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Gopashtami upay: गोपाष्टमी पर गौशाला जाकर करें ये छोटा सा काम, घर में होगा सुख- समृद्धि और शांति का वास

Sarita
28 Oct 2025 8:59 AM IST
Gopashtami upay: गोपाष्टमी पर गौशाला जाकर करें ये छोटा सा काम, घर में होगा सुख- समृद्धि और शांति का वास
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Gopashtami upay: दीपावली के बाद गौ माता को समर्पित गोपाष्टमी त्यौहार सभी हिन्दू मनाते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 30 अक्टूबर गुरुवार को गोपाष्टमी है। गोपाष्टमी हमारे निजी सुख और वैभव में हिस्सेदार होने वाले गौवंश का सत्कार है। द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था तभी से इस महोत्सव को मनाने की परम्परा शुरु हुई।
कार्तिक मास में आने वाला यह महोत्सव अति उत्तम फलदायक है। जो लोग नियम से कार्तिक स्नान करते हुए जप, होम, अर्चन का फल पाना चाहते हैं उन्हें गोपाष्टमी पूजन अवश्य करना चाहिए। इस दिन गाय, बैल और बछड़ों को स्नान करवा कर उन्हें सुन्दर आभूषण पहनाएं। यदि आभूषण सम्भव न हो तो उनके सींगों को रंग से सजाएं अथवा उन्हें पीले फूलों की माला से सजाएं। उन्हें हरा चारा और गुड़ खिलाना चाहिए। उनकी आरती करते हुए उनके पैर छूने चाहिएं। गौशाला के लिए दान दें। गोधन की परिक्रमा करना अति उत्तम कर्म है। गोपाष्टमी को गऊ पूजा के साथ गऊओं के रक्षक ग्वाले या गोप को भी तिलक लगा कर उन्हें मीठा खिलाएं। ज्योतिषियों के अनुसार गोपाष्टमी पर पूजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं, उपासक को धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और घर-परिवार में लक्ष्मी का वास होता है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान ने अपने भक्तों की रक्षा करने और अपने भक्तों को दिए वचन को पूरा करने के लिए धरती पर अवतार लेकर गिरिराज गोवर्धन का मान बढ़ाने गोसंवर्धन के लिए ही यह लीला की।
प्राचीनकाल से ही ब्रज क्षेत्र में देवाधिदेव इन्द्र की पूजा की जाती थी। लोगों की मान्यता थी कि इन्द्र समस्त मानव जाति, प्राणियों, जीव जंतुओं को जीवन दान देते हैं और उन्हें तृप्त करने के लिए वर्षा भी करते हैं। इन्द्र को इस बात का बहुत अभिमान हो गया कि लोग उनसे बहुत अधिक डरने लगे हैं।
श्री कृष्ण भगवान ने नंद बाबा को कहा कि वन और पर्वत हमारे घर हैं। गिरि राज गोवर्धन की छत्रछाया में उनका पशुधन चरता है उनसे सभी को वनस्पतियां और छाया मिलती है। गोवर्धन महाराज सभी के देव, हमारे कुलदेवता और रक्षक हैं, इसलिए सभी को गिरिराज गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए।
नंद बाबा की आज्ञा से सभी ने जो सामान इन्द्र देव की पूजा के लिए तैयार किया था उसी से गिरिराज गोवर्धन की पूजा की। भगवान की यह अद्भुत लीला तो देखते ही बनती थी क्योंकि एक ओर तो वह ग्वाल बालों के साथ थे तथा दूसरी ओर साक्षात गिरिराज के रूप में भोग ग्रहण कर रहे थे। सभी ने बड़े आनंद से गिरिराज भगवान का प्रसाद खाया और जो बचा उसे सभी मेें बांटा। इन्द्र को पता चला तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने गोकुल पर इतनी वर्षा की कि चारों तरफ जल थल हो गया। भगवान श्री कृष्ण ने तब गिरिराज पर्वत को अंगुली पर उठाकर सभी गोकुलवासियों की वर्षा से रक्षा की। जब इन्द्र को वास्तविकता का पता चला तो उन्होंने भगवान से क्षमा याचना की। तभी से कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी का उत्सव मनाया जा रहा है।
अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन नन्द बाबा ने श्रीकृष्ण को स्वतन्त्र रूप से गायों को वन में ले जाकर चराने की स्वीकृति दी थी।
मुसलमान पठान महाकवि रसखान कहते हैं: ''मानुष हों तो वही 'रसखानि', बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वारन, जो 'पसु' हौं तो कहा बस मेरो, चरों नित नन्द की 'धेनु' मंझारन।''
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