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मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में करोड़ों रुपये की नजूल भूमि पर कथित कब्जे का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि छावनी क्षेत्र के लेखपाल अमर सिंह ने लाकड़ी फाजलपुर के लेखपाल पंकज हयांकी और सिविल लाइंस पुलिस की कथित मदद से मंडी बांस निवासी सर्राफ वंदना अग्रवाल को बेशकीमती जमीन पर कब्जा दिलाया। वंदना अग्रवाल, आलोक कुमार अग्रवाल की पत्नी हैं। आरोपों के अनुसार, नजूल भूमि को फ्री होल्ड बताकर उस पर कब्जा कराया गया और इसके बाद आनन-फानन में दीवार भी बनवा दी गई, ताकि जमीन पर कब्जा बना रहे। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
इस मामले में सबसे गंभीर सवाल सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और राजस्व विभाग की जिम्मेदारी को लेकर उठ रहे हैं। यदि संबंधित भूमि वास्तव में नजूल की है, तो उसके फ्री होल्ड होने, स्वामित्व हस्तांतरण और कब्जे की वैधता का निर्धारण सरकारी अभिलेखों के आधार पर ही किया जा सकता है। फिलहाल संबंधित जमीन का गाटा नंबर, क्षेत्रफल और फ्री होल्ड से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
दो लेखपालों की भूमिका पर उठे सवाल
सामने आए आरोपों के अनुसार, छावनी क्षेत्र के लेखपाल अमर सिंह और लाकड़ी फाजलपुर के लेखपाल पंकज हयांकी की कथित भूमिका इस प्रकरण में महत्वपूर्ण बताई जा रही है।आरोप है कि दोनों के सहयोग से करोड़ों रुपये मूल्य की नजूल भूमि पर एक निजी व्यक्ति को कब्जा दिलाने की प्रक्रिया पूरी कराई गई।
राजस्व विभाग में लेखपाल भूमि अभिलेखों, स्थलीय सत्यापन और राजस्व संबंधी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में किसी सरकारी जमीन के स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवाद सामने आने पर राजस्व रिकॉर्ड की जांच आवश्यक हो जाती है।
हालांकि, इस विशेष प्रकरण में दोनों लेखपालों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। उनके खिलाफ विभागीय जांच या कानूनी कार्रवाई शुरू होने की भी पुष्टि नहीं हुई है।
फ्री होल्ड के नाम पर कब्जा दिलाने का आरोप
मामले में यह आरोप भी लगाया गया है कि नजूल भूमि को फ्री होल्ड बताकर सर्राफ वंदना अग्रवाल को कब्जा दिलाया गया।नजूल भूमि आम तौर पर सरकार के स्वामित्व वाली ऐसी जमीन होती है, जो निर्धारित नियमों के अंतर्गत पट्टे या अन्य स्वीकृत व्यवस्था पर दी जा सकती है।किसी नजूल संपत्ति का फ्री होल्ड होना निर्धारित सरकारी प्रक्रिया, पात्रता और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति पर निर्भर करता है।केवल जमीन को फ्री होल्ड बताने से उस पर निजी स्वामित्व स्थापित नहीं हो जाता। इसके लिए संबंधित आदेश, अभिलेख और अन्य कानूनी दस्तावेज महत्वपूर्ण होते हैं।इस मामले में यह स्पष्ट होना बाकी है कि कथित कब्जे वाली जमीन के लिए किसी सक्षम अधिकारी ने फ्री होल्ड का आदेश जारी किया था या नहीं।
आनन-फानन में दीवार बनवाने का आरोप
आरोपों के अनुसार, जमीन पर कब्जा दिलाने के बाद वहां जल्दबाजी में दीवार भी बनवाई गई।दावा किया जा रहा है कि दीवार का निर्माण कब्जे को स्थायी रूप देने और जमीन पर दूसरे पक्ष की पहुंच रोकने के उद्देश्य से किया गया।हालांकि, दीवार कब बनवाई गई, निर्माण किसने कराया और इसके लिए संबंधित अधिकारियों से अनुमति ली गई थी या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हुई है।दीवार निर्माण की वैधता का निर्धारण जमीन के स्वामित्व, निर्माण की अनुमति और संबंधित राजस्व अभिलेखों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।
सिविल लाइंस पुलिस की भूमिका भी सवालों में
इस विवाद में सिविल लाइंस थाना पुलिस की कथित भूमिका का उल्लेख भी किया गया है। आरोप है कि कब्जा दिलाने के दौरान पुलिस का सहयोग लिया गया।हालांकि, पुलिस किस उद्देश्य से मौके पर पहुंची थी, क्या किसी प्रशासनिक अधिकारी ने पुलिस बल की मांग की थी और क्या जमीन से संबंधित कोई आदेश मौजूद था, इसका विवरण सामने नहीं आया है।किसी विवादित संपत्ति पर पुलिस की मौजूदगी मात्र से अवैध कब्जे में संलिप्तता साबित नहीं होती। इसके लिए संबंधित आदेशों और कार्रवाई की परिस्थितियों की जांच आवश्यक है।
मुरादाबाद में पहले भी सामने आए नजूल भूमि के मामले
मुरादाबाद में नजूल भूमि से जुड़े विवाद पहले भी सामने आ चुके हैं। सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, जिले में करीब एक हजार करोड़ रुपये मूल्य की 11 एकड़ नजूल भूमि के कथित अवैध विक्रय का मामला चर्चा में आया था।इस मामले में प्रशासन की ओर से नोटिस जारी किए जाने और विवाद अदालत तक पहुंचने की जानकारी सामने आई थी।इसी तरह सिविल लाइंस क्षेत्र सहित विभिन्न स्थानों की नजूल संपत्तियों को लेकर प्रशासन ने पहले भी कदम उठाए हैं। अक्टूबर 2025 में राजस्व ग्राम छावनी सहित विभिन्न क्षेत्रों की संपत्तियों की खरीद-बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की खबर सामने आई थी।
हालांकि, इन पूर्व मामलों का अमर सिंह, पंकज हयांकी और वंदना अग्रवाल से संबंधित वर्तमान आरोपों से कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है।राजस्व अभिलेखों की जांच से स्पष्ट होगी स्थितिकथित कब्जे से जुड़े मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज जमीन का राजस्व रिकॉर्ड होगा। इससे यह पता चल सकेगा कि संबंधित भूमि किसके नाम दर्ज है और उसके स्वामित्व की वास्तविक स्थिति क्या है।इसके अलावा जमीन का फ्री होल्ड आदेश, नामांतरण संबंधी दस्तावेज, स्थलीय सीमांकन और निर्माण से जुड़ी स्वीकृतियां भी महत्वपूर्ण होंगी।
यदि किसी भूमि को सरकारी अभिलेखों में नजूल दर्ज किया गया है, तो उसके निजी स्वामित्व में परिवर्तन की वैधानिक प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं, इसकी जांच आवश्यक है।कार्रवाई को लेकर आधिकारिक पुष्टि का इंतजारफिलहाल उपलब्ध जानकारी में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी, निलंबन या किसी जांच समिति के गठन की पुष्टि नहीं हुई है।इसी तरह वंदना अग्रवाल का पक्ष और सिविल लाइंस पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया भी उपलब्ध नहीं है।
ऐसे में इस प्रकरण से जुड़े आरोपों को अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा। राजस्व विभाग और जिला प्रशासन की आधिकारिक जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि कब्जे और दीवार निर्माण की प्रक्रिया कानूनी थी या उसमें कोई अनियमितता हुई।
करोड़ों रुपये की बताई जा रही जमीन के कथित कब्जे का यह मामला सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा और राजस्व प्रशासन की जवाबदेही से जुड़ा है। अब जमीन के वास्तविक स्वामित्व, कथित फ्री होल्ड प्रक्रिया और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का सत्यापन महत्वपूर्ण होगा।
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