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नई दिल्ली: पिछले कुछ कारोबारी सत्रों से दबाव में चल रहे भारतीय शेयर बाजार के लिए भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI की मौद्रिक नीति एक बड़ा ट्रिगर मानी जा रही थी। बाजार को उम्मीद थी कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लेकर अहम फैसला करेगा और आखिरकार बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया। इसके बावजूद शेयर बाजार में कोई बहुत बड़ा झटका या तेज उछाल देखने को नहीं मिला। इसकी बड़ी वजह यह रही कि ब्याज दर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की संभावना पहले से काफी हद तक बाजार के अनुमानों में शामिल थी।
RBI के फैसले के बाद शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव जरूर बढ़ा। सेंसेक्स करीब 529 अंक तक नीचे गया, जबकि निफ्टी में लगभग 191 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि बाद में बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में सुधार आने से बाजार ने अपने नुकसान का कुछ हिस्सा कम कर लिया। दोपहर तक निफ्टी करीब 0.44 प्रतिशत और सेंसेक्स लगभग 0.25 प्रतिशत नीचे कारोबार कर रहे थे। यानी बाजार का रिएक्शन न तो बहुत ज्यादा नकारात्मक रहा और न ही कोई बड़ी तेजी देखने को मिली।
रेपो रेट बढ़ने के बाद भी बाजार क्यों नहीं टूटा?
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक RBI का 25 बेसिस प्वाइंट का कदम काफी हद तक पहले से अनुमानित था। यही वजह है कि इसका असर शेयर बाजार पर सीमित रहा। निवेशकों की नजर केवल रेपो रेट पर नहीं, बल्कि RBI के आगे के रुख पर भी थी। केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया है। इसका मतलब यह है कि RBI आने वाले समय में महंगाई और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर आगे और सख्ती कर सकता है।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी साफ किया कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना फिलहाल नहीं है। आगे की कार्रवाई या तो ब्याज दर को यथावत रखने की हो सकती है या फिर जरूरत पड़ने पर एक और बढ़ोतरी की जा सकती है। ऐसे में निवेशकों के लिए अब अगली मौद्रिक नीति से ज्यादा महत्वपूर्ण महंगाई, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक परिस्थितियां हो सकती हैं।
बैंकिंग शेयरों के लिए क्या संकेत?
रेपो रेट बढ़ने के बाद सामान्य तौर पर ब्याज दरों से जुड़े शेयरों पर दबाव देखा जाता है, लेकिन इस बार बैंकिंग शेयरों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। शुरुआती गिरावट के बाद कई बैंक शेयरों ने रिकवरी दिखाई। इसकी एक वजह यह भी रही कि RBI ने नकदी को लेकर कोई अतिरिक्त सख्त कदम नहीं उठाया।
कुछ निजी बैंकों के लिए रेपो रेट से जुड़े लोन पर ब्याज दर बढ़ना आय के लिहाज से सकारात्मक हो सकता है। हालांकि दूसरी तरफ जमा पर ब्याज बढ़ाने और फंडिंग कॉस्ट बढ़ने का दबाव भी बैंकों के मार्जिन पर असर डाल सकता है। इसलिए बैंकिंग सेक्टर में अब निवेशकों की नजर नेट इंटरेस्ट मार्जिन और आगामी तिमाही नतीजों पर रहेगी।
ऑटो और रियल एस्टेट में दबाव क्यों?
ब्याज दर बढ़ने का सीधा असर कर्ज की लागत पर पड़ सकता है। होम लोन, ऑटो लोन और दूसरे फ्लोटिंग रेट लोन महंगे होने की स्थिति में ऑटो और रियल एस्टेट जैसे सेक्टर दबाव में आ सकते हैं। RBI पॉलिसी के बाद भी इन सेक्टर्स के शेयरों में कमजोरी दिखाई दी।
हालांकि बाजार की दिशा केवल ब्याज दरों से तय नहीं होगी। कंपनियों की बिक्री, मांग और कमाई के आंकड़े भी आगे महत्वपूर्ण रहेंगे।
कच्चा तेल बना सबसे बड़ा जोखिम
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI पॉलिसी के बाद अब बाजार का ध्यान वापस कच्चे तेल की कीमतों पर जा सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है। अगर तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो भारत के लिए महंगाई और आयात बिल दोनों बढ़ सकते हैं।
महंगा कच्चा तेल कंपनियों की लागत बढ़ा सकता है और उनके मुनाफे पर असर डाल सकता है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ने का खतरा भी रहता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर तेल 100 डॉलर के ऊपर बना रहा तो विदेशी संस्थागत निवेशकों की निकासी जारी रह सकती है।
रुपये और बॉन्ड यील्ड पर भी नजर
RBI पॉलिसी के बाद रुपये में कमजोरी बनी रही और डॉलर के मुकाबले यह 96.60 के आसपास तक गया। वहीं 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर करीब 7.24 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो इस साल का ऊंचा स्तर बताया गया।
रुपये में लगातार कमजोरी विदेशी निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकती है। वहीं बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर इक्विटी बाजार के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, क्योंकि निवेशक सुरक्षित साधनों की ओर भी पैसा लगा सकते हैं।
आगे बाजार के लिए क्या रहेगा महत्वपूर्ण?
RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान को बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। मजबूत आर्थिक वृद्धि शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन दूसरी तरफ महंगाई, कच्चा तेल और ऊंची ब्याज दरें जोखिम बने हुए हैं।
ऐसे में आगे बाजार की दिशा चार-पांच अहम फैक्टर्स तय कर सकते हैं—कच्चे तेल की कीमत, विदेशी निवेशकों का रुख, रुपया, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड और कंपनियों के तिमाही नतीजे। अमेरिका की ब्याज दरों और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं पर भी भारतीय बाजार की नजर बनी रहेगी।
कुल मिलाकर RBI पॉलिसी शेयर बाजार के लिए फिलहाल बड़ा झटका साबित नहीं हुई है, क्योंकि रेपो रेट में बढ़ोतरी पहले से काफी हद तक अनुमानित थी। अब बाजार की असली परीक्षा वैश्विक संकेतों, महंगाई और कॉरपोरेट कमाई से होगी। निकट अवधि में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना है, जबकि लंबी अवधि की दिशा आर्थिक वृद्धि और कंपनियों के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी।
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