उत्तर प्रदेश

फांसी की सजा पाने वाली मेरठ में पहली महिला होगी मुस्कान

Rajeshwari Nishad
15 Oct 2026 8:19 PM IST
फांसी की सजा पाने वाली मेरठ में पहली महिला होगी मुस्कान
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मेरठ। उत्तर प्रदेश के मेरठ में चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड, जिसे 'नीला ड्रम हत्याकांड' के नाम से भी जाना जाता है, में अदालत के फैसले के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय सुर्खियों में हैं। उन्होंने बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई। अदालत के इस फैसले के बाद लोग न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा के जीवन, शिक्षा और न्यायिक करियर के बारे में जानना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में जन्मे अरविंद कुमार मिश्रा करीब 23 वर्षों से न्यायिक सेवा में कार्यरत हैं। उन्होंने वर्ष 2003 में सिविल जज के रूप में अपने न्यायिक करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद गाजीपुर, अलीगढ़, गोरखपुर, कानपुर और मिर्जापुर सहित कई जिलों में महत्वपूर्ण न्यायिक जिम्मेदारियां संभालीं।
मऊ जिले में हुआ था जन्म
जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय का जन्म 2 जुलाई 1971 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में हुआ था।उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा हासिल की और कानून के क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला लिया।
अरविंद कुमार मिश्रा ने बीए, एलएलबी और एलएलएम की पढ़ाई की है।कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने न्यायिक सेवा में प्रवेश किया।वर्षों के अनुभव और विभिन्न जिलों में न्यायिक जिम्मेदारियां निभाने के बाद वह जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद तक पहुंचे।31 मई 2003 को शुरू हुआ न्यायिक करियरअरविंद कुमार मिश्रा ने 31 मई 2003 को उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में अपना करियर शुरू किया था।
उनकी पहली नियुक्ति सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर हुई थी।न्यायिक सेवा में शुरुआती वर्षों के दौरान उन्होंने अदालत में आने वाले विभिन्न प्रकार के मामलों की सुनवाई की।समय के साथ उन्हें अलग-अलग स्तरों पर न्यायिक जिम्मेदारियां सौंपी गईं।सिविल जज से जिला एवं सत्र न्यायाधीश तक पहुंचने का उनका सफर करीब 23 वर्षों का रहा है।इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई जिलों में कार्य किया।
कई जिलों में निभाई न्यायिक जिम्मेदारी
न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा अपने लंबे करियर में विभिन्न जिलों में तैनात रहे हैं।उनकी तैनाती गाजीपुर, अलीगढ़, गोरखपुर, कानपुर और मिर्जापुर सहित कई जिलों में रही।इन जिलों में उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत अलग-अलग मामलों की सुनवाई और संबंधित जिम्मेदारियां निभाईं।
जिला न्यायपालिका में न्यायाधीशों को दीवानी और आपराधिक मामलों के अलावा प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभानी होती हैं।लंबे अनुभव के बाद अरविंद कुमार मिश्रा को जिला एवं सत्र न्यायाधीश का दायित्व मिला।नवंबर 2024 में बने मिर्जापुर के जिला जजअरविंद कुमार मिश्रा को नवंबर 2024 में मिर्जापुर जिले के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था।
यह उनके न्यायिक करियर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल रहा।मिर्जापुर में तैनाती के दौरान उन्होंने जिला न्यायालय से संबंधित न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों का दायित्व संभाला।इसके बाद वर्ष 2026 में उनका स्थानांतरण मेरठ कर दिया गया।मिर्जापुर से मेरठ स्थानांतरण के बाद उन्हें एक बड़े जिले की न्यायिक व्यवस्था की जिम्मेदारी मिली।
21 मई 2026 से मेरठ में तैनात
अरविंद कुमार मिश्रा 21 मई 2026 से मेरठ जिले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर तैनात हैं।मेरठ में नियुक्ति के लगभग पांच महीने बाद ही उन्होंने बहुचर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।इस मामले में पूरे देश की नजर मेरठ की जिला अदालत पर थी।मामले की गंभीरता और हत्याकांड की परिस्थितियों के कारण अदालत के निर्णय को लेकर लोगों में उत्सुकता बनी हुई थी।14 अक्टूबर को अदालत ने मुस्कान और साहिल को
मृत्युदंड
सुनाया।
क्या था मेरठ का नीला ड्रम हत्याकांड?
मेरठ का नीला ड्रम हत्याकांड मार्च 2025 में सामने आया था।इस मामले में सौरभ राजपूत की हत्या कर उनके शव को टुकड़ों में काटकर एक नीले ड्रम में रखने की घटना सामने आई थी।जांच के दौरान सौरभ की पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके साथी साहिल शुक्ला की भूमिका सामने आई।पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया था।
इस घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी।
हत्या के तरीके और शव को छिपाने की परिस्थितियों के कारण इसे 'नीला ड्रम हत्याकांड' कहा जाने लगा।30 सितंबर को दोषी करार, 14 अक्टूबर को सजामेरठ की जिला अदालत में इस मामले की सुनवाई लंबे समय तक चली।
अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने गवाहों के बयान और विभिन्न साक्ष्य प्रस्तुत किए।मुकदमे में अभियोजन पक्ष ने 22 गवाहों की गवाही पर भरोसा किया।सुनवाई के दौरान दोनों आरोपियों को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया।30 सितंबर 2026 को अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी करार दिया।इसके बाद सजा के प्रश्न पर सुनवाई हुई।14 अक्टूबर 2026 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय की अदालत ने दोनों को फांसी की सजा सुनाई।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हुई दोषियों की पेशी
सजा सुनाए जाने के दौरान मुस्कान और साहिल को जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के सामने पेश किया गया।दोनों ने अदालत की कार्यवाही में हिस्सा लिया।अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सजा का आदेश सुनाया।मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सजा सुनाए जाने के बाद दोनों दोषियों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
हालांकि, अदालत का फैसला प्रस्तुत साक्ष्यों, कानूनी प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर दिया गया।फैसले में महाभारत का भी उल्लेखमुस्कान-साहिल को फांसी की सजा सुनाते समय अदालत के फैसले में महाभारत के एक प्रसंग का भी उल्लेख किया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने समाज में दंड व्यवस्था के महत्व को समझाने के लिए महाभारत का उदाहरण दिया।फैसले में इस विचार पर जोर दिया गया कि समाज में व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों की रोकथाम के लिए कानून के अनुसार दंड देना आवश्यक है।अदालत ने अपराध की गंभीरता और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दोनों दोषियों को मृत्युदंड सुनाया।इस टिप्पणी की भी चर्चा हुई कि दंड न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मृत्युदंड सुनाने के बाद पेन फेंकने की चर्चा
फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा से जुड़ा एक और घटनाक्रम चर्चा में आया।कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने मृत्युदंड का फैसला लिखने में इस्तेमाल किया गया पेन कूड़ेदान में डाल दिया।इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर भी चर्चा हुई।
आमतौर पर इसे मृत्युदंड के फैसलों से जुड़ी एक प्रतीकात्मक परंपरा के रूप में बताया जाता है।हालांकि, कानून में मृत्युदंड सुनाने वाले न्यायाधीश के लिए पेन तोड़ना या फेंकना अनिवार्य नहीं है।इसलिए इसे किसी कानूनी प्रक्रिया की आवश्यक शर्त नहीं माना जाना चाहिए।
फांसी की सजा पर हाईकोर्ट की पुष्टि जरूरी
मेरठ की जिला अदालत ने मुस्कान और साहिल को मृत्युदंड सुनाया है, लेकिन इस सजा पर तत्काल अमल नहीं किया जा सकता।भारतीय न्यायिक व्यवस्था में सत्र न्यायालय द्वारा सुनाए गए मृत्युदंड की पुष्टि संबंधित उच्च न्यायालय से होना आवश्यक है।इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट सजा की पुष्टि से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया पर विचार करेगा।
दोषियों के पास कानून के अनुसार अपील करने का अधिकार भी है।आगे की न्यायिक प्रक्रिया में अदालत सजा को बरकरार रख सकती है, उसमें बदलाव कर सकती है या उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी आधारों पर अन्य आदेश दे सकती है।23 साल के अनुभव वाले न्यायाधीश का चर्चित फैसला
अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय ने लगभग 23 वर्षों के न्यायिक करियर में कई जिलों में सेवा दी है।मऊ से शिक्षा हासिल कर न्यायिक सेवा में प्रवेश करने और फिर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद तक पहुंचने का उनका सफर महत्वपूर्ण रहा है।मेरठ में तैनाती के दौरान सौरभ राजपूत हत्याकांड का फैसला उनके न्यायिक करियर के चर्चित मामलों में शामिल हो गया है।
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