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प्रदर्शन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्रदर्शन से जुड़ी FIR रद्द
Rajeshwari Nishad
22 Oct 2026 8:50 PM IST

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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों के अधिकारों और उनकी आपराधिक जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी प्रदर्शन में केवल मौजूद रहने से यह साबित नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति का इरादा पुलिस के वैध आदेशों की अवहेलना करने या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने का था। न्यायमूर्ति संजीव नरूला की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध में शामिल होने या अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ मिलकर अपराध करने की साझा मंशा का ठोस आधार होना जरूरी है। केवल प्रदर्शन स्थल पर मौजूदगी के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की परीक्षा से जुड़े प्रदर्शन में शामिल एक अभ्यर्थी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे संबंधित कार्यवाही रद्द कर दी।
एसएससी परीक्षा के विरोध प्रदर्शन से जुड़ा मामला
यह मामला 24 अगस्त 2025 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित विरोध प्रदर्शन से संबंधित है। कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रदर्शन करने पहुंचे थे।
दिल्ली पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन स्थल पर लगभग 800 से 1,000 लोग मौजूद थे। प्रशासन ने प्रदर्शन के लिए सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक की अनुमति दी थी।
पुलिस का आरोप था कि निर्धारित समय समाप्त होने के बावजूद कई प्रदर्शनकारी मैदान में मौजूद रहे। उन्हें बार-बार स्थान खाली करने के निर्देश दिए गए, लेकिन कुछ लोग वहां से नहीं हटे।
पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की थी। इस मामले में कुल 44 लोगों को हिरासत में लिया गया था।
प्रतियोगी छात्र खुर्शीद अहमद ने दी थी चुनौती
इस मामले में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे खुर्शीद अहमद ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अहमद का कहना था कि वह एसएससी परीक्षाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर प्रदर्शन में शामिल हुआ था। वह न तो प्रदर्शन का आयोजक था और न ही किसी मंच से लोगों को संबोधित कर रहा था।
उसने अदालत में दलील दी कि उसके खिलाफ पुलिस के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना करने, पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई करने या हिंसा में शामिल होने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं है।
अहमद ने यह भी बताया कि उसने एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय की भर्ती परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और उसे दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया में हिस्सा लेना था।
पुलिस ने दर्ज किया था आपराधिक मामला
दिल्ली पुलिस ने कमला मार्केट थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 223(ए) और धारा 3(5) के तहत मामला दर्ज किया था।
धारा 223(ए) लोक सेवक द्वारा कानूनी रूप से जारी आदेश की अवहेलना से संबंधित है। वहीं धारा 3(5) साझा आपराधिक मंशा के आधार पर संयुक्त जिम्मेदारी से जुड़ी है।
पुलिस का कहना था कि प्रदर्शनकारियों को कई बार घोषणाओं के माध्यम से मैदान खाली करने के निर्देश दिए गए थे।
इसके बावजूद कुछ लोग प्रदर्शन स्थल पर डटे रहे। पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत जारी प्रतिबंधात्मक आदेशों के उल्लंघन का भी उल्लेख किया।
मामले में 29 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जाने की जानकारी अदालत को दी गई थी, जबकि अन्य के संबंध में जांच जारी थी।
केवल प्रदर्शन में मौजूदगी अपराध का आधार नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के लिए उसके आचरण और कथित अपराध के बीच संबंध स्थापित होना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि किसी प्रदर्शन में भाग लेना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति पुलिस के निर्देशों की अवहेलना करने की साझा मंशा रखता था।
पीठ ने पाया कि एफआईआर और पुलिस की स्थिति रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी विशेष हिंसक गतिविधि, उकसावे या पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई का स्पष्ट आरोप नहीं था।
अदालत के अनुसार, केवल भीड़ में मौजूद होने से किसी व्यक्ति को अन्य लोगों के कथित आपराधिक कृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
आदेश की अवहेलना साबित करने के लिए जरूरी हैं शर्तें
हाई कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 223(ए) के कानूनी प्रावधानों की भी समीक्षा की।
अदालत ने कहा कि इस धारा के तहत अपराध स्थापित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति को वैध आदेश की जानकारी थी और उसकी अवहेलना से कानून में बताए गए परिणाम उत्पन्न हुए या होने की आशंका थी।
पीठ ने माना कि बार-बार की गई घोषणाएं किसी व्यक्ति को आदेश की जानकारी होने का संकेत हो सकती हैं।
हालांकि, अदालत के सामने मौजूद सामग्री से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि अहमद की प्रदर्शन स्थल पर मौजूदगी के कारण कानून में निर्धारित आवश्यक परिणाम किस तरह उत्पन्न हुए थे।
इसलिए केवल निर्धारित समय के बाद मैदान में मौजूद रहने को संबंधित परिस्थितियों में अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।
साझा मंशा को लेकर अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाई कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 3(5) की व्याख्या करते हुए कहा कि साझा मंशा का सिद्धांत तभी लागू होता है, जब आपराधिक कृत्य संबंधित व्यक्तियों के साझा इरादे को आगे बढ़ाने के लिए किया गया हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि एक ही प्रदर्शन में शामिल होने वाले सभी व्यक्तियों की मंशा समान मान लेना कानूनन उचित नहीं है।
यदि कुछ प्रदर्शनकारी हिंसा करते हैं या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालते हैं, तो केवल उसी भीड़ में मौजूद होने के कारण हर व्यक्ति को उस अपराध में शामिल नहीं माना जा सकता।
इसके लिए संबंधित व्यक्ति की भूमिका और साझा मंशा दर्शाने वाली सामग्री आवश्यक है।
जांच में सहयोग करने का भी लिया संज्ञान
अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि खुर्शीद अहमद ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 के तहत जारी नोटिस के बाद जांच में सहयोग किया था।
दिल्ली पुलिस ने भी ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया था कि अहमद ने जांच में सहयोग करने से इनकार किया या जांच प्रक्रिया में बाधा पहुंचाई।
पीठ ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं होगा।
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल मामले में स्थापित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। इनके अनुसार, यदि आरोपों से किसी अपराध के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया सामने नहीं आते, तो उपयुक्त परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है।
हाई कोर्ट ने एफआईआर और कार्यवाही की रद्द
न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने 13 अक्टूबर 2026 को आदेश पारित करते हुए खुर्शीद अहमद की याचिका स्वीकार कर ली।
अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने का निर्देश दिया।
हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल खुर्शीद अहमद की व्यक्तिगत भूमिका से संबंधित है।
इस फैसले का मामले में नामजद अन्य आरोपियों के खिलाफ जारी जांच या कानूनी कार्यवाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
विरोध प्रदर्शन और कानूनी जिम्मेदारी पर अहम फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी के महत्व को रेखांकित करता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने और किसी आपराधिक गतिविधि में भाग लेने के बीच कानूनी अंतर है।
इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रदर्शन के दौरान कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को कार्रवाई से छूट मिल जाएगी। बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों का अलग-अलग मूल्यांकन करना जरूरी है।
यह फैसला पुलिस की वैध कार्रवाई के अधिकार और नागरिकों को बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक कार्यवाही का सामना करने से बचाने के बीच संतुलन की आवश्यकता को सामने लाता है।
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