वॉशिंगटन: US और भारतीय सेना के स्नाइपर्स ने हिमालय में एक साथ ट्रेनिंग की। उन्होंने 580 मीटर तक की दूरी पर मौजूद टारगेट पर भारतीय साको (Sako) राइफल से फायरिंग की। इस दौरान दोनों सेनाओं ने यह परखा कि वे 'शूटर-स्पॉटर' टीम के तौर पर कितनी तेज़ी से काम कर सकती हैं।
US आर्मी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को उत्तराखंड के औली के पास 'एक्सरसाइज युद्ध अभ्यास 2026' के तहत लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगाने (मार्कमैनशिप) की ट्रेनिंग हुई।
इस एक्सरसाइज के दौरान अमेरिकी और भारतीय सैनिकों की जोड़ियां बनाई गई थीं। उन्होंने लंबी दूरी के टारगेट पर निशाना लगाने से पहले .338 लापुआ मैग्नम राउंड वाली साको TRG राइफल को 'ज़ीरो' (सही सेटिंग) करने का काम किया।
टीमों ने घने जंगलों वाले इलाके में 500 से 580 मीटर की दूरी पर मौजूद टारगेट पर फायरिंग की। बाद में उन्होंने समतल ज़मीन पर लगभग 520 मीटर की दूरी पर मौजूद टारगेट पर निशाना साधा।
US आर्मी की 1st बटालियन, 5th इन्फैंट्री रेजिमेंट के टोही प्लाटून सार्जेंट, सार्जेंट फर्स्ट क्लास डायलन टिंकी पहले से ही भारतीय हथियार से वाकिफ़ थे।
उन्होंने इस साल की शुरुआत में महू स्थित भारतीय सेना के स्नाइपर स्कूल में 25 दिन का स्पेशलिस्ट एक्सचेंज प्रोग्राम पूरा किया था। इस दौरे से उन्हें भारतीय स्नाइपर इक्विपमेंट, ट्रेनिंग के तरीकों और सटीक निशाना लगाने की तकनीकों का सीधा अनुभव मिला।
टिंकी ने कहा, "मुझे यह राइफल वाकई बहुत पसंद है।"
उन्होंने साको की तुलना US आर्मी की मार्क 22 स्नाइपर राइफल से की और बताया कि दोनों में .338 लापुआ कारतूस का इस्तेमाल किया जा सकता है। मार्क 22 में सैनिक अलग-अलग तरह के गोला-बारूद के लिए बैरल भी बदल सकते हैं।
टिंकी ने कहा कि उनका मकसद यह पक्का करना था कि भारत में मिली जानकारी उनकी यूनिट में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचे। महू में उनके साथ गए एक युवा सैनिक को औली ट्रेनिंग के दौरान ज़्यादातर निर्देश देने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
इस तरीके का मकसद जूनियर सैनिकों को तैयार करना और अनुभव को सिर्फ़ एक सीनियर सैनिक तक सीमित न रखना था।
दोनों सेनाओं ने पाया कि उनके शूटर-स्पॉटर के बुनियादी तौर-तरीके काफी हद तक एक जैसे थे। स्पॉटर टारगेट, हवा और गोली के असर को देखता है और फिर शूटर को अगले राउंड के लिए ज़रूरी सुधार (करेक्शन) बताता है।
टिंकी ने कहा, "करेक्शन के मामले में यह तरीका लगभग हर जगह एक जैसा ही होता है।" औली में स्काउट्स, स्नाइपर्स और ड्रोन ऑपरेटर्स के साथ मिलकर की गई गतिविधियों के बाद यह ट्रेनिंग हुई। अमेरिकी और भारतीय सैनिकों ने घने जंगलों के बीच मूवमेंट किया, छोटे बिना पायलट वाले विमानों (unmanned aircraft) को स्नाइपर टैक्टिक्स के साथ जोड़ा और छिपे हुए निशानेबाजों का पता लगाने का अभ्यास किया।
भारतीय सेना के 'अशनी' ड्रोन प्लाटून ने भी अमेरिकी स्काउट्स के साथ काम किया। अमेरिकी सेना ने बताया कि दोनों पक्षों ने पहाड़ी इलाकों में बिना पायलट वाले सिस्टम के इस्तेमाल के अलग-अलग तरीकों की तुलना की।
भारतीय यूनिट ने 3D-प्रिंटेड ड्रोन प्लेटफॉर्म्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। अमेरिकी प्लाटून ने छोटे इंटेलिजेंस, सर्विलांस और टोही (reconnaissance) सिस्टम के साथ-साथ कुछ वन-वे अटैक प्लेटफॉर्म्स पर ध्यान केंद्रित किया।
एक अलग इक्विपमेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत अमेरिकी सैनिकों को भारतीय छोटे हथियारों, गाड़ियों और ड्रोन व काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करने का मौका मिला। दोनों देशों के सैनिकों ने एक साथ अपने ड्रोन उड़ाए और अमेरिकी सैनिकों को भारतीय सेना की राइफल से फायरिंग करने की भी इजाज़त दी गई।
अमेरिकी सेना की 'फर्स्ट मोबाइल ब्रिगेड कॉम्बैट टीम' के कमांडर कर्नल बेन जैकमैन ने कहा कि सीधे तौर पर उपकरणों और सिस्टम को इस्तेमाल करने के अनुभव से दोनों सेनाओं के बीच भरोसा और समझ बढ़ी।
जैकमैन ने कहा, "इस तरह के अनुभव से हमारी इंटरऑपरेबिलिटी (एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने की क्षमता) और भारतीय सेना के साथ हमारी पार्टनरशिप सीधे तौर पर मजबूत होती है।"
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