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एक परिवार के 7 लोग, 4 जातियां और MBBS कोटा , उठे गंभीर सवाल
Kanchan Paikara
7 Oct 2026 3:56 PM IST

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MBBS : उत्तराखंड में एमबीबीएस दाखिलों को लेकर फर्जी प्रमाण पत्रों का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। समाजसेवी और पत्रकार प्रदीप बहुगुणा ने आरोप लगाया है कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे समेत कई श्रेणियों में फर्जी दस्तावेजों के सहारे छात्रों ने मेडिकल कॉलेजों में सीटें हासिल कीं। मंगलवार को देहरादून प्रेस क्लब में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कई सवाल उठाए और दावा किया कि मामला कुछ छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेशभर में सैकड़ों दाखिले जांच के दायरे में आ सकते हैं।
बहुगुणा ने एक ही परिवार से जुड़े सात लोगों का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि इनमें चार अलग-अलग श्रेणियों के आधार पर एमबीबीएस सीटें आवंटित की गईं। उनके मुताबिक इनमें दो को ओबीसी स्वतंत्रता सेनानी, एक को एससी स्वतंत्रता सेनानी और एक को सामान्य स्वतंत्रता सेनानी श्रेणी में सीट मिली। उन्होंने सवाल उठाया कि एक ही परिवार के सदस्यों की अलग-अलग जाति श्रेणियां कैसे दर्ज हुईं और ऐसे दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। इन दावों की आधिकारिक जांच अभी जारी है।
करीब 350 से 370 छात्रों के दस्तावेजों पर सवाल
प्रदीप बहुगुणा इससे पहले भी चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को करीब 350 उम्मीदवारों की सूची सौंप चुके हैं और उनके स्थायी निवास, स्वतंत्रता सेनानी आश्रित तथा अन्य प्रमाण पत्रों की जांच की मांग कर चुके हैं। उन्होंने खुद भी स्पष्ट किया था कि वह सूची में शामिल सभी प्रमाण पत्रों को फर्जी नहीं बता रहे, लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रवेश से जुड़ी जानकारियों में ऐसी विसंगतियां हैं जिनकी विस्तृत जांच जरूरी है।
इसी मामले में उत्तराखंड सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं। देहरादून पुलिस की विशेष जांच टीम यानी SIT भी फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्रों के कथित इस्तेमाल की जांच कर रही है। शुरुआती स्तर पर कुछ प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाने के बाद पुलिस मामले दर्ज कर चुकी है और जांच का दायरा बढ़ाने की मांग भी उठ रही है।
फर्जी प्रमाण पत्र मिलने पर दाखिले रद्द
मेडिकल शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे की कुछ सीटों से जुड़े दस्तावेजों में संदेह सामने आया था। जिला प्रशासन से सत्यापन कराए जाने पर पांच प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए और उन्हें अमान्य घोषित किया गया। जिन उम्मीदवारों को इन दस्तावेजों के आधार पर सीट मिली थी, उनके दाखिले भी रद्द किए गए।
इस घटनाक्रम ने पूरे राज्य कोटे की प्रवेश प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तराखंड में राज्य कोटे की मेडिकल सीटों के लिए स्थायी निवास यानी डोमिसाइल प्रमाण पत्र महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। इसके बाद आरक्षण और उप-श्रेणियों के लाभ के लिए अलग-अलग प्रमाण पत्रों की जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि बहुगुणा ने जांच को केवल स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्रों तक सीमित न रखकर डोमिसाइल और अन्य श्रेणी के दस्तावेजों तक विस्तार देने की मांग की है।
एक ही PPO नंबर के इस्तेमाल का भी मामला
जांच के दौरान एक और गंभीर तथ्य सामने आया कि स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े एक ही PPO नंबर का इस्तेमाल कथित तौर पर कई उम्मीदवारों के लिए किया गया। ऐसी विसंगतियों के बाद प्रमाण पत्र जारी करने और सत्यापन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।
बहुगुणा का कहना है कि अगर प्रमाण पत्र की जांच संबंधित पोर्टल, राजस्व रिकॉर्ड और स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े सरकारी अभिलेखों से ठीक तरह की जाए तो कई गड़बड़ियां पकड़ी जा सकती हैं। उन्होंने अपने स्तर पर कुछ दस्तावेजों का मिलान किया था और इसके बाद शिकायत प्रशासन तक पहुंचाई थी।
जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी उठाए सवाल
प्रेस क्लब में बहुगुणा ने जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन नामों को उन्होंने संदिग्ध बताते हुए जांच के लिए दिया था, उनकी सूची आगे की जांच में पूरी तरह शामिल नहीं की गई। उनका दावा है कि अगर मूल सूची के आधार पर व्यापक सत्यापन होता तो और भी मामले सामने आ सकते थे। यह उनका आरोप है और इसकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि कुमाऊं मंडल स्तर पर कराई गई जांच में ऊधमसिंह नगर से कई संदिग्ध मामले सामने आए और कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं। हालांकि अलग-अलग जांचों और मामलों की संख्या को लेकर आधिकारिक एजेंसियों की पुष्टि को ही अंतिम माना जाएगा।
CSC सेंटर भी आए जांच के दायरे में
देहरादून प्रशासन ने दस्तावेज बनाने और ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया से जुड़े कुछ कॉमन सर्विस सेंटरों यानी CSC की भी जांच की। प्रशासन ने अनियमितताएं मिलने के बाद चार सेंटर सील किए और कंप्यूटर व लैपटॉप जब्त किए। हालांकि प्रशासन ने इस कार्रवाई को सीधे सभी एमबीबीएस दाखिला आरोपों से जोड़कर नहीं बताया है।
CSC संचालकों का कहना है कि उनका काम आमतौर पर आवेदन भरने और दस्तावेज पोर्टल पर अपलोड करने तक सीमित होता है। अंतिम प्रमाण पत्र संबंधित तहसील, राजस्व अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी की जांच और मंजूरी के बाद जारी किया जाता है। इस वजह से प्रमाण पत्रों की सत्यता तय करने में सरकारी सत्यापन व्यवस्था की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
राज्यभर के दाखिलों की जांच की मांग
इस पूरे मामले के बाद अब सवाल केवल कुछ फर्जी स्वतंत्रता सेनानी प्रमाण पत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। बहुगुणा ने डोमिसाइल, जाति और दूसरी आरक्षित श्रेणियों के प्रमाण पत्रों की भी जांच की मांग की है। कुछ रिपोर्टों में करीब 350 मौजूदा और पुराने मेडिकल छात्रों के दस्तावेजों के पुनः सत्यापन की बात सामने आई है।
मामले की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि मेडिकल सीटों पर दाखिले में फर्जी प्रमाण पत्र का इस्तेमाल केवल एक छात्र को गलत लाभ देने का मामला नहीं है। इससे किसी दूसरे पात्र उम्मीदवार का मौका भी छिन सकता है।
फिलहाल SIT और प्रशासनिक स्तर पर जांच जारी है। कई आरोपों की अभी स्वतंत्र पुष्टि बाकी है। इसलिए पूरे प्रकरण में यह जरूरी है कि जांच दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और प्रवेश प्रक्रिया के आधिकारिक डेटा के आधार पर पूरी हो। अगर फर्जीवाड़ा साबित होता है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ यह भी देखना होगा कि प्रमाण पत्र बनाने, सत्यापित करने और प्रवेश देने की प्रक्रिया में चूक कहां हुई। यही जांच इस विवाद की वास्तविक तस्वीर साफ करेगी।
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