपने प्रतिशोध का बदला लेने के लिए कठोर तपस्या करने लगा जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी से उसने मनचाहा वरदान प्राप्त किया|
इसके बाद उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया. इस तरह वह तीनों लोकों का स्वामी बन गया. इस प्रकार उसे अपनी शक्ति पर काफी अहंकार हो गया कि वह खुद को ही देवता समझने लगा. अहंकार मे डूबे हिरण्यकश्यप का अत्याचार बढ़ता जा रहा है. कुछ समय में उसकी पत्नी कयाधु ने प्रहलाद नाम के पुत्र को जन्म दिया. जो भगवान विष्णु का परम भक्त था. प्रहलाद जब थोड़ा बड़ा हुआ तो हिरण्यकश्यप ने उससे खुद की पूजा करने के लिए कहा लेकिन प्रहलाद का मन तो सिर्फ विष्णु भगवान की ही भक्ति में लगा रहता था इसलिए उसके ऊपर पिता की किसी बात का प्रभाव नहीं पड़ा|
अपने बेटे को भगवान विष्णु की भक्ति से लगे देखकर हिरण्यकश्यप के क्रोध का ठिकाना न रहा उसने प्रहलाद का मन भगवान विष्णु की भक्ति से हटाने के लिए ढेरों प्रयास किए. लेकिन किसी प्रयासों में सफलता न मिलने के बाद उसने अंत में अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर उसे अग्नि में जलाने का प्रयत्न किया. क्योंकि होलिका को वरदान था कि उसे अग्नि जला नहीं पाएगी. लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद बज गया और होलिका जलकर भस्म हो गई|
ऐसे में भगवान की इस अद्भुत कृपा को देखते हुए हिरण कश्यप की प्रजा भी प्रभु विष्णु की भक्ति करने लगी. जिस पर हिरण कश्यप को बहुत क्रोध आया और उसने भरी सभा में अपने पुत्र को मृत्यु दंड देने का निर्णय किया. तब उसने प्रहलाद को अपने दरबार में एक खंभे से बांधकर कहा कि, तू कहता है कि तेरे कण-कण में भगवान हैं. तो तू अपने भगवान को बुला ले कि वह इस खंभे से निकल कर तुझे बचाएं.ये कहते हुए हिरण कश्यप ने खंभे पर गदा से प्रहार किया. ठीक उसी समय वहां नरसिंह प्रकट हुए और उन्होंने हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर रखकर उसकी छाती को अपने नाखूनों से फाड़कर उसे मृत्युदंड दिया|
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