धर्म-अध्यात्म

Mahashivratri Katha: महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है, क्या है इसकी पौराणिक कथा

Sarita
20 Feb 2025 9:09 AM IST
Mahashivratri Katha: महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है, क्या है इसकी पौराणिक कथा
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Mahashivratri Katha: भगवान शिव हिंदू धर्म में सबसे अधिक पूजे जाने वाले देव हैं, जिनके महात्म्य का वर्णन वेद, पुराण और धर्म शास्त्रों में भी मिलता है। शिव की उपासना के लिए वैसे तो हर दिन शुभ होता है। लेकिन महाशिवरात्रि के दिन को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। हर साल फाल्गुन माह की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि होती है जोकि इस बार 26 फरवरी 2025 को है। मान्यता है महाशिवरात्रि की पूजा से दांपत्य जीवन सुखमय होता है और जीवन सुख-समृद्धि से भर जाता है। शिव भक्त हर्षोल्लास, भक्ति और श्रद्धा भाव के साथ महाशिवरात्रि का पर्व मनाते हैं। इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा आराधना की जाती है। महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का भी महत्व है। आमतौर पर हर तीज-त्योहार की पूजा में ब्रह्म मुहूर्त या सुबह के समय पूजा-पाठ किए जाते हैं, वहीं महाशिवरात्रि पर चारों प्रहर पूजा होती है।
महाशिवरात्रि क्यों मनाते हैं:
भगवान शिव से जुड़े प्रत्येक पर्व-त्योहार मनाए जाने के पीछे धार्मिक कारण बताए गए हैं। महाशिवरात्रि मनाए जाने के पीछे कई तरह की कथा-कहानियां प्रचलित हैं। धार्मिक मान्यताओं के आधार पर फाल्गुन कृष्ण की चतुर्दशी पर भगवान शिव और पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। इसके अलावा महाशिवरात्रि से जुड़ी अन्य कथा और मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन मास की चतुर्दशी के दिन भगवान शिव ने वैराग्य जीवन का त्याग कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। अन्य कथा के अनुसार इस दिन भगवान शिव ज्योतिर्लिंग में प्रकट हुए थे। इसी तिथि पर भगवान शिव ने तांडव किया था। एक अन्य मान्यतानुसार इस दिन भगवान शिव ने सृष्टि को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म किया था। वहीं कुछ कथा में ऐसा वर्णन भी मिलता है कि इस तिथि पर भगवान शिव ने विष का पान किया था। इसी प्रकार महाशिवरात्रि पर्व को लेकर कई कथा-कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन महाशिवरात्रि मनाए जाने को लेकर चित्रभानु भील शिकारी से जुड़ी कथा सबसे अधिक प्रचलित है।
महाशिवरात्रि की कथा:
महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था, जोकि शिकार करके ही अपने परिवार का पालन पोषण करता था। शिकारी ने एक साहूकार से काफी सारा कर्ज ले रखा था, जिसे वह समय पर नहीं चुका पाया। एक दिन साहूकार ने शिकारी को शिव मठ में बंदी बना लिया। जिस दिन साहूकार ने उसे बंदी बनाया उस दिन शिवरात्रि थी। चतुर्दशी के दिन उसने शिवरात्रि व्रत की कथा सुनी और शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के बारे में कहा। शिकारी ने कहा कि वह अगले दिन सारा कर्ज चुका देगा। यह कहकर वह मुक्त हो गया और फिर से शिकार की खोज में निकला।
बंदीगृह में रहने के कारण वह भूख-प्यास से व्याकुल हो गया और शिकार की तलाश में दूर निकल आया। अंधेरा होने पर उसने जंगल में ही रात बिताने का फैसला किया और एक पेड़ पर चढ़ गया। उस पेड़ के नीचे शिवलिंग था जो बेल के पत्तों से ढका था, जिसे शिकारी ने नहीं देखा था। पेड़ पर चढ़ते समय उसने जो टहनियां तोड़ी वह शिवलिंग पर गिरती गईं।
रात के समय एक हिरणी पानी पीने तालाब के पास आई। शिकारी जैसे ही उसका शिकार करने गया तो हिरणी बोली मैं गर्भवती हूं शीघ्र ही मेरा प्रसव होगा। तुम थोड़ी देर रुक जाओ मैं बच्चे को जन्म देकर तुरंत तुम्हारे पास आ जाऊंगी। शिकारी ने हिरणी की बात मान ली और उसे जाने दिया। पेड़ पर रहते हुए शिकारी से अनजाने शिवलिंग पर बेलपत्र गिरते गए। इस तरह उसने अंजाने में प्रथम प्रहर की पूजा संपन्न कर ली। कुछ देर बार एक हिरणी आई। शिकारी जैसे ही उसे मारने के लिए धनुष बाण चलाने लगा तो हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि मैं कुछ देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूं और कामातूर विरहिणी हूं। मैं अपने प्रिय की तलाश में हूं। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे पास आ जाऊंगी। शिकारी ने उसे भी जाने दिया।
इस तरह से रात्रि का आखिरी प्रहर भी बीत गया और पेड़ पर रहते हुए शिकारी ने अंतिम प्रहर की पूजा भी कर ली। अब एक हिरणी अपने बच्चों के साथ आई। उसने भी शिकारी से निवेदन किया उसे जाने दे। आखिर में शिकारी के सामने एक हिरण आया। हिरण ने भी शिकारी से जीवनदान देने का निवेदन किया। शिकारी ने पूरी रात की घटना हिरण को सुनाई। हिरण ने कहा कि जिस प्रकार तीनों पत्नियां प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। जैसे तुमने उन्हें विश्वास पात्र मानकर छोड़ा मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित हो जाऊंगा।
शिकारी ने उसे भी छोड़ दिया और इस तरह से सुबह हो गई। उपवास, रात्रि जागरण, और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से अनजाने में शिकारी की शिवरात्रि पूजा भी पूर्ण हो गई। लेकिन इस पूजा का फल उसे शीघ्र ही मिल गया। कुछ ही समय बाद हिरण और उसका परिवार शिकारी के पास आ गया। लेकिन उन्हें देख शिकारी को ग्लानि महसूस हुई और उसने हिरण के पूरे परिवार को जीवनदान दे दिया। इस तरह से शिवरात्रि व्रत का पालन करने पर शिकारी को मोक्ष और शिवलोक की प्राप्ति हुई।
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