धर्म-अध्यात्म

Guru Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत के दिन भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए पढ़ें ये व्रत कथा

Sarita
10 April 2025 7:48 AM IST
Guru Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत के दिन भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए पढ़ें ये व्रत कथा
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Guru Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है. शिव पुराण के अनुसार जो भी व्यक्ति प्रदोष व्रत करता उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं और मनचाहा फल मिलता है. इसके अलावा विवाहित महिलाएं सुख और सौभाग्य में वृद्धि के लिए व्रत रखती हैं. वहीं प्रदोष व्रत के दिन इस खास व्रत कथा पढ़ने तथा सुनने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है|
गुरु प्रदोष व्रत कथा:
प्रदोष व्रत की कथा के अनुसार, एक बार इन्द्र और वृत्रासुर में घनघोर युद्ध हुआ. उस समय देवताओं ने दैत्य सेना को पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया. अपना विनाश देख वृत्रासुर अत्यंत क्रोधित हो स्वयं युद्ध के लिये उद्यत हुआ. मायावी असुर ने आसुरी माया से भयंकर विकराल रूप धारण किया. उसके स्वरूप को देख इन्द्रादिक सब देवताओं ने इन्द्र के परामर्श से परम गुरु बृहस्पति जी का आवाह्न किया, गुरु तत्काल आकर कहने लगे-हे देवेन्द्र! अब तुम वृत्रासुर की कथा ध्यान मग्न होकर सुनो-वृत्रासुर प्रथम बड़ा तपस्वी कर्मनिष्ठ था, इसने गन्धमादन पर्वत पर उग्र तप करके शिवजी को प्रसन्न किया था. पूर्व समय में यह चित्ररथ नाम का राजा था, तुम्हारे समीप जो सुरम्य वन है वह इसी का राज्य था, अब साधु प्रवृत्ति विचारवान् महात्मा उस वन में आनन्द लेते हैं. भगवान के दर्शन की अनुपम भूमि है. एक समय चित्ररथ स्वेच्छा से कैलाश पर्वत पर चला गया|
भगवान का स्वरूप और वाम अंग में जगदम्बा को विराजमान देख चित्ररथ हंसा और हाथ जोड़कर शिव शंकर से बोला- हे प्रभो! हम माया मोहित हो विषयों में फंसे रहने के कारण स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं किन्तु देव लोक में ऐसा कहीं मोचर नहीं हुआ कि कोई स्त्री सहित सभा में बैठे चित्ररथ के ये वचन सुनकर सर्वव्यापी भगवान शिव हंसकर बोले कि हे राजन्! मेरा व्यवहारिक दृष्टिकोण पृथक है. मैंने मृत्युदाता काल कूट महाविष का पान किया है. फिर भी तुम साधारण जनों की भांति मेरी हंसी उड़ाते हो. तभी पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ की ओर देखती हुई कहने लगी-ओ दुष्ट तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ मेरी भी हंसी उड़ाई है, तुझे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ेगा|
उपस्थित सभासद महान विशुद्ध प्रकृति के शास्त्र तत्वान्वेषी हैं, और सनक सनन्दन सनत्कुमार हैं हे सर्व अज्ञान के नष्ट हो जाने पर शिव भक्ति में तत्पर हैं, अरे मूर्खराज! तू अति चतुर है अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के मजाक का दुःसाहस ही न करेगा. अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, तुझे मैं शाप देती हूं कि अभी पृथ्वी पर चला जा. जब जगदम्बा भवानी ने चित्ररथ को ये शाप दिया तो वह तत्क्षण विमान से गिरकर, राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और प्रख्यात महासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ. तवष्टा नामक ऋषि ने उसे श्रेष्ठ तप से उत्पन्न किया और अब वही वृत्रासुर शिव भक्ति में ब्रह्मचर्य से रहा. इस कारण तुम उसे जीत नहीं सकते, अतएव मेरे परामर्श से यह प्रदोष व्रत करो जिससे महाबलशाली दैत्य पर विजय प्राप्त कर सको. गुरुदेव के वचनों को सुनकर सब देवता प्रसन्न हुए और गुरुवार त्रयोदशी व्रत विधि-विधान से किया|
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