उत्तर प्रदेश

गन्ना किसानों को बड़ी सौगात, चार नई किस्में मंजूर

Kanchan Paikara
7 Oct 2026 7:31 PM IST
गन्ना किसानों को बड़ी सौगात, चार नई किस्में मंजूर
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए बड़ी राहत की खबर है। राज्य में गन्ने की चार नई उन्नत किस्मों को खेती के लिए मंजूरी दे दी गई है। इन नई किस्मों का उद्देश्य किसानों को अधिक पैदावार, बेहतर शुगर रिकवरी और लाल सड़न रोग से सुरक्षा देना है। खास बात यह है कि इनमें से एक अगेती किस्म को.शा.23232 को लंबे समय से लोकप्रिय रही को.0238 का बेहतर विकल्प माना जा रहा है।
29 सितंबर को गन्ना एवं चीनी आयुक्त की अध्यक्षता में हुई ‘बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति’ की बैठक में इन चार किस्मों को मंजूरी दी गई। इनमें उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर द्वारा विकसित को.शा.23232, को.शा.19235 और को.शा.18232 शामिल हैं। इसके अलावा भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ की को.लख.21201 को भी खेती के लिए स्वीकृति मिली है।
को.0238 का विकल्प क्यों जरूरी हुआ?
उत्तर प्रदेश में को.0238 किस्म कई वर्षों से किसानों के बीच सबसे लोकप्रिय किस्मों में रही है। अधिक पैदावार और अच्छी चीनी रिकवरी की वजह से इसका क्षेत्र तेजी से बढ़ा था। लेकिन समय के साथ यह लाल सड़न रोग के प्रति संवेदनशील होती गई। इस बीमारी ने कई इलाकों में फसल को नुकसान पहुंचाया और इसका असर गन्ना तथा चीनी उत्पादन दोनों पर पड़ा।
यही वजह है कि वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसी नई किस्मों पर काम कर रहे थे, जो को.0238 जैसी अच्छी उपज देने के साथ रोग प्रतिरोधी भी हों। नई को.शा.23232 इसी दिशा में अहम विकल्प के रूप में सामने आई है।
को.शा.23232 ने दी 95.56 टन प्रति हेक्टेयर उपज
बैठक में पेश आंकड़ों के अनुसार अगेती किस्म को.शा.23232 की पौधा गन्ना फसल की औसत उपज 95.56 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। यह मानक किस्म को.0238 की तुलना में 9.44 प्रतिशत अधिक है।
इसकी पेड़ी फसल की औसत उपज 80.57 टन प्रति हेक्टेयर रही, जो को.0238 से 3.16 प्रतिशत अधिक है। नई किस्म में अच्छी पेड़ी क्षमता भी पाई गई है, जो किसानों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गन्ने की पहली कटाई के बाद उसी जड़ से अगली फसल लेने पर लागत कम होती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि को.शा.23232 में लाल सड़न रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बताई गई है। इसी वजह से इसे पूरे उत्तर प्रदेश में खेती के लिए मंजूरी मिली है।
चीनी की मात्रा भी बेहतर
नई किस्म के परीक्षण में केवल उपज ही नहीं बल्कि शर्करा प्रतिशत पर भी ध्यान दिया गया। को.शा.23232 में नवंबर, जनवरी और मार्च के दौरान शर्करा प्रतिशत क्रमशः लगभग 13.10, 13.77 और 14.05 दर्ज किया गया। इसे को.0238 के मुकाबले बेहतर माना गया है।
बेहतर शुगर कंटेंट का सीधा फायदा चीनी मिलों को मिल सकता है। अगर प्रति टन गन्ने से ज्यादा चीनी निकलती है तो मिलों की रिकवरी सुधरती है और पूरी चीनी उद्योग श्रृंखला को फायदा हो सकता है।
को.लख.21201 भी अगेती किस्म
भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ की को.लख.21201 भी अगेती किस्म है। इसकी औसत उपज 86.57 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। यह भी लाल सड़न रोग के प्रति उच्च प्रतिरोध क्षमता वाली और अच्छी पेड़ी देने वाली किस्म बताई गई है। इसे भी पूरे उत्तर प्रदेश में खेती के लिए जारी किया गया है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि कई अलग-अलग अगेती किस्में उपलब्ध होने से किसानों को केवल एक प्रजाति पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे किसी एक रोग के फैलने पर बड़े क्षेत्र में एक साथ नुकसान होने का जोखिम कम किया जा सकता है।
दो मध्य और देर से पकने वाली किस्में भी मिलीं
नई मंजूरी में को.शा.19235 और को.शा.18232 को मध्य एवं देर से पकने वाली श्रेणी में रखा गया है। को.शा.19235 की पौधा फसल की औसत उपज 87.58 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज हुई, जो मानक किस्म को.शा.767 से 21.01 प्रतिशत अधिक बताई गई है। इसकी पेड़ी उपज 73.90 टन प्रति हेक्टेयर रही।
वहीं को.शा.18232 ने पौधा फसल में 92.38 टन प्रति हेक्टेयर की औसत उपज दी, जो मानक किस्म को.शा.767 से 26.51 प्रतिशत अधिक रही। इसकी पेड़ी उपज 82.06 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई।
इन किस्मों के जरिए किसानों को अगेती के साथ मध्य और देर से पकने वाली फसल का भी विकल्प मिलेगा। इससे कटाई और चीनी मिलों में गन्ना आपूर्ति का समय बेहतर तरीके से बांटा जा सकता है।
आठ और नोटिफाइड किस्में भी अपनाई गईं
चार नई किस्मों के अलावा केंद्र सरकार द्वारा पहले से नोटिफाइड आठ गन्ना किस्मों को भी उत्तर प्रदेश में खेती के लिए अंगीकृत किया गया है। इनमें कुछ किस्में पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए और बाकी पश्चिमी तथा मध्य उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त मानी गई हैं।
इसका मतलब है कि आने वाले समय में किसानों के पास क्षेत्र और जलवायु के हिसाब से ज्यादा विकल्प होंगे। इससे एक ही किस्म का अत्यधिक विस्तार रोकने में भी मदद मिल सकती है।
छह पुरानी किस्में होंगी बाहर
उप समिति ने छह पुरानी और कम लोकप्रिय किस्मों को अनुपयुक्त घोषित किया है। इन्हें अगले दो वर्षों में चरणबद्ध तरीके से खेती से बाहर किया जाएगा। सरकार का फोकस ऐसी प्रजातियों को बढ़ावा देने पर है जो ज्यादा उपज देने के साथ रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध रखती हों।
किसानों और चीनी मिलों दोनों को फायदा
उत्तर प्रदेश देश का प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य है। ऐसे में नई किस्मों का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। बेहतर पैदावार से जहां किसानों को प्रति हेक्टेयर ज्यादा गन्ना मिल सकता है, वहीं अधिक शुगर रिकवरी से चीनी मिलों को भी फायदा होगा।
लाल सड़न जैसी बीमारी से फसल खराब होने पर किसानों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है। एक तरफ उत्पादन घटता है और दूसरी तरफ अगली पेड़ी फसल भी प्रभावित हो सकती है। रोग प्रतिरोधी किस्में इस जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं।
कुल मिलाकर चार नई उन्नत किस्मों को मंजूरी उत्तर प्रदेश के गन्ना क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। खासतौर पर को.शा.23232 से किसानों को को.0238 का नया विकल्प मिलने की उम्मीद है। हालांकि नई किस्मों की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज कितनी तेजी से पहुंचता है और अलग-अलग इलाकों में वास्तविक खेत परिस्थितियों में इनका प्रदर्शन कैसा रहता है।
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