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अमित शाह ने श्री जगन्नाथ मंदिर में आरती की

Nilmani Pal
27 Jun 2025 6:59 AM IST
अमित शाह ने श्री जगन्नाथ मंदिर में आरती की
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गुजरात। अहमदाबाद के श्री जगन्नाथ मंदिर में अमित शाह ने भक्ति भाव से आरती की। शाह ने X पोस्ट में लिखा, रथयात्रा के पावन अवसर पर श्री जगन्नाथ मंदिर, अहमदाबाद की मंगला आरती में शामिल होना अपने आप में दिव्य और अलौकिक अनुभव होता है। आज महाप्रभु की मंगला आरती में शामिल होकर दर्शन-पूजन किया। महाप्रभु सभी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।


जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 का पूरा शेड्यूल

27 जून, शुक्रवार – रथ यात्रा की शुरुआत

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन अलग-अलग भव्य रथों पर सवार होकर पुरी के जगन्नाथ मंदिर से निकलते हैं और गुंडिचा मंदिर की ओर यात्रा करते हैं। हजारों भक्त भारी रस्सों से इन रथों को खींचते हैं। रथ पर चढ़ाने से पहले पुरी के राजा ‘छेरा पन्हारा’ की रस्म निभाते हैं, जिसमें वे सोने के झाड़ू से रथ का चबूतरा साफ करते हैं।

1 जुलाई, मंगलवार – हेरा पंचमी

जब भगवान गुंडिचा मंदिर में पाँच दिन बिताते हैं, तब पाँचवें दिन देवी लक्ष्मी नाराज़ होकर भगवान जगन्नाथ से मिलने आती हैं। यह रस्म हेरा पंचमी कहलाती है।

4 जुलाई, शुक्रवार – संध्या दर्शन

गुंडिचा मंदिर में विशेष दर्शन का आयोजन होता है। इस दिन भक्तजन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन करते हैं और इसे बड़ा शुभ अवसर माना जाता है।

5 जुलाई, शनिवार – बहुदा यात्रा

भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ रथों पर सवार होकर वापस जगन्नाथ मंदिर की ओर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है। रास्ते में वे मौसी माँ के मंदिर (अर्ध रास्ते में) रुकते हैं, जहाँ उन्हें ओड़िशा की खास मिठाई 'पोडा पिठा' का भोग लगाया जाता है।

6 जुलाई, रविवार – सुना बेशा

इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है। यह अत्यंत भव्य श्रृंगार होता है जिसे देखने हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।

7 जुलाई, सोमवार – अधरा पना

इस दिन भगवानों को एक विशेष मीठा पेय 'अधरा पना' अर्पित किया जाता है, जो बड़े मिट्टी के घड़ों में तैयार होता है। इसमें पानी, दूध, पनीर, चीनी और कुछ पारंपरिक मसाले मिलाए जाते हैं।

8 जुलाई, मंगलवार – नीलाद्रि विजय (समापन)

यह रथ यात्रा का अंतिम और सबसे भावनात्मक दिन होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा वापस अपने मुख्य मंदिर में लौटते हैं और गर्भगृह में पुनः स्थापित होते हैं। इसे ‘नीलाद्रि विजय’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है – "नीलाचल (पुरी) की पुनः विजय"।

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