नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की। यह याचिका पार्टी के विरोधी गुटों के बीच चल रहे विवाद के बीच चुनाव आयोग (ECI) द्वारा पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज़ करने के फैसले को चुनौती देती है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सामने इस मामले का ज़िक्र करते हुए, ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने याचिका को जल्द लिस्ट करने की मांग की।
सिब्बल ने कहा, "उन्होंने (ECI) उपचुनाव का नोटिफिकेशन जारी किया और नोटिफिकेशन के बीच में ही उन्होंने चुनाव चिह्न फ्रीज़ कर दिया। हम चाहते हैं कि इस पर जल्द सुनवाई हो।" इस पर CJI ने कहा कि विरोधी पक्ष की भी अपनी बातें होंगी और भरोसा दिलाया कि मामले को लिस्ट करने पर विचार किया जाएगा।
CJI कांत ने कहा, "दोनों पक्षों को कुछ न कुछ कहना होगा। जब मामला लिस्ट हो जाएगा, तब बहस कीजिएगा। हम इसे लिस्ट करने की कोशिश करेंगे।"
यह याचिका ममता बनर्जी ने पार्टी के विरोधी गुटों के बीच विवाद के चलते ECI के उस अंतरिम फैसले को चुनौती देने के लिए दायर की है, जिसमें "ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस" नाम और उसके आरक्षित "फूल और घास" चुनाव चिह्न को फ्रीज़ कर दिया गया था।
ECI ने गुरुवार को एक अंतरिम आदेश जारी कर दोनों गुटों को TMC के मौजूदा नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया था। आयोग ने पाया कि दो विरोधी गुट खुद को मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी होने का दावा कर रहे थे और इस विवाद के लिए 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैरा 15 के तहत ठोस फैसले की ज़रूरत थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को "ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस" नाम और "फुटबॉल खिलाड़ी" का चुनाव चिह्न दिया गया, जबकि विरोधी गुट को "डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस" नाम और "लिफाफा" का चुनाव चिह्न दिया गया।
ECI की यह अंतरिम व्यवस्था पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों पर लागू होती है, जिसमें नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। ममता के नेतृत्व वाले गुट ने ECI के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में विवाद पर अंतिम फैसला होने तक पार्टी के स्थापित नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज़ करने पर सवाल उठाया गया है। ममता के गुट का कहना है कि वे ECI के अंतरिम आदेश को नहीं मानते, जबकि पार्टी से निकाले गए विधायक रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले विरोधी गुट ने पार्टी के संगठन और विधायी ढांचे पर अपना नियंत्रण होने का दावा किया है। यह विवाद संसद तक भी पहुंच गया, जहां TMC के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने अलग होकर 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) का साथ दिया और एक अलग संसदीय समूह के तौर पर मान्यता की मांग की।
ममता के गुट ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा दलबदल विरोधी कानून के तहत 20 बागी सांसदों की अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने में हो रही देरी को चुनौती दी थी। 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की याचिका पर 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किया, लेकिन लोकसभा स्पीकर को नोटिस जारी नहीं किया।
स्पीकर की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को बताया कि अयोग्यता की कार्यवाही में 20 सांसदों को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं। इसके बाद शीर्ष अदालत ने बागी सांसदों से जवाब मांगा।
TMC का कहना है कि ये सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुने गए थे और बाद में किसी दूसरे राजनीतिक संगठन में शामिल होने का उनका फैसला दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के दायरे में आता है। हालांकि, बागी गुट ने TMC के दो-तिहाई से ज़्यादा लोकसभा सांसदों के समर्थन का दावा किया है और एक अलग संसदीय समूह के तौर पर मान्यता मांगी है।
पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर यह विवाद बाद में ECI तक पहुंचा, जिसमें दोनों पक्षों ने TMC के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश किया। चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश में कहा गया कि यह अस्थायी व्यवस्था विरोधी गुटों को समान स्तर पर लाने और विवाद का अंतिम फैसला होने तक उनके अधिकारों और हितों की रक्षा करने के मकसद से की गई थी।
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