तमिलनाडू
सेंगोल निर्माता वुम्मिदी एथिराज का निधन, PM मोदी ने जताया दुख
Rajeshwari Nishad
21 Oct 2026 4:15 PM IST

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Tamil Nadu: तमिलनाडु के प्रतिष्ठित शिल्पकार परिवार वुम्मिदी बंगारू चेट्टी परिवार का नाम ऐतिहासिक सेंगोल के निर्माण से जुड़ा है। इसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले वुम्मिदी एथिराज का जन्म 25 नवंबर 1926 को हुआ था। इस लिहाज से नवंबर 2026 में वह अपने जीवन के 100 वर्ष पूरे करने वाले थे। उनका नाम ऐसे परिवार से जुड़ा रहा, जिसकी शिल्पकला और आभूषण निर्माण की परंपरा ने भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण प्रतीक सेंगोल को तैयार करने में भूमिका निभाई। सेंगोल को लेकर देश में चर्चा बढ़ने के साथ इसे बनाने वाले परिवार की विरासत और उसके कारीगरों की भूमिका भी लोगों के ध्यान में आई है।
प्रतिष्ठित शिल्पकार परिवार से था संबंध
वुम्मिदी एथिराज तमिलनाडु के एक प्रतिष्ठित शिल्पकार परिवार से जुड़े थे। उनका संबंध चेन्नई के वुम्मिदी बंगारू चेट्टी परिवार से था, जो आभूषण निर्माण और पारंपरिक शिल्पकला के लिए जाना जाता है। इस परिवार की पहचान केवल कारोबार तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके काम में भारतीय परंपरा, बारीक कारीगरी और ऐतिहासिक महत्व वाली वस्तुओं के निर्माण की झलक भी दिखाई देती है।
भारत में पारंपरिक आभूषण और धातु शिल्प की अपनी समृद्ध विरासत रही है। पीढ़ियों से कारीगर सोने, चांदी और अन्य धातुओं पर बारीक नक्काशी करके ऐसी वस्तुएं तैयार करते आए हैं, जिनका धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व होता है। वुम्मिदी बंगारू चेट्टी परिवार भी इसी शिल्प परंपरा से जुड़ा रहा है।
ऐतिहासिक सेंगोल बनाने में परिवार की भूमिका
वुम्मिदी बंगारू चेट्टी परिवार का नाम ऐतिहासिक सेंगोल के निर्माण के कारण विशेष रूप से चर्चा में आया। सेंगोल एक राजदंड है, जिसे भारतीय परंपरा में सत्ता, अधिकार और न्याय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसका संबंध तमिल परंपरा से भी बताया जाता है।
ऐतिहासिक सेंगोल चांदी से बनाया गया था और उस पर सोने की परत चढ़ाई गई थी। इसे तैयार करने में धातु शिल्प और बारीक कारीगरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। किसी ऐसी वस्तु का निर्माण, जिसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ देखा जाता है, कारीगरों के कौशल और उनकी पारंपरिक तकनीकों को भी सामने लाता है।
सेंगोल के निर्माण से जुड़े परिवार का उल्लेख इस बात की याद दिलाता है कि इतिहास में महत्वपूर्ण प्रतीकों के पीछे केवल राजनीतिक घटनाएं ही नहीं होतीं, बल्कि उन कारीगरों का योगदान भी होता है, जो अपनी कला के जरिए किसी विचार या परंपरा को भौतिक रूप देते हैं।
क्या है सेंगोल का ऐतिहासिक महत्व?
सेंगोल शब्द का संबंध तमिल भाषा से है। इसे राजदंड के अर्थ में समझा जाता है और परंपरागत रूप से इसे शासन, न्याय तथा जिम्मेदारी के प्रतीक के तौर पर देखा गया है। भारतीय इतिहास और परंपराओं में राजदंड जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल सत्ता के हस्तांतरण और शासक के कर्तव्यों को दर्शाने के लिए किया जाता रहा है।
आधुनिक भारत में सेंगोल एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा में आया, जब इसे संसद भवन में स्थापित किया गया। इसके साथ भारत की ऐतिहासिक परंपराओं और स्वतंत्रता के समय सत्ता हस्तांतरण से जुड़े प्रसंगों पर भी चर्चा हुई।
सेंगोल के इतिहास और 1947 में सत्ता हस्तांतरण से इसके संबंध को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक विवरण सामने आते रहे हैं। इसलिए इससे जुड़े किसी भी विशेष दावे को समझते समय ऐतिहासिक दस्तावेजों और विश्वसनीय स्रोतों का संदर्भ महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसके निर्माण में पारंपरिक शिल्पकला की भूमिका और वुम्मिदी बंगारू चेट्टी परिवार का नाम इस वस्तु से जुड़ी चर्चा का अहम हिस्सा है।
25 नवंबर 1926 को हुआ था जन्म
वुम्मिदी एथिराज का जन्म 25 नवंबर 1926 को हुआ था। इस तारीख के आधार पर नवंबर 2026 में उनके 100 वर्ष पूरे होने वाले थे। उनका जीवनकाल भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण बदलावों का साक्षी रहा होगा, जिसमें स्वतंत्रता से पहले का दौर, आजादी के बाद देश का विकास और पारंपरिक कारोबारों में आए परिवर्तन शामिल हैं।
हालांकि, उनके व्यक्तिगत जीवन, शिल्पकला में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका और परिवार के कारोबार में उनके योगदान के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध होने पर ही उनके जीवन की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है। केवल परिवार से संबंध के आधार पर सेंगोल के निर्माण में उनकी व्यक्तिगत भूमिका के बारे में कोई निश्चित दावा करना उचित नहीं होगा।
फिर भी, उनका नाम जिस परिवार से जुड़ा था, उसकी ऐतिहासिक विरासत भारतीय पारंपरिक शिल्प के महत्व को समझने का अवसर देती है।
पारंपरिक कारीगरों की विरासत का महत्व
भारत में शिल्पकार परिवारों ने सदियों से कला और संस्कृति को संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाई है। धातु पर नक्काशी, आभूषण निर्माण, मूर्तिकला और पारंपरिक वस्तुओं को तैयार करने की तकनीकें अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। इन कारीगरों का योगदान कई बार किसी ऐतिहासिक वस्तु के माध्यम से सामने आता है, जबकि उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी लोगों तक पहुंचती है।
सेंगोल के निर्माण से जुड़ा वुम्मिदी बंगारू चेट्टी परिवार भी ऐसी ही विरासत का उदाहरण है। इस परिवार की चर्चा से यह समझने में मदद मिलती है कि किसी ऐतिहासिक प्रतीक को तैयार करने में शिल्पकारों का कौशल और उनकी परंपराएं कितनी महत्वपूर्ण होती हैं।
वुम्मिदी एथिराज का नाम और उनका पारिवारिक संबंध इसी विरासत की ओर ध्यान खींचता है। उनके जन्म की तारीख के अनुसार नवंबर 2026 में उनके 100 वर्ष पूरे होने वाले थे। सेंगोल के निर्माण से जुड़े परिवार का इतिहास भारतीय शिल्पकला, सांस्कृतिक परंपरा और ऐतिहासिक प्रतीकों के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करता है।
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