लाइफ स्टाइल

दाल-रोटी से पूरी नहीं होती Protein की जरूरत

Saba Naaz
1 July 2026 10:12 PM IST
दाल-रोटी से पूरी नहीं होती Protein की जरूरत
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लाइफ स्टाइल: हमारी रोजमर्रा की भारतीय थाली दाल, चावल, रोटी, सब्जी, अचार और रायता जैसी चीजों से भरी होती है, जो देखने में संतुलित और स्वादिष्ट लगती है, लेकिन पोषण के नजरिए से यह हमेशा डेली प्रोटीन टारगेट को पूरा नहीं कर पाती। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार एक वयस्क व्यक्ति को रोजाना लगभग 60 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होती है, लेकिन आम भारतीय आहार इस लक्ष्य से काफी पीछे रह जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारी थाली में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। रोटी, चावल, पोहा और आलू जैसी चीजें ऊर्जा तो देती हैं, लेकिन इनमें प्रोटीन बहुत कम होता है। आम तौर पर थाली का बड़ा हिस्सा इन्हीं चीजों से भर जाता है, जिससे प्रोटीन के लिए जगह सीमित रह जाती है।

दूसरी बड़ी समस्या यह है कि दाल और अनाज को लोग प्रोटीन का मुख्य स्रोत मान लेते हैं, जबकि यह पूरी तरह सही नहीं है। दालों में प्रोटीन होता है, लेकिन इसके साथ कार्बोहाइड्रेट भी अधिक होता है। अगर कोई सिर्फ दाल से 60 ग्राम प्रोटीन पूरा करने की कोशिश करे, तो उसे बहुत ज्यादा मात्रा में दाल खानी पड़ेगी, जो व्यावहारिक और पाचन के लिहाज से संभव नहीं है। इसके अलावा गेहूं और चावल से मिलने वाला प्रोटीन शरीर पूरी तरह से आसानी से नहीं सोख पाता, जिससे कुल प्रोटीन की उपलब्धता और कम हो जाती है।

भारत में बड़ी आबादी शाकाहारी है, और शाकाहारी आहार में ‘कम्पलीट प्रोटीन’ की कमी एक महत्वपूर्ण कारण है। अंडा, मछली, चिकन और मटन जैसे नॉन-वेज स्रोतों में सभी जरूरी अमीनो एसिड होते हैं, जिन्हें शरीर आसानी से उपयोग कर लेता है। वहीं शाकाहारी स्रोत जैसे दालें, अनाज और बीन्स को अगर सही अनुपात में न मिलाया जाए, तो शरीर को पूरा प्रोटीन नहीं मिल पाता। उदाहरण के तौर पर दाल-चावल या खिचड़ी जैसे संयोजन बेहतर माने जाते हैं, लेकिन फिर भी रोजाना जरूरत पूरा करने के लिए अतिरिक्त प्रोटीन स्रोतों की आवश्यकता रहती है।

खाना पकाने का पारंपरिक तरीका भी पोषण पर असर डालता है। भारतीय रसोई में मसालों को ज्यादा भूनना और दाल-सब्जियों को लंबे समय तक पकाना आम बात है। अधिक तापमान और बार-बार गर्म करने से भोजन में मौजूद कुछ पोषक तत्वों की गुणवत्ता कम हो सकती है, जिससे प्रोटीन की प्रभावशीलता पर भी असर पड़ता है।

इसके अलावा हमारी लाइफस्टाइल में स्नैक्स का चयन भी प्रोटीन की कमी को बढ़ाता है। शाम के समय समोसा, कचौरी, बिस्कुट और नमकीन जैसी चीजें ज्यादा खाई जाती हैं, जिनमें मैदा, तेल और चीनी की मात्रा अधिक होती है और प्रोटीन लगभग नहीं होता। अगर इनकी जगह मूंगफली, मखाना, भुना चना या उबले अंडे जैसे विकल्प अपनाए जाएं, तो प्रोटीन टारगेट पूरा करना आसान हो सकता है।

डेली प्रोटीन टारगेट को पूरा करने के लिए छोटे बदलाव जरूरी हैं। खाने में पनीर, टोफू, सोया चंक्स, दही और छाछ जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं। नॉन-वेज खाने वाले लोग अंडे और ग्रिल्ड चिकन को अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं। सत्तू जैसे पारंपरिक और सस्ते विकल्प भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं। अगर इन बदलावों को रोजमर्रा की थाली में शामिल किया जाए, तो 60 ग्राम प्रोटीन का लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है और शरीर की पोषण जरूरतें बेहतर तरीके से पूरी हो सकती हैं।

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