वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से अमेरिका और सऊदी अरब के बीच परमाणु सहयोग समझौते को मंजूरी दिए जाने के बाद वैश्विक स्तर पर बहस तेज हो गई है। इस समझौते को लेकर सबसे बड़ा विवाद सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की संभावित अनुमति मिलने को लेकर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पश्चिम एशिया में परमाणु संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है।
22 जुलाई को ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका-सऊदी अरब परमाणु समझौते को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी। इस डील के तहत सऊदी अरब को अपनी जमीन पर परमाणु ईंधन तैयार करने की सुविधा मिल सकती है। हालांकि अमेरिका का कहना है कि यह समझौता नागरिक परमाणु ऊर्जा जरूरतों के लिए है, लेकिन आलोचकों को आशंका है कि यूरेनियम संवर्धन की अनुमति भविष्य में परमाणु हथियार क्षमता विकसित करने का रास्ता खोल सकती है।
सऊदी अरब लंबे समय से परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू करने की कोशिश कर रहा है। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में शामिल होने के बावजूद रियाद अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा को विकल्प के तौर पर देख रहा है। सऊदी सरकार का कहना है कि परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल से तेल और गैस पर निर्भरता कम होगी तथा वह ज्यादा कच्चा तेल निर्यात कर सकेगा।
इस समझौते को लेकर सबसे ज्यादा नजर ईरान पर है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चाहते हैं कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न करे। ऐसे समय में सऊदी अरब को परमाणु तकनीक की अनुमति देना क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से पश्चिम एशिया में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं। वर्ष 2018 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है तो उनका देश भी ऐसा करने की कोशिश करेगा। इस बयान के बाद से ही सऊदी अरब के परमाणु इरादों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बनी हुई है।
इस डील की आलोचना करने वालों का कहना है कि अमेरिका ने अब तक ज्यादातर परमाणु समझौतों में सख्त निगरानी और यूरेनियम संवर्धन पर सीमाएं लगाई हैं। संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने भी अमेरिका के साथ समझौते में यूरेनियम संवर्धन नहीं करने का फैसला किया था। लेकिन सऊदी अरब के मामले में ऐसी पाबंदियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों की चिंता है कि अगर सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलती है तो इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है। इजरायल समेत अमेरिका के कई सहयोगी देशों को भी इस फैसले को लेकर चिंता हो सकती है।
हालांकि ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि यह समझौता अमेरिका के रणनीतिक हितों को मजबूत करेगा। अमेरिका सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों को और गहरा करना चाहता है और ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए रियाद को मजबूत साझेदार के रूप में देखता है।
इस समझौते के जरिए अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट में बड़े व्यापारिक अवसर मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा अमेरिका को सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी रखने का मौका भी मिलेगा।
वहीं, ईरान के लिए यह समझौता चिंता का विषय माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, तेहरान इसे अमेरिका की दोहरी नीति के तौर पर देख सकता है। एक तरफ अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता है, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब को परमाणु तकनीक उपलब्ध करा रहा है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह विकसित होने में कई साल लग सकते हैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण, तकनीकी व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय निगरानी की प्रक्रिया लंबी होती है।
ट्रंप प्रशासन के लिए यह समझौता केवल ऊर्जा सहयोग नहीं बल्कि एक बड़ी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब उसके साथ मजबूत संबंध बनाए रखे और पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव को चुनौती दे।
अब नजर इस बात पर होगी कि अमेरिकी कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस समझौते पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। अगर यह डील आगे बढ़ती है तो यह पश्चिम एशिया की परमाणु नीति और वैश्विक कूटनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकती है।