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PoK के निवासियों के अधिकार क्या हैं? भारत का कानून क्या कहता है

Ratna Netam
4 Aug 2026 9:14 PM IST
PoK के निवासियों के अधिकार क्या हैं? भारत का कानून क्या कहता है
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दिल्ली : पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) को लेकर भारत का रुख शुरू से ही स्पष्ट और अडिग रहा है। भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि जम्मू-कश्मीर का पूरा क्षेत्र, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला हिस्सा भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में समय-समय पर यह सवाल उठता है कि आखिर PoK में रहने वाले लोगों की नागरिकता क्या है? क्या उन्हें भारतीय नागरिक माना जाता है या नहीं? इस मुद्दे पर भारतीय संविधान, नागरिकता कानून और सरकार की आधिकारिक नीति स्पष्ट दिशा प्रदान करते हैं।
भारत की संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था के अनुसार, पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में रहने वाले लोग भारत के नागरिक माने जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह 1947 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत के साथ किए गए विलय (Instrument of Accession) को माना जाता है। इस दस्तावेज के आधार पर भारत पूरे जम्मू-कश्मीर, जिसमें PoK भी शामिल है, पर अपना वैधानिक अधिकार जताता है। भारत ने कभी भी PoK को पाकिस्तान का हिस्सा स्वीकार नहीं किया है और उसे आज भी अवैध कब्जे वाला भारतीय क्षेत्र मानता है।
हालांकि, नागरिकता की यह कानूनी मान्यता और उसके व्यावहारिक उपयोग में बड़ा अंतर है। वर्तमान में जो लोग PoK में पाकिस्तान के प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्र में रह रहे हैं, वे भारतीय कानून के अनुसार नागरिक माने जाते हैं, लेकिन भारतीय प्रशासन की पहुंच उस क्षेत्र तक नहीं होने के कारण वे भारतीय नागरिकों को मिलने वाले अधिकारों का वास्तविक लाभ नहीं उठा पाते। उन्हें भारतीय पासपोर्ट, मतदान का अधिकार, सरकारी योजनाओं या अन्य संवैधानिक सुविधाओं का लाभ तब तक नहीं मिल सकता, जब तक वे कानूनी रूप से भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में नहीं आ जाते।
भारतीय न्यायालय भी इस विषय पर कई बार अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं। विभिन्न उच्च न्यायालयों ने कहा है कि PoK से आने वाले लोगों को विदेशी नहीं माना जा सकता क्योंकि भारत की नजर में वह इलाका विदेशी क्षेत्र नहीं बल्कि भारत का हिस्सा है। इसलिए उन पर सामान्य विदेशी नागरिकों से जुड़े कानून उसी प्रकार लागू नहीं होते, जैसे किसी अन्य देश से आने वाले व्यक्ति पर होते हैं।
1947, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान बड़ी संख्या में परिवार पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से निकलकर जम्मू-कश्मीर के भारतीय हिस्से में आकर बस गए थे। इन लोगों को भारत ने विस्थापित नागरिक के रूप में स्वीकार किया। समय के साथ इन परिवारों और उनके वंशजों को भारतीय नागरिकों के समान अधिकार दिए गए। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद इन अधिकारों को और मजबूती मिली। अब ऐसे परिवारों को संपत्ति खरीदने, सरकारी नौकरियों में आवेदन करने, चुनाव में मतदान करने और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने का पूरा अधिकार प्राप्त है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों के लिए 24 सीटें आरक्षित रखी गई हैं। फिलहाल इन सीटों पर चुनाव नहीं होते क्योंकि संबंधित क्षेत्र भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं है, लेकिन इन सीटों का आरक्षण इस बात का प्रतीक है कि भारत आज भी PoK को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और वहां के लोगों के प्रतिनिधित्व के अधिकार को स्वीकार करता है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को लेकर भी कई बार भ्रम की स्थिति बनती है। हालांकि केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि CAA का प्रावधान PoK के निवासियों पर लागू नहीं होता। इसकी वजह यह है कि भारत उन्हें पहले से ही भारतीय नागरिक मानता है। इसलिए उन्हें नागरिकता पाने के लिए CAA के तहत आवेदन करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि कोई PoK निवासी कानूनी रूप से भारत आता है और अपनी पहचान तथा मूल निवास का प्रमाण प्रस्तुत करता है, तो उसे भारतीय नागरिकों की तरह आवश्यक दस्तावेज और अधिकार मिल सकते हैं।
हालांकि कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी मौजूद है। नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 9(1) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता स्वीकार कर लेता है या पाकिस्तान के प्रति औपचारिक निष्ठा की शपथ लेकर नियमित पाकिस्तानी पासपोर्ट प्राप्त करता है, तो भारतीय नागरिकता पर उसका दावा समाप्त माना जा सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को भारतीय नागरिक नहीं माना जाता।
कुल मिलाकर भारत की आधिकारिक नीति यह है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारतीय भूभाग है और वहां के निवासी भारतीय नागरिक हैं। हालांकि वास्तविक अधिकारों का लाभ तभी संभव है जब वे भारतीय प्रशासनिक क्षेत्र में आकर आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करें। यही कारण है कि PoK का मुद्दा केवल सीमा विवाद नहीं, बल्कि नागरिकता, संवैधानिक अधिकारों और राष्ट्रीय नीति से भी जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।
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