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कांडला। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के निदेशक डॉ. प्रसाद चाफेकर ने बुधवार को कहा कि कांडला फोरम में हुई चर्चाएं भारत की उस क्षमता को दुनिया के सामने रखने में मदद कर सकती हैं, जिसके तहत देश ग्रीन फ्यूल का कम लागत वाला वैश्विक सप्लायर बन सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मंच ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन फ्यूल और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े विचारों के आदान-प्रदान के लिए महत्वपूर्ण हैं।
कांडला फोरम में बोलते हुए डॉ. चाफेकर ने कहा कि कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों के बीच ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन फ्यूल से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों ने अपने विचार रखे और भारत में स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार से जुड़ी संभावनाओं पर बात की।
उन्होंने कहा कि फोरम के दौरान कांडला पोर्ट और भारत सरकार की ओर से शुरू किए गए मिशन को लेकर एक संक्षिप्त प्रेजेंटेशन भी दिया गया। इसके जरिए प्रतिभागियों को बंदरगाह आधारित ग्रीन एनर्जी पहलों, ग्रीन फ्यूल की संभावनाओं और सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी दी गई।
डॉ. चाफेकर ने कहा, “यहां प्रतिभागियों के बीच विचारों के आदान-प्रदान का बहुत अच्छा सत्र हुआ। कांडला पोर्ट और भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए मिशन पर एक छोटा सा प्रेजेंटेशन भी हुआ। यहां की कार्यवाही पर बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली है और इस तरह की बातचीत से दुनिया भर में ग्रीन फ्यूल के कम लागत वाले सप्लायर के तौर पर भारत की क्षमता को साबित करने में काफी मदद मिलेगी।”
उनके मुताबिक, भारत के पास ग्रीन हाइड्रोजन और दूसरे स्वच्छ ईंधनों के क्षेत्र में आगे बढ़ने की बड़ी संभावना है। इसके लिए सरकार, उद्योग, बंदरगाह क्षेत्र, निवेशकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच समन्वय जरूरी होगा। ऐसे मंच इसी समन्वय को मजबूत करने का अवसर देते हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य के स्वच्छ ईंधन विकल्पों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से तैयार किया जाता है और इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है जहां कार्बन उत्सर्जन को कम करना अपेक्षाकृत कठिन होता है। भारी उद्योग, परिवहन, शिपिंग और ऊर्जा भंडारण जैसे क्षेत्रों में इसके उपयोग की संभावनाओं पर लगातार चर्चा हो रही है।
कांडला जैसे बड़े बंदरगाहों की भूमिका भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बंदरगाह केवल माल ढुलाई के केंद्र नहीं होते, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, औद्योगिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से भी सीधे जुड़े होते हैं। ऐसे में यदि ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन फ्यूल का उत्पादन, भंडारण और निर्यात बंदरगाहों से जोड़ा जाता है तो भारत के लिए नए अवसर खुल सकते हैं।
फोरम में हुई चर्चा का एक प्रमुख पहलू भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ग्रीन फ्यूल सप्लायर के रूप में स्थापित करने की संभावना रही। डॉ. चाफेकर ने इस बात पर जोर दिया कि कम लागत पर उत्पादन भारत की बड़ी ताकत बन सकता है। यदि उत्पादन लागत को प्रतिस्पर्धी स्तर पर रखा जाता है, तो भारत घरेलू जरूरतों के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी मौजूदगी मजबूत कर सकता है।
ग्रीन फ्यूल के क्षेत्र में लागत बेहद महत्वपूर्ण है। पारंपरिक ईंधनों के मुकाबले ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य स्वच्छ ईंधनों को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए उनकी कीमत को व्यवहारिक और प्रतिस्पर्धी बनाना आवश्यक है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए तकनीक, बड़े पैमाने पर उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता और मजबूत बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी।
कांडला फोरम जैसी बैठकों में इन्हीं चुनौतियों और अवसरों को लेकर चर्चा की जा रही है। प्रतिभागियों के बीच तकनीकी, नीतिगत और कारोबारी पहलुओं पर विचार-विमर्श से भविष्य की रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।
भारत सरकार ने स्वच्छ ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन को ऊर्जा परिवर्तन की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया है। उद्देश्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ना है।
डॉ. चाफेकर ने कहा कि भारत की क्षमता को केवल घरेलू बाजार के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यदि ग्रीन फ्यूल उत्पादन से जुड़ा मजबूत इकोसिस्टम विकसित होता है तो देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कांडला पोर्ट से जुड़ी प्रस्तुति ने यह भी दिखाया कि बंदरगाह क्षेत्र इस परिवर्तन का अहम हिस्सा हो सकता है। भविष्य में ग्रीन शिपिंग, स्वच्छ समुद्री ईंधन और कम उत्सर्जन वाले लॉजिस्टिक्स नेटवर्क की मांग बढ़ने पर ऐसे बंदरगाहों की उपयोगिता और बढ़ सकती है।
फोरम में विचारों के आदान-प्रदान को लेकर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया का जिक्र करते हुए चाफेकर ने कहा कि इस तरह की चर्चाएं नीति और उद्योग के बीच बेहतर समझ बनाने में मदद करती हैं। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एक ही मंच पर लाकर व्यवहारिक समाधान तलाशने का अवसर मिलता है।
ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में भारत के लिए उत्पादन लागत, बुनियादी ढांचा, तकनीकी क्षमता और बाजार की मांग जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होंगे। इन सभी क्षेत्रों में संतुलित प्रगति होने पर भारत के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी स्थिति बनाना संभव हो सकता है।
कुल मिलाकर, कांडला फोरम में हुई चर्चा का केंद्र भारत की ग्रीन एनर्जी क्षमता, ग्रीन हाइड्रोजन और कम लागत वाले ग्रीन फ्यूल उत्पादन पर रहा। MNRE निदेशक डॉ. प्रसाद चाफेकर के मुताबिक, इस तरह के मंच भारत की क्षमता को दुनिया के सामने रखने में मदद करेंगे और देश को भविष्य में ग्रीन फ्यूल के प्रमुख और किफायती सप्लायर के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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