- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- सम्पादकीय
- /
- मानवाधिकारों का मसला
x
मानव इतिहास में 10 दिसंबर 1948 का दिन इसलिए दर्ज है कि इस दिन मानवाधिकारों की वह सार्वभौमिक घोषणा स्वीकार की गई थी जिसने मनुष्य को केवल एक जैविक प्राणी के रूप में नहीं, उसकी गरिमा, स्वतंत्रता और व्यक्तित्व की पूर्णता के साथ देखने का दृष्टिकोण प्रदान किया था। आज इस घोषणा को हुए 77 वर्ष बीत चुके हैं परंतु विडंबना है कि मानवाधिकारों की रक्षा का वादा अभी भी कागजों, सम्मेलनों और घोषणाओं से बाहर वास्तविक जीवन में परिलक्षित नहीं होता। दुनिया की बड़ी आबादी आज भी उन अधिकारों (जीवन, समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, भोजन, शिक्षा, अभिव्यक्ति, गरिमा और भय से मुक्त जीवन का अधिकार) की प्रतीक्षा में है, जिन्हें सार्वभौमिक कहा गया था। मानवाधिकारों की स्थापना का विचार द्वितीय विश्वयुद्ध की त्रासदी से उपजा था। उस युद्ध ने सभ्यता के चेहरे से मानवता का मुखौटा चीर दिया था। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना इसी संकल्प के साथ हुई थी कि ऐसी त्रासदियां दोबारा न हों। मानवाधिकार उसी संकल्प का दस्तावेज थे, एक ऐसी प्रतिज्ञा, जो मानव को राष्ट्रों की सत्ता, राजनीति और विचारधाराओं के बीच दबने से बचा सके, परंतु बीते सात दशकों ने यह दिखा दिया है कि घोषणा करना जितना आसान है, उसका संरक्षण उतना ही कठिन। आज स्थिति यह है कि मानवाधिकारों की बात करते समय भूख, गरीबी, युद्ध, कुपोषण, बाल मजदूरी, लैंगिक हिंसा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे अभी भी प्रासंगिक हैं, लेकिन इन पुरानी चुनौतियों के बीच एक नई और अदृश्य चुनौती उभर चुकी है कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्थात् आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई)। यह चुनौती इतनी गहरी और व्यापक है कि इसके प्रभाव न केवल आर्थिक ढांचे, शासन प्रणाली, नौकरी और नैतिकता के स्वरूप को बदल रहे हैं, बल्कि मानव अस्तित्व, स्वतंत्रता और निजता की परिभाषा तक को पुनर्गठित कर रहे हैं।
यही कारण है कि आज विश्व मानवाधिकार दिवस केवल अतीत की उपलब्धियों का स्मरण नहीं बल्कि भविष्य की संभावित विडंबनाओं के प्रति चेतावनी भी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दखल अब मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक होती जा रही है। निर्णय लेने की क्षमता, जो अब तक मानव विवेक के हाथ में थी, वह धीरे-धीरे मशीनों के एल्गोरिद्म के हवाले होने लगी है। न्यायपालिका से लेकर स्वास्थ्य, वित्त, शिक्षा, सुरक्षा, मीडिया और नौकरियों तक, एआई के आधार पर किए गए निर्णय मानवाधिकारों की अवधारणा को चुनौती देते दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि क्या एक एल्गोरिद्म यह तय कर सकता है कि कौन अपराधी है, किसे नौकरी मिलेगी, किस पर नजर रखी जाएगी, किसकी पहचान संदिग्ध है या कौनसा विचार मान्य है? और यदि मशीन ने गलत निर्णय दिया तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? मानवाधिकारों की घोषणा के समय दुनिया डिजिटल नहीं थी। तब यह प्रश्न अप्रासंगिक लगता था कि मनुष्य की निजता क्या मशीन की संपत्ति बन सकती है या क्या डिजिटल पहचान हमारी जैविक पहचान पर हावी हो सकती है? आज यह आशंका वास्तविकता है। विश्व का बड़ा हिस्सा आज स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डेटा आधारित प्रणालियों की गिरफ्त में है। हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक हमारा व्यवहार, हमारी पसंद, हमारी निजता, हमारी कमजोरी और हमारा भविष्य, सब डेटा की भाषा में किसी सर्वर पर संरक्षित हो चुका है। यह डेटा हमारी नई पहचान है और हमारा यह डिजिटल स्वरूप मानवाधिकारों की परिभाषा को एक नए मोड़ पर खड़ा कर चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सर्वाधिक खतरनाक पहलू यह है कि यह निष्पक्ष होने का दावा करती है, लेकिन डेटा और एल्गोरिद्म भी समाज की पूर्वाग्रहपूर्ण मानसिकता से मुक्त नहीं होते। यदि डेटा पक्षपाती है, तो एआई भी पक्षपात को ही वैज्ञानिक सत्य में बदल देता है। इस तरह यह तकनीक कभी-कभी दमनकारी सत्ता की सबसे शक्तिशाली सहयोगी में बदल सकती है।
योगेश कुमार गोयल
स्वतंत्र लेखक
Tagsजनता से रिश्ता न्यूज़जनता से रिश्ताआज की ताजा न्यूज़हिंन्दी न्यूज़भारत न्यूज़खबरों का सिलसिलाआज की ब्रेंकिग न्यूज़आज की बड़ी खबरमिड डे अख़बारJanta Se Rishta NewsJanta Se RishtaToday's Latest NewsHindi NewsIndia NewsKhabron Ka SilsilaToday's Breaking NewsToday's Big NewsMid Day Newspaperजनताjantasamachar newssamacharहिंन्दी समाचारमानवाधिकारोंRights
Next Story





