होर्मुज में शिपिंग रुकी लेकिन क्रूड ऑयल की कीमतों पर नहीं दिखा बड़ा असर
होर्मुज में बढ़ा तनाव लेकिन क्रूड ऑयल की कीमतें काबू में
नई दिल्ली: दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बेहद निचले स्तर पर पहुंच गई है। अमेरिका और ईरान के बीच शांति तथा जलमार्ग को सामान्य रूप से खोलने को लेकर बातचीत में भी कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। इसके बावजूद सोमवार, 17 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वैसी विस्फोटक तेजी नहीं दिखाई दी, जैसी इतने बड़े आपूर्ति जोखिम की स्थिति में आशंका की जा सकती थी। हालांकि शुरुआती कारोबार में ब्रेंट क्रूड करीब 1 प्रतिशत तक चढ़ा और 89.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। युद्ध से पहले दुनिया के तेल और LNG व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते से गुजरता था। इसलिए यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ने का खतरा रहता है।
ताजा शिपिंग आंकड़ों ने चिंता और बढ़ा दी है। Kpler के आंकड़ों के अनुसार शनिवार को केवल पांच कमोडिटी जहाज होर्मुज से गुजरे, जबकि रविवार को एक भी जहाज पार नहीं हुआ। इससे एक सप्ताह पहले सप्ताहांत में 31 जहाजों ने यह रास्ता पार किया था। युद्ध से पहले इस जलमार्ग से प्रतिदिन 130 से अधिक जहाजों की आवाजाही होती थी।
यानी सामान्य स्थिति की तुलना में होर्मुज का समुद्री यातायात लगभग ठहरने की स्थिति में पहुंच चुका है। इसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इस क्षेत्र से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर और दूसरे बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों की तेल और गैस आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचती है। हालिया तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान पर ADNOC से जुड़े तीसरे तेल टैंकर को निशाना बनाने का आरोप भी लगाया है। इससे पहले भी टैंकरों पर हमलों की घटनाओं ने समुद्री परिवहन कंपनियों की चिंता बढ़ाई थी। जहाज मालिक और बीमा कंपनियां जोखिम का आकलन कर रही हैं, जिससे इस रास्ते से सामान्य व्यापार बहाल करना और मुश्किल हो सकता है।
इस पूरे संकट के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में भी कोई बड़ी नरमी दिखाई नहीं दे रही। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि अमेरिका के साथ बातचीत फिर शुरू करने को लेकर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है। इससे बाजार की उस उम्मीद को झटका लगा है कि दोनों पक्ष जल्द समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
ईरान की ओर से होर्मुज को लेकर कड़ा रुख अपनाया गया है। दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी ईरान पर दबाव बनाए हुए हैं। इस कारण कूटनीतिक गतिरोध के जल्द खत्म होने की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है।
इससे पहले ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया था कि जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल करने का मुद्दा अमेरिका के साथ व्यापक राजनीतिक और सुरक्षा समझौते से जुड़ा हुआ है। ऐसे में केवल समुद्री यातायात को लेकर अलग समझौता करना आसान नहीं दिखाई देता।
सबसे दिलचस्प स्थिति अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार में दिखाई दे रही है। इतनी बड़ी भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद क्रूड की कीमतों में बहुत बड़ी छलांग नहीं लगी है। सोमवार के शुरुआती कारोबार में ब्रेंट क्रूड 89.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा और बाद में करीब 89.20 डॉलर पर कारोबार करता दिखाई दिया। अमेरिकी WTI क्रूड करीब 82.83 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था।
हालांकि कीमतों को पूरी तरह स्थिर कहना भी सही नहीं होगा। पिछले सप्ताह दोनों प्रमुख तेल बेंचमार्क में 5 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई थी। यानी होर्मुज संकट का असर बाजार में पहले ही काफी हद तक दिखाई दे चुका है। सोमवार को कीमतों की चाल तुलनात्मक रूप से सीमित रहने से यह सवाल उठ रहा है कि इतनी कम जहाज आवाजाही के बावजूद क्रूड 100 डॉलर के करीब क्यों नहीं पहुंच रहा।
इसके पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर पर्याप्त तेल भंडार, मांग को लेकर चिंता और दूसरे क्षेत्रों से उपलब्ध आपूर्ति बाजार को संतुलित कर रही है। निवेशक यह भी देख रहे हैं कि होर्मुज से जहाजों की आवाजाही बेहद कम होने के बावजूद क्या वास्तविक वैश्विक तेल उपलब्धता में इतनी बड़ी कमी आती है कि कीमतों को नई ऊंचाई पर जाना पड़े। बाजार में एक धारणा यह भी है कि मौजूदा भू-राजनीतिक जोखिम का बड़ा हिस्सा पहले ही तेल की कीमतों में शामिल हो चुका है। ऐसे में क्रूड में अगली बड़ी तेजी के लिए बाजार को किसी नए और गंभीर घटनाक्रम की जरूरत पड़ सकती है, जैसे बड़े तेल उत्पादन केंद्र या ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमला अथवा आपूर्ति में वास्तविक और लंबी अवधि की बड़ी कमी। तेल बाजार के लिए मांग का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना आपूर्ति का। अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी होती है और चीन समेत बड़े उपभोक्ता देशों में ईंधन की मांग कमजोर रहती है तो मध्य पूर्व की आपूर्ति में कमी के बावजूद कीमतों पर कुछ नियंत्रण बना रह सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 85 से 90 डॉलर या उससे ऊपर रहता है तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। इसके साथ रुपये, महंगाई और तेल विपणन कंपनियों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। महंगा कच्चा तेल विमानन, पेंट, केमिकल, प्लास्टिक और लॉजिस्टिक्स जैसे उद्योगों की लागत पर भी असर डाल सकता है। यही वजह है कि भारतीय शेयर बाजार भी होर्मुज और मध्य पूर्व से आने वाली खबरों पर लगातार नजर बनाए हुए है।
रसोई गैस के लिए भी होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण है। भारत की LPG आपूर्ति का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है और पश्चिम एशिया इसका प्रमुख स्रोत रहा है। ऐसे में जलडमरूमध्य में लंबे समय तक व्यवधान बने रहने पर सरकार और तेल कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्ति तथा घरेलू उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर अधिक जोर देना पड़ सकता है। फिलहाल तेल बाजार के सामने दो विपरीत ताकतें काम कर रही हैं। एक तरफ होर्मुज में बेहद कम जहाज यातायात, टैंकरों पर हमलों का खतरा और अमेरिका-ईरान के बीच रुकी बातचीत कीमतों को ऊपर धकेल रही है। दूसरी तरफ वैश्विक आपूर्ति, पर्याप्त भंडार और मांग से जुड़ी चिंताएं तेजी को सीमित कर रही हैं।
इसलिए आने वाले दिनों में क्रूड की दिशा पूरी तरह होर्मुज से गुजरने वाले वास्तविक तेल प्रवाह पर निर्भर कर सकती है। यदि जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य होने लगती है तो तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है। इसके उलट अगर टैंकरों पर नए हमले होते हैं या जलमार्ग लंबे समय तक लगभग बंद रहता है तो बाजार में नई तेजी आ सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत भी सबसे बड़ा ट्रिगर बनी हुई है। दोनों देशों के बीच किसी समझौते की खबर आते ही तेल बाजार में तेज गिरावट संभव है, क्योंकि इससे होर्मुज खुलने की उम्मीद बढ़ेगी। इसके विपरीत बातचीत पूरी तरह टूटने या सैन्य तनाव बढ़ने पर क्रूड में जोखिम प्रीमियम और बढ़ सकता है।
फिलहाल तस्वीर यह है कि होर्मुज में समुद्री व्यापार सामान्य स्थिति से बहुत दूर है। रविवार को कमोडिटी जहाजों की आवाजाही शून्य दर्ज होना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ा चेतावनी संकेत है। इसके बावजूद क्रूड ऑयल बाजार ने अभी घबराहट वाली प्रतिक्रिया नहीं दी है। आने वाले कुछ दिन इसलिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। बाजार यह देखेगा कि अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर लौटते हैं या नहीं, टैंकर यातायात में सुधार होता है या नहीं और मध्य पूर्व के तेल प्रतिष्ठानों पर कोई नया हमला होता है या नहीं। इनमें से किसी भी मोर्चे पर बड़ा बदलाव ब्रेंट और WTI की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव ला सकता है।