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मध्य प्रदेश
मोदी के नेतृत्व में बढ़ रहा भारत का सामर्थ्य: मोहन यादव
Rajeshwari Nishad
19 Oct 2026 7:40 PM IST

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Madhya Pradesh : विजयादशमी सत्य, साहस और धर्म की विजय का महापर्व है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध खड़े होने का संकल्प उससे बड़ा होता है। भगवान श्रीराम की रावण पर विजय इसी विश्वास का प्रतीक है। विजयादशमी का संदेश केवल बुराई पर अच्छाई की जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्य की रक्षा, शक्ति के सदुपयोग और न्याय के लिए सामूहिक प्रयास करने की प्रेरणा भी देता है।
सत्य और धर्म की विजय का प्रतीक है विजयादशमी
भारतीय संस्कृति में विजयादशमी का विशेष महत्व है। यह पर्व हर वर्ष इस विश्वास के साथ मनाया जाता है कि अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है। भगवान श्रीराम और रावण के बीच हुआ युद्ध इसी विचार को मजबूत करता है। रावण के पास अपार शक्ति, ज्ञान और वैभव था, लेकिन अहंकार और अधर्म ने उसके पतन का मार्ग तैयार किया। वहीं, श्रीराम ने सत्य, मर्यादा और कर्तव्य का पालन करते हुए धर्म की स्थापना की।
यह प्रसंग बताता है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक महानता केवल उसकी शक्ति या संपत्ति से तय नहीं होती, बल्कि उसके आचरण और मूल्यों से निर्धारित होती है। शक्ति तभी सार्थक होती है, जब उसका उपयोग न्याय की रक्षा और समाज के कल्याण के लिए किया जाए।
विजयादशमी इसी शाश्वत विचार को जन-जन तक पहुंचाने वाला पर्व है। यह हमें विश्वास दिलाता है कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों, सत्य के मार्ग पर चलने वालों को अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटना चाहिए।
अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना जरूरी
विजयादशमी का संदेश वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में भी प्रासंगिक है। समाज में जब अन्याय, शोषण, भेदभाव और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं सामने आती हैं, तब केवल बदलाव की अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए लोगों को जागरूक होकर सही के पक्ष में खड़ा होना पड़ता है।
न्याय की स्थापना तभी संभव है, जब समाज अन्याय को सामान्य मानकर स्वीकार करने के बजाय उसका विरोध करने का साहस दिखाए। गलत के सामने मौन रहना कई बार अन्याय को बढ़ावा देता है, जबकि सत्य का साथ देने से सकारात्मक परिवर्तन की राह खुलती है।
यह पर्व हमें प्रेरित करता है कि हम अपने दैनिक जीवन में ईमानदारी, निष्पक्षता और जिम्मेदारी को महत्व दें। किसी के साथ अन्याय होते देखने पर उचित तरीके से उसका समर्थन करना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी विजयादशमी की भावना को व्यवहार में उतारने का माध्यम है।
शक्ति की सार्थकता उसके सदुपयोग में
विजयादशमी शक्ति और सामर्थ्य के सही उपयोग की सीख भी देती है। शक्ति का उद्देश्य दूसरों को दबाना या अपनी श्रेष्ठता साबित करना नहीं, बल्कि कमजोरों की रक्षा करना, अन्याय का प्रतिकार करना और समाज में संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।
रावण का चरित्र इस बात का उदाहरण है कि ज्ञान और सामर्थ्य के बावजूद अहंकार व्यक्ति को विनाश की ओर ले जा सकता है। इसके विपरीत, भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, संयम और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देता है। उनकी विजय यह स्पष्ट करती है कि शक्ति के साथ विवेक और नैतिकता का होना भी आवश्यक है।
आज के समय में यह विचार हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। परिवार, समाज, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारों और क्षमताओं का इस्तेमाल जनहित में करना चाहिए। शक्ति का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उससे लोगों को सुरक्षा, सम्मान और न्याय मिल सके।
अपने भीतर की बुराइयों पर विजय का संकल्प
विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस परंपरा का वास्तविक अर्थ केवल बाहरी बुराइयों के अंत तक सीमित नहीं है। यह पर्व व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और अपनी कमजोरियों को पहचानने का अवसर भी देता है।
अहंकार, क्रोध, लालच, छल और द्वेष जैसी प्रवृत्तियां व्यक्ति के विवेक को कमजोर करती हैं। जब तक इन बुराइयों पर नियंत्रण नहीं पाया जाता, तब तक सच्चे अर्थों में विजय का अनुभव अधूरा रहता है। इसलिए विजयादशमी का अवसर आत्ममंथन और आत्मसुधार का संदेश देता है।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यवहार में ईमानदारी अपनाए, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करे और अपने कर्तव्यों को गंभीरता से निभाए, तो समाज में विश्वास और सद्भाव का वातावरण मजबूत हो सकता है। यही इस पर्व की सबसे महत्वपूर्ण सीखों में से एक है।
न्याय के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक
न्याय केवल एक विचार या इच्छा नहीं, बल्कि उसे साकार करने के लिए निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। किसी भी समाज में न्याय की भावना तभी मजबूत होती है, जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के साथ दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करते हैं।
विजयादशमी हमें यह समझाती है कि सत्य के प्रति आस्था के साथ उसकी रक्षा का साहस भी आवश्यक है। समाज को अन्याय के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए और कानून, नैतिकता तथा मानवीय मूल्यों के अनुरूप सही का समर्थन करना चाहिए।
सामूहिक जिम्मेदारी और सकारात्मक सोच के माध्यम से ही ऐसा वातावरण बनाया जा सकता है, जहां कमजोर और वंचित लोगों को भी सम्मान तथा न्याय मिल सके। इस दिशा में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण है।
सत्य का सामर्थ्य शाश्वत
विजयादशमी का मूल संदेश यही है कि असत्य का वैभव क्षणिक होता है, जबकि सत्य का सामर्थ्य शाश्वत रहता है। भगवान श्रीराम की विजय इस विश्वास की प्रतिष्ठा करती है कि धर्म, मर्यादा और न्याय के मार्ग पर चलना ही जीवन की वास्तविक सफलता है।
यह महापर्व हमें केवल उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि अपने विचारों और आचरण में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है। रावण के पुतले का दहन तभी सार्थक होगा, जब हम अपने भीतर मौजूद अहंकार, छल और अन्याय जैसी प्रवृत्तियों को दूर करने का संकल्प भी लें।
सत्य के प्रति अटूट विश्वास, अन्याय के विरुद्ध साहस और समाज के प्रति जिम्मेदारी ही विजयादशमी की वास्तविक भावना है। यही संदेश भारतीय चेतना को नई ऊर्जा देता है और एक न्यायपूर्ण, संवेदनशील तथा मजबूत समाज के निर्माण की प्रेरणा प्रदान करता है।
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