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धर्म-अध्यात्म
Devshayani Ekadashi Vrat: देवशयनी एकादशी पर इस शुभ मुहूर्त में करें पूजा, भगवान विष्णु करेंगे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी
Sarita
24 Jun 2025 9:14 AM IST

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Devshayani Ekadashi Vrat: नातन धर्म में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। प्रत्येक एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होती है, लेकिन आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है, का विशेष महत्व होता है। इस दिन भक्तजन व्रत रखते हैं, भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करते हैं और दान-पुण्य का कार्य करते हैं। यह तिथि भगवान विष्णु की योगनिद्रा की शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है।धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत होती है, जो चार महीनों तक चलता है। इस दौरान भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव के द्वारा होता है। चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। यह समय आत्मसंयम, साधना, उपवास और भक्ति के लिए उत्तम माना गया है, जिससे जीवन में शांति और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
देवशयनी एकादशी व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त:
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि इस वर्ष 5 जुलाई 2025 की शाम 6:58 बजे से शुरू होकर 6 जुलाई की रात 9:14 बजे तक रहेगी। पंचांग के अनुसार, व्रत रखने और पूजा-अर्चना के लिए 6 जुलाई 2025 का दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन उपवास और भक्ति भाव से की गई पूजा विशेष फलदायी होती है, जिससे जीवन की समस्याएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
देवशयनी एकादशी पूजा विधि :
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शुद्ध स्नान करें और साफ-सुथरे पीले रंग के वस्त्र धारण करें, क्योंकि पीला रंग इस दिन विशेष शुभ माना जाता है।
हाथ में जल, ताजे फूल और अक्षत लेकर मन में व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु की पूजा करने का संकल्प दृढ़ करें।
पूजा वेदी को साफ करें और उस पर पीले वस्त्र से सजावट करें, फिर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें।
भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) तथा शुद्ध जल से स्नान कराएं, जिससे उनकी पूजा विधिपूर्वक हो सके।
भगवान को पीले वस्त्र पहनाएं और चंदन, ताजे फूल, माला, तुलसी के पत्ते, पान का पत्ता, सुपारी एवं अक्षत अर्पित करें।
शुद्ध घी का दीपक जलाएं और भगवान के सामने दीप प्रज्ज्वलित करें, जिससे पवित्रता और प्रकाश का संचार हो।
विष्णु मंत्रों का जाप करें, जैसे "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय", जिससे मन की एकाग्रता बढ़े और भक्तिभाव प्रगाढ़ हो।
देवशयनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करें या सुनें, जिससे व्रत का महत्व और फल स्पष्ट हो।
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें, उनके चरणों में भक्ति-भाव से दीपक और फूल अर्पित करें।
भोग में पीले फल, दूध से बनी मिठाई और सात्त्विक भोजन परोसें, जो इस दिन के लिए विशेष शुभ माना जाता है।
दिनभर भजन-कीर्तन, मंत्रोच्चारण और साधना करें, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है और मन शुद्ध रहता है।
अगले दिन द्वादशी तिथि को संयम और शुद्धता का पालन करते हुए व्रत का पारण करें, अर्थात् व्रत खोलें।
व्रत रखें और पूरे दिन सात्त्विक आहार या फलाहार लें।
भगवान विष्णु की कथा सुनें या पढ़ें।
विष्णु सहस्रनाम या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें।
जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, जल और अन्य चीजों का दान करें।
संयमित जीवन शैली अपनाएं। मन, वाणी और कर्म को शुद्ध रखें।
क्या न करें :
प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और मसालेदार तामसिक भोजन से दूर रहें।
झूठ बोलने, चुगली करने, क्रोध करने और अपशब्द कहने से बचें।
मन को चंचल न होने दें। एकाग्रता और भक्ति बनाए रखें।
इस दिन विवाह, सगाई या अन्य मांगलिक कार्य न करें।
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