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धर्म-अध्यात्म
Govardhan Puja 2025: गोवर्धन पूजा पर कैसे करें श्रीकृष्ण को प्रसन्न,जानें 56 भोग और पूजन विधि
Sarita
21 Oct 2025 12:01 PM IST

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Govardhan Puja 2025: गोवर्धन पूजा, सनातन धर्म में दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत की पूजा किए जाने की स्मृति में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब इंद्रदेव के प्रकोप से ब्रजवासियों को बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था, तब से इस दिन को ‘गोवर्धन पूजा’ के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस दिन भक्तजन भगवान कृष्ण और गिरिराज गोवर्धन की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
गोवर्धन पूजा के दिन विशेष रूप से भगवान को 56 भोग अर्पित करने का विधान है। यह भोग भगवान की प्रिय वस्तुओं से तैयार किया जाता है, जिसमें मिठाई, फल, अन्न और विविध पकवान शामिल होते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक 56 भोग अर्पित करने से भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। 2025 में यह पर्व 22 अक्तूबर को मनाया जाएगा और पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 6:30 से 8:47 तक है।
भगवान कृष्ण को क्यों लगाते हैं 56 भोग:
भगवान श्रीकृष्ण को 56 प्रकार के व्यंजन अर्पित करने की परंपरा के पीछे एक अत्यंत भावपूर्ण और रोचक कथा जुड़ी हुई है, जो उनके बचपन के ब्रज जीवन से संबंधित है। कथा के अनुसार, जब इंद्रदेव ने क्रोधित होकर ब्रज पर मूसलधार वर्षा करनी शुरू की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठा लिया। इस अद्भुत लीला के दौरान वे सात दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए पर्वत को थामे रहे, ताकि ब्रजवासी और गौवंश सुरक्षित रह सकें।
जब सातवें दिन वर्षा रुकी और संकट समाप्त हुआ, तब ब्रजवासियों और माता यशोदा को यह ज्ञात हुआ कि नन्हे कृष्ण ने इन सात दिनों में कुछ भी नहीं खाया। उन्हें अपने लाला की भूख की बहुत चिंता हुई। तब अपनी भक्ति, प्रेम और कृतज्ञता के भाव से माता यशोदा और समस्त ब्रजवासियों ने मिलकर श्रीकृष्ण के लिए आठों पहरों के अनुसार सात दिनों का भोजन तैयार किया। इस प्रकार 7 दिन × 8 पहर = 56 व्यंजन बनाए गए। तभी से यह परंपरा "छप्पन भोग" के रूप में स्थापित हो गई, जो आज भी श्रद्धा और प्रेम के प्रतीक के रूप में भगवान को अर्पित किया जाता है।
छप्पन भोग में होते हैं 6 रस:
छप्पन भोग की परंपरा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में भोजन की विविधता, संतुलन और आयुर्वेदिक ज्ञान का भी सुंदर प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाने वाले इन 56 व्यंजनों के माध्यम से भक्ति, प्रेम और आदर प्रकट किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इन 56 व्यंजनों में संसार के छह प्रमुख रस मीठा, खट्टा, नमकीन, अम्लीय, कड़वा और कसैला पूरी तरह समाहित होते हैं। ये छह रस न केवल स्वाद की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि आयुर्वेद के अनुसार शरीर और मन को संतुलित करने में भी सहायक होते हैं।
छप्पन भोग में भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय वस्तुओं को ध्यान में रखकर विविध प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। इनमें प्रमुख मिठाइयां होती हैं - माखन-मिश्री, खीर, पंजीरी, रसगुल्ला, रबड़ी, मूंग दाल का हलवा, जलेबी, मालपुआ, घेवर, मोहनभोग, पेड़ा, काजू-बादाम बर्फी, पिस्ता बर्फी और पंचामृत।
साथ ही नमकीन और खट्टे व्यंजनों मेंमठरी, शक्कर पारा, पकोड़े, चटनी, कचौरी, खिचड़ी, कढ़ी, चीला, दाल, सब्ज़ियाँ (जैसे लौकी और बैंगन की सब्ज़ी), साग, चावल, पूरी, रोटी, पापड़ और भुजिया आदि शामिल हैं।
फलों में आम, केला, अंगूर, सेब, किशमिश और आलू बुखारा जैसे फल अर्पित किए जाते हैं, जबकि पेयों में नारियल पानी, छाछ, शिकंजी, बादाम का दूध और शहद शामिल होते हैं। इसके अलावा सफेद मक्खन, ताजी क्रीम, दलिया, टिक्की, चना, सुपारी, सौंफ, पान और मेवा भी भोग में सम्मिलित होते हैं। इन 56 व्यंजनों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण प्रेम, भक्ति और सम्मान अर्पित किया जाता है।
गोवर्धन अन्नकूट पूजा और भोग अर्पण विधि:
पूजा से पहले भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करने के लिए विविध व्यंजनों से बने 56 भोग तैयार करें।
आंगन या मुख्य द्वार पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाएं।
पर्वत के बीच में कृष्ण जी की आकृति बनाएं जो पर्वत धारण किए हुए हों।
श्रीकृष्ण की आकृति के समक्ष रोली, चावल, बताशे और जल अर्पित करें।
भगवान को क्रमशः दूध, पान, केसर, पुष्प आदि पूजा सामग्री भक्ति भाव से अर्पित करें।
भगवान के समक्ष दीपक जलाएं और उनका ध्यान करें।
सभी 56 व्यंजन स्नेह और श्रद्धा से श्रीकृष्ण के सामने अर्पित करें।
नंदी और गौमाता की पूजा करें। उनके चरणों में हल्दी से तिलक लगाएं।
हरी घास और गुड़ गायों व बछड़ों को अर्पित करें, जो कृष्ण जी की प्रिय वस्तुएं हैं।
अंत में भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें और पूजा संपन्न करें।
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