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लाइफ स्टाइल
जहरीली हवा से फेफड़े ही नहीं, दिल-दिमाग को भी खतरा
Rajeshwari Nishad
27 Oct 2026 6:09 PM IST

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Air Pollution Health Risks: सर्दियों की शुरुआत और बदलते मौसम के साथ देश के कई शहरों में वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ने लगती है। हवा में मौजूद धूल, धुआं और जहरीले कण लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। आमतौर पर लोग मानते हैं कि प्रदूषण से केवल फेफड़े प्रभावित होते हैं और इससे खांसी, सांस लेने में परेशानी तथा अस्थमा जैसी समस्याएं होती हैं। लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा का असर केवल श्वसन तंत्र तक सीमित नहीं है। यह दिल, दिमाग, रक्त वाहिकाओं और तंत्रिका तंत्र को भी नुकसान पहुंचा सकती है। लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से हार्ट अटैक, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप और याददाश्त से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी वायु प्रदूषण को दुनिया के प्रमुख पर्यावरणीय स्वास्थ्य खतरों में शामिल किया है।
प्रदूषित हवा शरीर के अंदर कैसे पहुंचाती है नुकसान?
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा में कई प्रकार के हानिकारक कण और गैसें मौजूद होती हैं। इनमें पीएम2.5, पीएम10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और कार्बन मोनोऑक्साइड प्रमुख हैं।इनमें पीएम2.5 के कण बेहद छोटे होते हैं। इनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है।जब कोई व्यक्ति प्रदूषित हवा में सांस लेता है, तो ये सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं। कुछ कण रक्त प्रवाह में भी प्रवेश कर सकते हैं।इससे शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और रक्त वाहिकाओं की कार्यप्रणाली में बदलाव जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।इसी वजह से प्रदूषण का प्रभाव फेफड़ों के अलावा दूसरे महत्वपूर्ण अंगों पर भी दिखाई दे सकता है।
दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है प्रदूषण
वायु प्रदूषण का सबसे गंभीर प्रभाव हृदय और रक्त संचार प्रणाली पर पड़ सकता है।अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से दिल का दौरा, स्ट्रोक, अनियमित धड़कन और हार्ट फेलियर का खतरा बढ़ सकता है।विशेष रूप से ऐसे लोगों में खतरा अधिक होता है, जिन्हें पहले से दिल की बीमारी, उच्च रक्तचाप या डायबिटीज है।लंबे समय तक पीएम2.5 के संपर्क में रहने से धमनियों में प्लाक जमा होने और उनके संकुचित होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।इससे हृदय तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ती है।
दिमाग और याददाश्त पर भी पड़ सकता है असर
वायु प्रदूषण को लेकर हुए शोधों में मस्तिष्क के स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी सामने आई हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से शरीर में होने वाली सूजन और रक्त वाहिकाओं में बदलाव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।कुछ अध्ययनों में वायु प्रदूषण के अधिक संपर्क और याददाश्त कमजोर होने, संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट तथा डिमेंशिया के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध पाया गया है।विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2026 के दिशानिर्देशों में भी वायु प्रदूषण के संपर्क को कम करने को मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना गया है।हालांकि, डिमेंशिया का संबंध उम्र, आनुवंशिक कारणों, स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों और जीवनशैली जैसे कई कारकों से होता है। इसलिए किसी एक व्यक्ति में केवल प्रदूषण को इसका कारण नहीं माना जा सकता।
नसों और रक्त वाहिकाओं को कैसे प्रभावित करती है जहरीली हवा?
वायु प्रदूषण के कारण शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ सकती है।इसका असर रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत यानी एंडोथीलियम पर पड़ सकता है। यह परत रक्त संचार और रक्त वाहिकाओं के सामान्य कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।जब यह परत प्रभावित होती है, तो रक्त वाहिकाओं की कार्यक्षमता कमजोर पड़ सकती है।कुछ परिस्थितियों में रक्त का थक्का बनने का खतरा भी बढ़ सकता है।इसके अलावा प्रदूषण शरीर के ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर सकता है, जो दिल की धड़कन और शरीर की कई स्वचालित प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।इस प्रकार प्रदूषण का असर रक्त संचार और तंत्रिका तंत्र की कार्यप्रणाली दोनों पर हो सकता है।
स्ट्रोक का खतरा क्यों बढ़ जाता है?
स्ट्रोक ऐसी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है या मस्तिष्क की रक्त वाहिका फट जाती है।वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से रक्त वाहिकाओं में सूजन, रक्तचाप में बदलाव और खून के थक्के बनने जैसी प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।ये परिवर्तन कुछ लोगों में स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकते हैं।अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के अनुसार, पीएम2.5 के अल्पकालिक और दीर्घकालिक संपर्क का संबंध हृदय तथा मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं से जुड़ी गंभीर बीमारियों से पाया गया है।विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च रक्तचाप और हृदय रोग से पीड़ित लोगों को खराब वायु गुणवत्ता वाले दिनों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा खतरा
वायु प्रदूषण का प्रभाव हर उम्र के लोगों पर पड़ सकता है, लेकिन कुछ समूह अधिक संवेदनशील होते हैं।बच्चों के फेफड़े और अन्य अंग विकसित हो रहे होते हैं। इसलिए प्रदूषित हवा उनके स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव डाल सकती है।इसी तरह बुजुर्गों में पहले से मौजूद हृदय और फेफड़ों की बीमारियां प्रदूषण के कारण बिगड़ सकती हैं।गर्भवती महिलाओं और अस्थमा, डायबिटीज या हृदय रोग से पीड़ित लोगों को भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।WHO के अनुसार, बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और पुरानी बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति प्रदूषण के दुष्प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।
प्रदूषण से बचने के लिए क्या करें?
खराब वायु गुणवत्ता के दौरान कुछ सावधानियां अपनाकर प्रदूषण के संपर्क को कम किया जा सकता है।
- घर से बाहर निकलने से पहले अपने शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) देखें।
- अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में बाहर व्यायाम और अनावश्यक गतिविधियां सीमित करें।
- जरूरत पड़ने पर अच्छी फिटिंग वाला N95 या समकक्ष मानक का मास्क पहनें।
- घर के अंदर धूम्रपान, कूड़ा जलाने और अधिक धुआं पैदा करने वाली गतिविधियों से बचें।
- उपयुक्त क्षमता वाले HEPA एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल घर के अंदर महीन कणों को कम करने में मदद कर सकता है।
- दिल, फेफड़ों या दूसरी पुरानी बीमारियों के मरीज अपनी दवाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित लेते रहें।
किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
डॉक्टरों के अनुसार, प्रदूषण वाले दिनों में लगातार खांसी, सांस फूलना या सीने में भारीपन जैसी शिकायतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।यदि अचानक सीने में तेज दर्द, गंभीर सांस की तकलीफ, बेहोशी या असामान्य धड़कन महसूस हो, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।इसी तरह अचानक चेहरे का एक तरफ झुकना, हाथ-पैर में कमजोरी या बोलने में परेशानी स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सेवा की मदद लेना जरूरी है।
केवल व्यक्तिगत सावधानी नहीं, स्वच्छ हवा भी जरूरी
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषण से बचाव के लिए मास्क और घर के अंदर हवा की गुणवत्ता सुधारना मददगार हो सकता है, लेकिन ये उपाय समस्या का पूरा समाधान नहीं हैं।वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले उत्सर्जन को कम करना, निर्माण स्थलों की धूल नियंत्रित करना, कचरा जलाने पर रोक लगाना और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना भी जरूरी है।
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