Patna: बिहार संग्रहालय में टिकुली कला पर संवाद कार्यक्रम

Bihar: पटना स्थित बिहार संग्रहालय में रविवार को ‘संवाद: टिकुली कला – कलाकारों की नजर में’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में प्रदेश के कई प्रमुख कलाकारों ने भाग लिया और पारंपरिक टिकुली कला की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन संग्रहालय के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने किया।
इस अवसर पर पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास, राज्य पुरस्कार प्राप्त कलाकार शबीना इमाम, संतोष कुमार, टिकुली कलाकार रुचि कुमारी और मनीषा कुमारी सहित कई कलाकारों ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि टिकुली कला बिहार की एक प्राचीन लोक कला है, जिसकी शुरुआत लगभग 800 वर्ष पूर्व मानी जाती है। ‘टिकुली’ शब्द संस्कृत के ‘टिका’ से लिया गया है, जिसका अर्थ माथे पर सजने वाली बिंदी से है। शुरुआती दौर में यह कला कांच के टुकड़ों पर सोने की पॉलिश और बारीक चित्रकारी के रूप में विकसित हुई थी, जिसे मुख्य रूप से महिलाओं के श्रृंगार के लिए उपयोग किया जाता था। समय के साथ इसमें बदलाव आया और अब कांच तथा सोने की जगह लकड़ी, हार्डबोर्ड और एनामेल रंगों का उपयोग होने लगा है।
आज टिकुली कला केवल पारंपरिक बिंदी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका उपयोग ट्रे, कोस्टर, दीवार सजावट, ज्वेलरी बॉक्स, कपड़े और अन्य सजावटी वस्तुओं में भी किया जा रहा है। कलाकारों ने बताया कि यह कला अब आधुनिक डिजाइन और बाजार की जरूरतों के अनुसार नया रूप ले रही है।
पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने 1970 के दशक में उपेंद्र महारथी संस्थान में टिकुली पेंटिंग के माध्यम से कार्य शुरू किया था। बाद में उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई अवसर मिले। उन्होंने बताया कि 1982 के एशियन गेम्स के दौरान हजारों खिलाड़ियों को टिकुली पेंटिंग भेंट की गई थी। कलाकार रुचि कुमारी ने बताया कि अब टिकुली कला को कपड़ों पर भी उकेरा जा रहा है। भागलपुरी तस्सर सिल्क साड़ी और धोती-गमछा पर टिकुली आर्ट के प्रयोग से इसे नई पहचान मिल रही है।
कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि टिकुली कला अब पारंपरिक स्वरूप से आगे बढ़कर आधुनिक फैशन और हस्तशिल्प उद्योग में अपनी जगह बना रही है और इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है।





