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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाहियों की लाइव स्ट्रीमिंग के व्यावसायिक दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। शुक्रवार, 9 अक्टूबर को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक कार्यवाहियों के वीडियो का निजी प्रचार, कमाई और गलत प्रस्तुतीकरण के लिए इस्तेमाल न्यायपालिका को नुकसान पहुंचा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बार और बेंच के साथ पूरी संस्था पर पड़ रहे असर का उल्लेख किया। अदालत ने चुनिंदा वीडियो क्लिप निकालकर प्रसारित करने और न्यायाधीशों की बातों को गलत संदर्भ में पेश करने से रोकने के लिए सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ अदालत की कार्यवाही के वीडियो के अनधिकृत इस्तेमाल से संबंधित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह मामला ‘हर्षिता ग्रोवर बनाम भारत संघ और अन्य’ से जुड़ा है। याचिका में न्यायिक कार्यवाहियों की रिकॉर्डिंग से बिना अनुमति अंश निकालने, उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित करने और उनसे आर्थिक लाभ लेने को नियंत्रित करने की मांग उठाई गई है। सुनवाई के दौरान सार्वजनिक जानकारी तक पहुंच और रिकॉर्डिंग के दुरुपयोग को रोकने, दोनों पहलुओं पर चर्चा हुई।
पीठ ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य लाइव स्ट्रीमिंग बंद करना या किसी की आवाज दबाना नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत की कार्यवाही का प्रसारण जनता को सुनवाई देखने, उसे समझने और न्यायिक प्रक्रिया के बारे में जानकारी हासिल करने का अवसर देने के लिए होता है। इस व्यवस्था को व्यावसायिक हितों का साधन बनाना उसके मूल उद्देश्य के विपरीत है। अदालत की चिंता उन गतिविधियों को लेकर है, जिनमें सार्वजनिक जानकारी के लिए उपलब्ध कराई गई रिकॉर्डिंग का उपयोग निजी लाभ या भ्रामक प्रस्तुतीकरण के लिए किया जाता है।
सुनवाई में अधिवक्ता मैथ्यूज नेडुम्पारा ने लोगों के अदालत में होने वाली कार्यवाही के बारे में जानने के अधिकार का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि लोगों की राय दबाई नहीं जा सकती। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने दोहराया कि लाइव स्ट्रीमिंग पर प्रतिबंध लगाने का प्रश्न नहीं है। विचार इस बात पर किया जा रहा है कि रिकॉर्डिंग निकालकर विज्ञापन, निजी प्रचार और कमाई के लिए इस्तेमाल करने को कैसे रोका जाए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी उन यूट्यूब चैनलों का उल्लेख किया, जो अदालती कार्यवाही के वीडियो अपलोड कर रहे हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने चुनिंदा हिस्से प्रसारित करने से अधूरी तस्वीर सामने आने का मुद्दा उठाया। उन्होंने उदाहरण दिया कि तीस मिनट की सुनवाई में से केवल चार मिनट का वीडियो अपलोड किया जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसी कार्यवाही को दोबारा दिखाया जाए तो पूरी सुनवाई दिखाई जाए। इसके साथ उन्होंने वीडियो में शीर्षक या विवरण जोड़ने पर रोक का सुझाव भी रखा। ये सुझाव सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किए गए थे; इन्हें अदालत की ओर से लागू नया नियम या अंतिम निर्देश नहीं माना जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति बागची ने वकीलों द्वारा पेशेवर लाभ के लिए प्रचार करने से जुड़े प्रतिबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने चिंता जताई कि कार्यवाहियों के अंश निजी प्रोफाइल पर अपलोड करके पेशेवर फायदा हासिल करने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। उन्होंने लाइव स्ट्रीमिंग से जुड़े डेटा को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त भंडारण व्यवस्था तैयार करने की प्रक्रिया का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, सुरक्षित सामग्री उचित व्यवस्थाओं के जरिए उपलब्ध कराई जा सकती है। तकनीकी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि वीडियो निकालने पर प्रतिबंध होने के बावजूद स्क्रीन रिकॉर्डिंग से सामग्री हासिल करना संभव रहता है।
इस मुद्दे पर आगे विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से हाई कोर्ट और अन्य संबंधित पक्षों के सुझाव जुटाने को कहा है। पक्षकारों तथा दूसरे हितधारकों से मिले सुझाव उनके कार्यालय को भेजे जाने हैं। अदालत ने अब तक प्राप्त सुझावों पर विचार करके तैयार प्रस्ताव के साथ जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय दिया। इस तरह आगे की व्यवस्था तय करने से पहले संबंधित पक्षों की राय और तकनीकी पहलुओं को एक साथ देखने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
मामले में इससे पहले भी अंतरिम निर्देश जारी किए जा चुके हैं। 24 जुलाई के आदेश के तहत अदालती कार्यवाहियों की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग को सुप्रीम कोर्ट या संबंधित हाई कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना सोशल मीडिया तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पोस्ट, दोबारा पोस्ट, अपलोड या साझा करने पर प्रतिबंध लगाया गया था। यह व्यवस्था अगले आदेश तक लागू रहने की बात कही गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि सुनवाई के वीडियो संपादित करके और संदर्भ से अलग करके व्यापक रूप से प्रसारित किए जा रहे हैं, जिससे न्यायिक कार्यवाही का स्वरूप विकृत होता है।
अदालत ने निष्पक्ष और सटीक समाचार रिपोर्टिंग को लेकर स्थिति भी स्पष्ट रखी है। पहले के अंतरिम आदेश में कहा गया था कि न्यायिक कार्यवाहियों की सही रिपोर्टिंग प्रभावित नहीं होगी। सुनवाई की खबर देना जारी रह सकता है, जबकि ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत प्रसार पर लगाई गई पाबंदियां अलग से लागू रहेंगी। शुक्रवार की सुनवाई में भी सार्वजनिक पहुंच बनाए रखने के साथ दुरुपयोग रोकने की जरूरत पर जोर रहा। फिलहाल अदालत ने सुझावों पर आधारित प्रस्ताव मांगा है और मामले में आगे विचार जारी है।
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