महाराष्ट्र

सिंहस्थ कुंभ का आगाज, राष्ट्रपति मुर्मु ने किया ध्वजारोहण

Rajeshwari Nishad
31 Oct 2026 8:58 PM IST
सिंहस्थ कुंभ का आगाज, राष्ट्रपति मुर्मु ने किया ध्वजारोहण
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नासिक। महाराष्ट्र के नासिक में धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक परंपरा और सनातन संस्कृति से जुड़े ऐतिहासिक नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले का शनिवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गोदावरी नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध रामकुंड में पारंपरिक ध्वजारोहण कर इस धार्मिक आयोजन की शुरुआत की। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच राष्ट्रपति ने पूजा-अर्चना की तथा धर्मध्वज फहराया। इस अवसर को सिंहस्थ कुंभ की धार्मिक परंपराओं के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नासिक और त्र्यंबकेश्वर का यह आयोजन देश की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने रामकुंड में विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। इसके बाद पारंपरिक धार्मिक ध्वज फहराकर सिंहस्थ कुंभ से जुड़े अनुष्ठानों का शुभारंभ किया। इस धार्मिक कार्यक्रम के दौरान वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया गया। ध्वजारोहण की परंपरा कुंभ आयोजन के महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल है। इसे आयोजन की औपचारिक शुरुआत और धार्मिक गतिविधियों के शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है।
रामकुंड में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ ध्वजारोहण
नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित रामकुंड का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम अपने वनवास के दौरान नासिक क्षेत्र में रहे थे। इसी कारण रामकुंड को भगवान श्रीराम से जुड़ा पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है।शनिवार को इसी ऐतिहासिक स्थल पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सिंहस्थ कुंभ मेले के शुभारंभ की धार्मिक परंपरा निभाई। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा-अर्चना के बाद धर्मध्वज फहराया गया।
धार्मिक ध्वजारोहण को आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धार्मिक परंपराओं में ध्वज का विशेष स्थान है। मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में ध्वजारोहण को शुभता, धर्म और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।
नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ का विशेष महत्व
नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेला हिंदू धर्म के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल है। कुंभ मेले का आयोजन भारत के चार प्रमुख तीर्थस्थलों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में निर्धारित ज्योतिषीय संयोगों के आधार पर किया जाता है।
नासिक में कुंभ का संबंध पवित्र गोदावरी नदी से है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गोदावरी में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी वजह से कुंभ के दौरान बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु नासिक तथा त्र्यंबकेश्वर पहुंचते हैं।
सिंहस्थ कुंभ का आयोजन लगभग बारह वर्षों के अंतराल पर होने वाले विशिष्ट ग्रह-नक्षत्र संयोगों से जुड़ा है। धार्मिक दृष्टि से यह अवसर आत्मशुद्धि, साधना, दान और आध्यात्मिक चिंतन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
गोदावरी नदी से जुड़ी हैं करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्थाएं
गोदावरी नदी को दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है। यह नदी महाराष्ट्र के त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र से निकलती है और कई राज्यों से होकर बहती है। हिंदू धार्मिक परंपराओं में इसका विशेष स्थान है।नासिक का रामकुंड गोदावरी नदी के सबसे प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में शामिल है। यहां श्रद्धालु स्नान, पूजा, तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।कुंभ के अवसर पर गोदावरी नदी में पवित्र स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान स्नान और पूजा-अर्चना करने से आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है।राष्ट्रपति द्वारा रामकुंड में पूजा-अर्चना और ध्वजारोहण किए जाने से इस ऐतिहासिक तीर्थस्थल का धार्मिक महत्व एक बार फिर चर्चा में आया है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग से भी जुड़ा है कुंभ
नासिक के समीप स्थित त्र्यंबकेश्वर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह स्थान हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है।त्र्यंबकेश्वर मंदिर और गोदावरी नदी का उद्गम क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिंहस्थ कुंभ के दौरान नासिक के साथ त्र्यंबकेश्वर में भी विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और स्नान परंपराओं का विशेष महत्व रहता है।कुंभ के अवसर पर देशभर से साधु-संत, अखाड़ों के प्रतिनिधि और श्रद्धालु इन तीर्थस्थलों पर पहुंचते हैं। इस दौरान धार्मिक प्रवचन, पूजा-अर्चना और आध्यात्मिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।
भारतीय संस्कृति और एकता का प्रतीक है कुंभ
कुंभ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का विशाल उत्सव भी है। इसमें विभिन्न राज्यों, भाषाओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के लोग एक साथ शामिल होते हैं।साधु-संतों की परंपराएं, धार्मिक अनुष्ठान और श्रद्धालुओं की सहभागिता इस आयोजन को विशेष पहचान प्रदान करती हैं।कुंभ मेले को यूनेस्को ने वर्ष 2017 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था। इससे इस आयोजन की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की ओर से सिंहस्थ कुंभ से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान का शुभारंभ इस सांस्कृतिक विरासत के महत्व को रेखांकित करता है।
श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा महत्वपूर्ण
सिंहस्थ कुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल होती है। बड़ी संख्या में लोगों के आने की संभावना को देखते हुए यातायात, स्वच्छता, पेयजल, चिकित्सा और भीड़ प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं की विशेष आवश्यकता होती है।इसके अलावा नदी घाटों पर सुरक्षित स्नान, आपातकालीन सेवाओं और धार्मिक गतिविधियों के सुचारु संचालन के लिए प्रशासनिक तैयारियां महत्वपूर्ण होती हैं।हालांकि, आगामी स्नान पर्वों की विस्तृत समयसारिणी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की आधिकारिक जानकारी अलग से जारी की जा सकती है।
धर्मध्वज फहराने के साथ ऐतिहासिक आयोजन की शुरुआत
गोदावरी नदी के तट पर स्थित रामकुंड में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा पारंपरिक ध्वजारोहण के साथ नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले से जुड़े धार्मिक कार्यक्रमों का शुभारंभ हुआ।वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और धर्मध्वज फहराने की परंपरा ने इस अवसर को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया। यह आयोजन भारत की समृद्ध धार्मिक विरासत और सदियों पुरानी कुंभ परंपरा का प्रतीक है।
राष्ट्रपति की उपस्थिति में हुए इस धार्मिक अनुष्ठान के बाद नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ से जुड़ी आगामी गतिविधियों और तैयारियों पर श्रद्धालुओं की नजर बनी हुई है।
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