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गुजरात से निकला जल प्रबंधन मॉडल अब दुनिया के लिए बना सीख

Ratna Netam
7 Oct 2026 7:21 PM IST
गुजरात से निकला जल प्रबंधन मॉडल अब दुनिया के लिए बना सीख
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बेंगलुरु। भारत में जल प्रबंधन के पिछले 25 वर्षों के सफर को समझने वाली एक नई स्टडी बुधवार को IIM बैंगलोर में जारी की गई। **‘फ्रॉम गुजरात टू इंडिया: वॉटर लेसन्स फॉर द वर्ल्ड’** नाम की यह स्टडी वर्ष 2001 से 2026 के बीच गुजरात से शुरू हुए जल प्रबंधन सुधारों और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर उनके विस्तार का अध्ययन करती है। इसमें बताया गया है कि पानी की कमी और बार-बार सूखे का सामना करने वाले गुजरात ने बड़े बुनियादी ढांचे, भूजल पुनर्भरण, संरक्षण, संस्थागत सुधार और सामुदायिक भागीदारी को जोड़कर किस तरह अपनी जल नीति को बदला।
स्टडी को जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डैनियल डब्ल्यू स्मिथ, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के फेलो नितिन बस्सी और भारत सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के पूर्व सचिव परमेश्वरन अय्यर ने तैयार किया है। इसे जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी, CEEW और गेट्स फाउंडेशन से जुड़े सहयोग के साथ प्रकाशित किया गया है। स्टडी का फोकस इस बात पर है कि गुजरात में विकसित किए गए कई जल प्रबंधन मॉडल बाद में देशव्यापी कार्यक्रमों के लिए आधार बने।
अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2001 में गुजरात गंभीर जल संकट, कम बारिश और बार-बार पड़ने वाले सूखे जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। स्टडी में 2001 से 2014 के बीच की अवधि को जल शासन में प्रयोग और सुधार का महत्वपूर्ण दौर बताया गया है। इस दौरान नर्मदा आधारित जल वितरण व्यवस्था, जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, सिंचाई दक्षता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में जल सुधार सिर्फ बड़े बांधों या पाइपलाइन परियोजनाओं तक सीमित नहीं थे। अध्ययन में संस्थागत ढांचे को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। इसमें ग्रामीण पेयजल व्यवस्था में समुदायों को शामिल करने वाले मॉडल और स्थानीय स्तर पर पानी के प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था को प्रमुख तत्वों में गिना गया है। स्टडी यह रेखांकित करती है कि स्थायी जल प्रबंधन के लिए केवल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके संचालन, वित्तपोषण, रखरखाव और स्थानीय स्वामित्व की भी जरूरत होती है।
डैनियल डब्ल्यू स्मिथ ने गुजरात के अनुभवों से मिलने वाले वैश्विक सबक पर जोर दिया। उनके मुताबिक सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि सरकारों को पानी को प्राथमिकता देनी होगी। अध्ययन चार बड़े सिद्धांत सामने रखता है—जल क्षेत्र में मजबूत शासन से शुरुआत, जल स्रोत और सेवा वितरण को साथ लेकर चलना, समुदायों को स्वामित्व देना और बड़े पैमाने पर लक्ष्य तय कर उन्हें लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा वित्तीय संसाधन जुटाना।
स्टडी में गुजरात को उस प्रयोगशाला के रूप में देखा गया है जहां कई प्रशासनिक और सामुदायिक मॉडल विकसित हुए, जिन्हें वर्ष 2014 के बाद राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग जल योजनाओं में विस्तारित किया गया। रिपोर्ट में जल जीवन मिशन, जल शक्ति अभियान, नमामि गंगे, अटल भूजल योजना, ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ और AMRUT जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख किया गया है। इन योजनाओं के जरिए पेयजल पहुंच, नदी पुनर्जीवन, भूजल प्रबंधन, जल संरक्षण, माइक्रो इरिगेशन और शहरी जल सेवाओं को मजबूत करने की कोशिश की गई।
अध्ययन के लेखकों का तर्क है कि भारत का अनुभव उन देशों के लिए भी उपयोगी हो सकता है, जहां बड़ी ग्रामीण आबादी, तेजी से बढ़ते शहर, जलवायु परिवर्तन, असमान जल उपलब्धता और सीमित संसाधन जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। रिपोर्ट में खास तौर पर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भारत के अनुभवों को उपयोगी बताया गया है। इसके मुताबिक अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद शासन, वित्त, साझेदारी और लोगों की भागीदारी जैसे सिद्धांत व्यापक रूप से लागू किए जा सकते हैं।
स्टडी में सामुदायिक भागीदारी को जल प्रबंधन की सफलता का अहम हिस्सा बताया गया है। लेखकों का कहना है कि पानी की उपलब्धता तभी टिकाऊ बन सकती है जब स्थानीय स्तर पर समुदायों को योजना, संचालन और निगरानी में भूमिका मिले। भारत में पानी समितियों जैसे स्थानीय संस्थानों को इसी संदर्भ में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। गुजरात के अनुभवों में स्थानीय जरूरतों के आधार पर समाधान तैयार करने और प्रशासनिक स्तर पर नियमित समीक्षा को भी महत्व दिया गया।
रिपोर्ट में बड़े लक्ष्य तय करने और उन्हें लागू करने की क्षमता पर भी जोर दिया गया है। लेखकों का कहना है कि सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-6 को हासिल करने के लिए दुनिया को बड़े निवेश और मजबूत संस्थागत व्यवस्था की जरूरत होगी। उनके मुताबिक भारत के बड़े जल कार्यक्रम यह दिखाते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व, सार्वजनिक वित्त और प्रशासनिक क्षमता एक साथ काम करें तो व्यापक स्तर पर बदलाव संभव है।
स्टडी में भविष्य की चुनौतियों का भी जिक्र है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, पानी की बढ़ती मांग, भूजल पर दबाव और इस्तेमाल किए गए पानी के दोबारा उपयोग को आने वाले वर्षों के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया गया है। लेखकों का कहना है कि जल नीति का अगला चरण केवल नए स्रोत खोजने तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि पानी की दक्षता, पुनर्चक्रण और मौजूदा संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर भी केंद्रित होना होगा।
IIM बैंगलोर में इस स्टडी की प्रस्तुति के दौरान जल क्षेत्र से जुड़े नीति विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने भारत के अनुभवों को व्यापक संदर्भ में देखा। रिपोर्ट का केंद्रीय संदेश यह है कि पानी को केवल इंजीनियरिंग या सप्लाई की समस्या मानने के बजाय शासन, संस्थानों, वित्त, समुदाय और संसाधन प्रबंधन के संयुक्त विषय के रूप में देखना जरूरी है।
25 साल के इस सफर को समेटने वाली स्टडी गुजरात के शुरुआती जल सुधारों से लेकर राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं तक की कड़ी को समझने की कोशिश करती है। इसके लेखकों का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी सीख यही है कि जल सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक राजनीतिक प्राथमिकता, मजबूत संस्थागत व्यवस्था, पर्याप्त सार्वजनिक निवेश और लोगों की सक्रिय भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।
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