धर्म-अध्यात्म

Devuthani Ekadashi 2025: जाने देवउठनी एकादशी से ही क्यों शुरू होते हैं विवाह

Sarita
29 Oct 2025 7:44 AM IST
Devuthani Ekadashi 2025: जाने देवउठनी एकादशी से ही क्यों शुरू होते हैं विवाह
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Devuthani Ekadashi 2025: देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन इसलिए विशेष है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं, जिसे देवप्रबोधन कहते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जब सभी शुभ कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं। देवउठनी पर भगवान विष्णु के जागने के साथ ही ब्रह्मांड में शुभता और शुभ ऊर्जा का पुनः प्रवेश होता है। इसलिए इस दिन को विवाह, गृहप्रवेश और अन्य शुभ कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष देवउठनी एकादशी व्रत 1 नवंबर, 2025 को मनाया जाएगा।
चातुर्मास में शुभ कार्य क्यों वर्जित हैं?
आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर भगवान विष्णु क्षीरसागर में योग निद्रा में लीन हो जाते हैं। उस समय से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक की चार मास की अवधि को चातुर्मास कहते हैं। इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन और उपनयन जैसे शुभ कार्य वर्जित होते हैं क्योंकि देवता स्वयं विश्राम में होते हैं। यह समय ध्यान, व्रत, दान और भक्ति के लिए शुभ माना जाता है, लेकिन सांसारिक और शुभ कार्यों के लिए अनुपयुक्त।
कार्तिक शुक्ल एकादशी आने पर भगवान विष्णु की योगनिद्रा समाप्त होती है। इस दिन को देवउठनी या देवप्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के जागने के साथ ही देवताओं के कार्य पुनः प्रारंभ हो जाते हैं और संसार में शुभता लौट आती है। इस दिन देवशयन काल की समाप्ति और शुभ समय की पुनः शुरुआत होती है। इसलिए, इस तिथि से पुनः शुभ कार्यों की अनुमति होती है। कृपया इस समाचार पर एक विस्तृत लेख किसी हिंदी समाचार वेबसाइट के लिए लिखें।
चातुर्मास का समापन और शुभ कार्यों का आरंभ:
देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह का आयोजन अत्यंत शुभ माना जाता है। यह विवाह भगवान विष्णु (शालिग्राम) और देवी तुलसी के मिलन का प्रतीक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी माता देवी लक्ष्मी का अवतार हैं और विष्णु जी से उनका विवाह समृद्धि, सौभाग्य और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। यह घटना ब्रह्मांड में शुभ गतिविधियों के पुनः आरंभ होने का प्रतीक है। चातुर्मास के दौरान, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तो सभी शुभ कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं, लेकिन उनके जागरण के साथ ही शुभ कार्य पुनः प्रारंभ हो जाते हैं। इसलिए, विवाह, गृहप्रवेश, अन्नप्राशन, नामकरण संस्कार आदि संस्कार देवउठनी एकादशी के बाद ही किए जाते हैं, क्योंकि यह समय ईश्वरीय आशीर्वाद और शुभ ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है।
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