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नोबेल शांति पुरस्कार 2026 पाने वाली नावी पिल्लई कौन हैं जानें ,
Ashish verma
9 Oct 2026 3:25 PM IST

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नोबेल शांति पुरस्कार 2026 : भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवनथेम ‘नावी’ पिल्लई को वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर को उनके नाम का ऐलान किया। 85 वर्षीय पिल्लई को शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के प्रयासों के लिए सम्मानित किया गया है। उनका करियर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ कानूनी संघर्ष से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय अदालतों और संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा। समिति ने गंभीर अपराधों के लिए जवाबदेही तय करने में उनके योगदान को पुरस्कार का महत्वपूर्ण आधार बताया है।
नावी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। वह भारतीय तमिल मूल के परिवार से आती हैं। उनके परिवार की आर्थिक परिस्थितियां साधारण थीं। पिता बस चालक थे और मां घर की जिम्मेदारियां संभालती थीं। उनका बचपन ऐसे समाज में बीता, जहां नस्ल के आधार पर अवसर और अधिकार अलग-अलग थे। परिवार ने बेटियों की शिक्षा को महत्व दिया। आगे चलकर पिल्लई ने कानून की पढ़ाई की और अपने पेशेवर जीवन में भेदभाव तथा मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ काम किया।
उनके भारतीय संबंध की चर्चा पुरस्कार की घोषणा के बाद विशेष रूप से हो रही है। उपलब्ध जीवन-वृत्त के अनुसार, उनके दादा-दादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे। वे नटाल के गन्ना बागानों में काम करने वाले अनुबंधित श्रमिकों में शामिल थे। परिवार के प्रवास को ठीक ‘136 साल पहले’ बताने के लिए 1890 का निश्चित वर्ष आवश्यक है, जबकि उपलब्ध विवरण 1890 के दशक का उल्लेख करते हैं। इसलिए उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को एक सदी से भी पहले दक्षिण अफ्रीका पहुंचे भारतीय श्रमिक परिवार से जोड़ना अधिक सटीक है।
पिल्लई ने दक्षिण अफ्रीका की नटाल यूनिवर्सिटी से कला और कानून की डिग्रियां हासिल कीं। बाद में अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से कानून में उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने मास्टर ऑफ लॉ और डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की उपाधियां अर्जित कीं। वर्ष 1967 में उन्होंने नटाल प्रांत में अपनी कानूनी प्रैक्टिस शुरू की और ऐसा करने वाली पहली महिला बनीं। उनके लिए वकालत केवल पेशा नहीं रही; उन्होंने राजनीतिक बंदियों और रंगभेद का विरोध करने वालों के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मुकदमे भी लड़े।
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में पिल्लई ने उन लोगों का बचाव किया, जो भेदभावपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। उनके काम में हिरासत में यातना, एकांत कारावास और राजनीतिक कैदियों को उचित कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध कराने जैसे मुद्दे शामिल रहे। उन्होंने रॉबेन आइलैंड के बंदियों के अधिकार स्थापित करने में भी योगदान दिया। रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं की पैरवी के कारण उन्हें वर्षों तक पासपोर्ट नहीं दिया गया। उनके शुरुआती मुकदमों ने आगे के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कार्य के लिए आधार तैयार किया।
वर्ष 1995 उनके न्यायिक करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव बना। रंगभेद समाप्त होने के बाद उन्हें दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में कार्यवाहक न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उन्हें रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीश चुना। इस न्यायाधिकरण का संबंध रवांडा में हुए नरसंहार और उससे जुड़े गंभीर अपराधों की सुनवाई से था। पिल्लई ने वहां आठ वर्ष सेवा दी। वर्ष 1999 से 2003 तक वह इसकी अध्यक्ष रहीं और न्यायाधिकरण के शुरुआती चार वर्षों में उसकी एकमात्र महिला न्यायाधीश थीं।
रवांडा न्यायाधिकरण में उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय कानून की महत्वपूर्ण उपलब्धियों से जोड़ा जाता है। उन्होंने उन न्यायिक सिद्धांतों के विकास में भूमिका निभाई, जिनमें परिस्थितियों के अनुसार बलात्कार को नरसंहार के कृत्य के रूप में मान्यता दी गई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नफरत फैलाने वाले प्रचार से संबंधित मामलों में भी उनका योगदान रहा। इन फैसलों ने संघर्षों के दौरान यौन हिंसा और हिंसा भड़काने वाली गतिविधियों की कानूनी जवाबदेही को मजबूत किया। महिलाओं और हिंसा से प्रभावित लोगों के अधिकार उनके काम के प्रमुख विषय रहे हैं।
वर्ष 2003 में पिल्लई अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की न्यायाधीश बनीं और अगस्त 2008 तक उसके अपील प्रभाग में काम किया। इसके बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त का पद संभाला। उनका कार्यकाल सितंबर 2008 से अगस्त 2014 तक रहा। इस भूमिका में उनका कार्यक्षेत्र किसी एक देश या मुकदमे तक सीमित नहीं था। वर्तमान में वह म्यांमार के खिलाफ नरसंहार संबंधी मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की तदर्थ न्यायाधीश के रूप में भी कार्यरत हैं। मृत्युदंड के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से भी उनका संबंध रहा है।
नोबेल समिति ने पुरस्कार की घोषणा में अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत और न्यायिक संस्थाओं पर बढ़ते दबाव का उल्लेख किया। समिति के अनुसार, बल या हिंसा के बिना संघर्षों के समाधान की क्षमता अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन पर निर्भर करती है। पिल्लई का चयन उनके लंबे कानूनी करियर और गंभीर मानवाधिकार अपराधों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयासों को मान्यता देता है। पुरस्कार समारोह 10 दिसंबर को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में आयोजित होना है। भारतीय श्रमिक परिवार की पृष्ठभूमि से अंतरराष्ट्रीय न्याय तक पहुंची पिल्लई की यात्रा अब नोबेल सम्मान से जुड़ गई है।
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