- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- धर्म-अध्यात्म
- /
- Haritalika Teej...
धर्म-अध्यात्म
Haritalika Teej 2025:जानें हरतालिका तीज व्रत, फुलेरा का क्या है महत्व
Sarita
26 Aug 2025 8:21 AM IST

x
Haritalika Teej 2025: तीज व्रत में पूजन की हर सामग्री का अपना विशेष महत्व होता है। हरितालिका तीज हो या कोई अन्य तीज, व्रती महिलाएं बड़ी श्रद्धा और नियम से पूजा करती हैं। इन पूजन सामग्रियों और परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है फुलेरा, जिसके बिना तीज की पूजा अधूरी मानी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फुलेरा क्या है और इसे इतना पवित्र क्यों माना जाता है?
फुलेरा नाम ही इसके महत्व को दर्शाता है। दरअसल यह फूलों से बना एक विशेष श्रृंगार है, जिसे पूजा के लिए तैयार किया जाता है। इसे एक छोटे से आसन, मिट्टी के ढांचे या लकड़ी के चबूतरे पर सजाया जाता है। इसके ऊपर फूल, पत्तियों और पवित्र धागों से एक सुंदर संरचना बनाई जाती है। इतना ही नहीं, कई जगहों पर महिलाएं इसे एक पौधे के रूप में भी स्थापित करती हैं और फिर इसे फूलों से सजाकर देवी-देवताओं का आसन बनाती हैं। फुलेरा पर गणेशजी, गौरीजी और भगवान शिव की प्रतीकात्मक रूप से स्थापना की जाती है। इसलिए इसे पूजा का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना जाता है।
हरतालिका तीज में फुलेरा केवल एक श्रृंगार नहीं बल्कि आस्था और पवित्रता का केंद्र है। यह शिव-पार्वती की उपस्थिति का प्रतीक और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का माध्यम है। इसीलिए इसे व्रत की आत्मा कहा गया है। फुलेरा बाँधे बिना न तो मंडप सजता है और न ही तीज की पूजा पूरी होती है। इस प्रकार फुलेरा केवल फूलों का मंडप नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और वैवाहिक सौभाग्य का दिव्य प्रतीक है। यही कारण है कि महिलाएँ पीढ़ियों से इसे बड़ी श्रद्धा से बनाती और सजाती आ रही हैं। व्रत की सच्ची पूर्णता तभी मानी जाती है जब फुलेरा स्थापित करके गौरी-शंकर की पूजा की जाए।
फुलेरा क्या है:
फुलेरा फूलों और पत्तियों से बनी एक विशेष प्रकार की पूजा सजावट है। हरतालिका तीज पर महिलाएँ मिट्टी से शिवलिंग और माता पार्वती की मूर्तियाँ बनाती हैं, मंडप सजाती हैं और उन पर फुलेरा बाँधती हैं। इसमें फूलों की पाँच लड़ियाँ बाँधी जाती हैं, जिन्हें शिव-पार्वती की पाँच दिव्य पुत्रियों, जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली का प्रतीक माना जाता है।
तीज व्रत में फुलेरा का महत्व:
इसकी पूजा का आधार यह है कि तीज में गौरी-शंकर फुलेरा के नीचे विराजमान होते हैं। यह उनका पवित्र आसन है।
पुष्पों की पाँच मालाएँ, जो कन्याओं का प्रतीक हैं, भगवान भोलेनाथ की पाँच पुत्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
प्रकृति और समर्पण का प्रतीक फुलेरा, केवल फूलों का श्रृंगार ही नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की प्रचुरता और देवी पार्वती के प्रति समर्पण का भी प्रतीक है।
दर्शन का महत्व: ऐसा माना जाता है कि यदि कोई महिला हरतालिका तीज का व्रत नहीं रख पाती है, तो फुलेरा के दर्शन मात्र से ही उसे शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है।
फुलेरा के धार्मिक फल दर्शन को काशी और सोमनाथ के शिव दर्शन के समान ही फलदायी माना जाता है।
फुलेरा कैसे बनता है:
फुलेरा बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के फूलों के साथ-साथ अशोक और आम के पत्तों का उपयोग किया जाता है। इन्हें मिलाकर पाँच सुंदर मालाएँ बनाई जाती हैं और फिर उन्हें मंडप में शिव-पार्वती की मूर्ति पर बाँधा जाता है। यह पूरा दृश्य घर में एक दिव्य वातावरण का निर्माण करता है।
तीज का व्रत फुलेरा के बिना अधूरा माना जाता है।
पूजा के बाद इसके फूल और पत्ते कभी नहीं फेंके जाते। इन्हें नदी या जलधारा में प्रवाहित करना आवश्यक है, अन्यथा पाप लग सकता है।
फुलेरा की परंपरा राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में बहुत लोकप्रिय है। कहीं इसे गोरी-शंकर की झांकी माना जाता है तो कहीं इसे फूलों का मंडप कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ एक-दूसरे के फुलेरा देखने जाती हैं और उसे सजाने में विशेष उत्साह दिखाती हैं।
TagsHaritalika Teejहरतालिका तीजफुलेरामहत्वHaritalika TeejHartalika TeejPhuleraimportance जनता से रिश्ता न्यूज़जनता से रिश्ताजनता से रिश्ता.कॉमआज की ताजा न्यूज़हिंन्दी न्यूज़भारत न्यूज़खबरों का सिलसिलाआज की ब्रेंकिग न्यूज़आज की बड़ी खबरमिड डे अख़बारJanta Se Rishta NewsJanta Se RishtaToday's Latest NewsHindi NewsIndia NewsKhabron Ka SilsilaToday's Breaking NewsToday's Big NewsMid Day Newspaperजनताjantasamachar newssamacharहिंन्दी समाचार
Next Story





