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बेटा या बेटी, किसका कितना हक? जानिए संपत्ति बंटवारे का कानून

Ratna Netam
7 Aug 2026 3:51 PM IST
बेटा या बेटी, किसका कितना हक? जानिए संपत्ति बंटवारे का कानून
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नई दिल्ली : भारतीय समाज में लंबे समय से यह धारणा प्रचलित है कि परिवार के मुखिया या पिता की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति पर सबसे पहला और सबसे बड़ा अधिकार बड़े बेटे का होता है। कई परिवारों में इसी सोच के कारण संपत्ति को लेकर विवाद पैदा हो जाते हैं और मामला अदालत तक पहुंच जाता है। हालांकि, भारतीय कानून इस धारणा का समर्थन नहीं करता। संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े नियम स्पष्ट रूप से बताते हैं कि केवल बड़ा बेटा होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अतिरिक्त या विशेष अधिकार नहीं मिल जाता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी व्यक्ति की संपत्ति का बंटवारा कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर निर्भर करता है। सबसे पहले यह देखा जाता है कि संपत्ति पैतृक (Ancestral Property) है या स्वयं की कमाई से अर्जित (Self-acquired Property)। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि संपत्ति के मालिक ने अपने जीवनकाल में वैध वसीयत (Will) बनाई थी या नहीं। इन सभी परिस्थितियों के आधार पर तय होता है कि संपत्ति किसे और कितनी मिलेगी।
भारतीय परिवारों में बड़े बेटे को परिवार का वारिस मानने की परंपरा सामाजिक रूप से जरूर रही है, लेकिन कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो बड़े बेटे को पूरी संपत्ति का मालिक घोषित करता हो। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसकी संपत्ति संबंधित उत्तराधिकार कानून के अनुसार सभी कानूनी वारिसों में बराबर बांटी जाती है। ऐसे मामलों में बड़े बेटे को अन्य भाई-बहनों की तुलना में अतिरिक्त हिस्सा नहीं मिलता।
यदि किसी व्यक्ति ने अपनी मेहनत और आय से संपत्ति खरीदी है, तो उस संपत्ति पर उसका पूर्ण अधिकार होता है। वह अपनी इच्छा के अनुसार वसीयत बनाकर किसी भी व्यक्ति, संस्था या परिवार के सदस्य के नाम संपत्ति कर सकता है। ऐसी स्थिति में संपत्ति का वितरण वसीयत के अनुसार होगा। लेकिन यदि कोई वैध वसीयत नहीं है, तो उत्तराधिकार कानून लागू होगा और सभी वैधानिक वारिसों को उनके कानूनी अधिकार के अनुसार हिस्सा मिलेगा।
हिंदू परिवारों में संपत्ति के बंटवारे के लिए **हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956** लागू होता है। वर्ष 2005 में इस कानून में महत्वपूर्ण संशोधन किया गया, जिसके बाद बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार प्रदान किए गए। इस संशोधन ने बेटियों को भी जन्म से ही पैतृक संपत्ति में सह-अधिकार (Coparcener) का दर्जा दिया। इसका अर्थ है कि अब बेटियां भी पैतृक संपत्ति में उतनी ही अधिकार रखती हैं जितना बेटों का होता है।
इस बदलाव के बाद कानून ने स्पष्ट कर दिया कि संपत्ति के मामले में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो पत्नी, पुत्र और पुत्री सभी प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिस माने जाते हैं और उन्हें समान अधिकार प्राप्त होते हैं। ऐसे में बड़ा बेटा केवल उम्र में बड़ा होने के कारण अतिरिक्त हिस्से का दावा नहीं कर सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि संपत्ति विवादों की सबसे बड़ी वजह कानून की जानकारी का अभाव और पारंपरिक धारणाएं हैं। कई परिवार आज भी यह मानकर चलते हैं कि बड़े बेटे को प्राथमिक अधिकार है, जबकि अदालतें हमेशा कानून के आधार पर निर्णय देती हैं, न कि सामाजिक मान्यताओं के आधार पर।
संपत्ति के अधिकार को लेकर एक और सामान्य भ्रम यह है कि भारत में यह मौलिक अधिकार है। वास्तव में वर्ष 1978 में हुए **44वें संविधान संशोधन** के बाद संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहा। हालांकि, भारतीय संविधान के **अनुच्छेद 300A** के तहत संपत्ति का अधिकार अब भी एक कानूनी अधिकार के रूप में सुरक्षित है। इसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि कोई व्यक्ति भविष्य में पारिवारिक विवाद से बचना चाहता है, तो उसे अपनी संपत्ति के संबंध में स्पष्ट और वैध वसीयत तैयार करनी चाहिए। इससे उत्तराधिकार को लेकर भ्रम की स्थिति नहीं बनती और परिवार के सदस्यों के बीच विवाद की संभावना काफी कम हो जाती है।
इस प्रकार भारतीय कानून साफ तौर पर यह स्पष्ट करता है कि पिता की संपत्ति पर केवल बड़े बेटे का विशेष अधिकार नहीं होता। संपत्ति का बंटवारा वसीयत, संपत्ति के प्रकार और लागू उत्तराधिकार कानून के अनुसार किया जाता है। इसलिए संपत्ति से जुड़े मामलों में सामाजिक धारणाओं के बजाय कानूनी प्रावधानों को समझना और उनका पालन करना ही सबसे उचित माना जाता है।
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